गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकाण्ड ] संध्योपासन, तर्पण, देवाराधन आदि नित्य कर्मों तथा आशौचका निरूपण ८५
धार्मिक कृत्य करने चाहिये (बिना प्रातःकाल स्नान-कृत्य किये संध्या-वन्दनादि करना उचित नहीं है)।
प्रातःस्नान करनेसे अलक्ष्मी, कालकर्णी अर्थात् विघ्न डालनेवाली अनिष्टकारी शक्तियाँ, दुःस्वप्न एवं दुर्विचारसे होनेवाले चिन्तनके पाप धुल जाते हैं, इसमें संशय नहीं। यह स्मरणीय है कि बिना स्नानके किये गये कार्य प्रशस्त नहीं होते। अतएव होम और जपादिके कार्योंमें विशेषरूपसे सबसे पहले विधिवत् स्नान करना चाहिये।
अशक्त होनेपर बिना सिरपर जल डाले ही स्नान करनेका विधान है। आर्द्र वस्त्रसे भी शरीरको पोंछा जा सकता है। इसको कायिक स्नान कहते हैं।
ब्राह्म, आग्नेय, वायव्य, दिव्य, वारुण और यौगिक—ये छः प्रकारके स्नान हैं, यथाधिकार मनुष्यको स्नान करना चाहिये। मन्त्रोंसहित कुशके द्वारा जल-बिन्दुओंसे मार्जन करना ब्राह्म-स्नान है। सिरसे लेकर पैरतक यथाविधान भस्मके द्वारा अङ्गोंका लेपन आग्नेय-स्नान है। गोधूलिसे शरीरको पवित्र करना वायव्य-स्नान कहा गया है। यह उत्तम स्नान माना जाता है। धूपके साथ होनेवाली वृष्टिमें किये गये स्नानको दिव्य-स्नान कहते हैं। जलमें अवगाहन करना वारुण-स्नान है। योगद्वारा हरिका चिन्तन यौगिक स्नान है। इसीको मानस-आत्मवेदन (ब्रह्माकार अखण्ड चित्तवृत्ति) कहते हैं। यह यौगिक स्नान ब्रह्मवादियोंके द्वारा सेवित है, इसे ही आत्मतीर्थ भी कहते हैं।
(स्नानके पूर्व) दुग्धधारी वृक्षोंसे उत्पन्न काष्ठ, मालती, अपामार्ग, बिल्व अथवा करवीर अर्थात् कनेरकी दातौन लेकर उत्तर या पूर्व दिशाकी ओर पवित्र स्थानमें बैठकर दाँतोंको स्वच्छ करना चाहिये और उसे धोकर उसका पवित्र स्थानमें त्याग करना चाहिये।
तदनन्तर स्नान करके देवताओं, ऋषियों और पितृगणोंका विधिवत् तर्पण करना चाहिये। यहाँ यथाशास्त्र स्नानका अङ्गभूत आचमन एवं संध्योपासनके अङ्गभूत आचमनका विधान है। संध्योपासनके अङ्गरूपमें ही कुशोदक बिन्दुओंसे 'आपो हि ष्ठा०' आदि वारुणमन्त्र एवं यथाविधान सावित्रीमन्त्रके द्वारा मार्जन करना विहित है। इसी क्रममें ॐकार और 'भूः भुवः स्वः' इन व्याहृतियोंसे युक्त वेदमाता गायत्रीका जप करके अनन्यभावसे भगवान् सूर्यके प्रति जलाञ्जलि समर्पित करे (सूर्यार्घ्य प्रदान करे)।
इसी क्रममें पूर्वकी ओर अग्रभागवाले कुशोंके आसनपर समाहितचित्तसे बैठकर प्राणायाम करके संध्या-ध्यान करनेका श्रुतिमें विधान है। यह जो संध्या है, वही जगत्की सृष्टि करनेवाली है, मायासे परे है, निष्कळा, ऐश्वरी, केवला शक्ति तथा तीन तत्त्वोंसे समुद्भूत है। अतः अधिकारी व्यक्ति (प्रातःकाल) रक्तवर्ण, (मध्याह्नकाल) शुक्लवर्ण एवं (सायंकाल) कृष्णवर्ण गायत्रीका ध्यान करके गायत्रीमन्त्रका जप करे।
द्विजको सदैव पूर्वाभिमुख होकर संध्योपासन करना चाहिये। संध्या-कृत्यसे रहित ब्राह्मण सदा अपवित्र रहता है, वह सभी कार्योंके लिये अयोग्य होता है। वह जो भी अन्य कोई कार्य करता है, उसका कुछ भी फल उसे प्राप्त नहीं होता। अनन्यचित्त होकर वेदपारङ्गत ब्राह्मणोंने विधिवत् संध्योपासन करके अपने पूर्वजोंके द्वारा प्राप्त उत्तम गतिको प्राप्त किया है। संध्योपासनका त्यागकर जो द्विजोत्तम अन्य किसी धर्म-कार्यके लिये प्रयत्न करता है, उसे दस हजार वर्षोंतक नरकभोग करना पड़ता है। अतः सभी प्रकारका प्रयत्न करके संध्योपासन अवश्य करना चाहिये*।
* प्राङ्मुखः सततं विप्रः संध्योपासनमाचरेत्। संध्याहीनोऽशुचिर्नित्यमनर्हः सर्वकर्मसु॥
यदन्यत्कुरुते किञ्चिन्न तस्य फलभाग्भवेत्। अनन्यचेतसः संतो ब्राह्मणा वेदपारगाः॥
उपास्य विधिवत्संध्यां प्राप्ताः पूर्वपरां गतिम्। योऽन्यत्र कुरुते यत्नं धर्मकार्ये द्विजोत्तमः॥
विहाय संध्याप्रणतिं स याति नरकायुतम्। तस्मात् सर्वप्रयत्नेन संध्योपासनमाचरेत्॥
उपासितो भवेत्तेन देवो योगतनुः परः। (५०। २१—२५)