भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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८६संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

उस संध्योपासनकर्मसे योगमूर्ति परमात्मा भगवान् नारायण पूजित हो जाते हैं। अतः अधिकारीको चाहिये कि वह पवित्र होकर पूर्वाभिमुख बैठ करके नित्य संयत-भावसे एक सहस्र या एक सौ अथवा दस बार गायत्रीका जप (अवश्य) करे। गायत्रीका एक सहस्र जप उत्तम, एक सौ जप मध्यम तथा दस बार किया गया जप कनिष्ठ जप कहलाता है।

एकाग्रचित्त होकर उदय होते हुए भगवान् भास्करका उपस्थान करे। ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा सामवेदमें आये हुए विविध सौर मन्त्रोंसे देवाधिदेव महायोगेश्वर भगवान् दिवाकरका उपस्थान करके पृथिवीपर मस्तक टेककर इस मन्त्रसे प्रणाम करे—

ॐ खखोल्काय शान्ताय कारणत्रयहेतवे ॥
निवेदयामि चात्मानं नमस्ते ज्ञानरूपिणे ।
त्वमेव ब्रह्म परममापो ज्योती रसोऽमृतम् ॥
भूर्भुवः स्वस्त्वमोङ्कारः सर्वो रुद्रः सनातनः ।
(५०। २८–३०)

शान्तस्वरूप भगवान् भास्कर आप सृष्टि, स्थिति और संहार—इन तीनों कारणोंके कारण हैं, आप ज्ञानस्वरूप हैं। मैं आपको आत्मनिवेदन करता हूँ, आप ही परब्रह्म हैं, आप ही ज्योतिःस्वरूप, अप्-स्वरूप, रसरूप तथा अमृतस्वरूप हैं। भूः, भुवः, स्वः—ये तीनों आप ही हैं और आप ही ॐकाररूप, सर्वस्वरूप रुद्र तथा अविनाशी हैं, आपको नमस्कार है।

इस उत्तम आदित्यहृदय-स्तोत्रका जप करके भगवान् दिवाकरको प्रातः और मध्याह्न (तथा सायंकाल)-में नमस्कार करना चाहिये।

इसके पश्चात् घर आ करके ब्राह्मण पुनः विधिवत् आचमन करे।

तदनन्तर उसे अग्निको प्रज्वलित करके विधिवत् भगवान् अग्निदेवको आहुति प्रदान करनी चाहिये। मुख्य अधिकारीकी अशक्तावस्थामें उसकी आज्ञा प्राप्त करके ऋत्विक् पुत्र अथवा पत्नी, शिष्य या सहोदर भ्राता भी हवन करे। मन्त्रविहीन एवं विधिकी उपेक्षा करके किया गया कोई भी कर्म इस लोक या परलोकमें फल देनेवाला नहीं होता।

तदनन्तर देवताओंको नमस्कार करके (अर्घ्य, पाद्य, चन्दन, सुगन्धित पदार्थका अनुलेपन, वस्त्र तथा नैवेद्यादि) पूजाके उपचारोंको निवेदनकर गुरुका पूजन करे और उनके हित-साधनमें लग जाय। तत्पश्चात् प्रयत्नपूर्वक यथाशक्ति द्विजको वेदाभ्यास करना चाहिये और उसके बाद इष्ट मन्त्रोंका जप (वेदपारायण) करके शिष्योंके अध्यापन-कार्यमें प्रवृत्त होना चाहिये। वह शिष्योंको वेदार्थ धारण कराये और दत्तचित्त होकर वेदार्थका विचार करे। द्विजोत्तम धर्मशास्त्र आदि विविध शास्त्रोंका अवलोकन करे और वेदादि निगमशास्त्रों (उपनिषदों) तथा व्याकरणादि वेदाङ्गोंका अच्छी प्रकार अवलोकन करे। इसके बाद वह पुनः योग-क्षेमके लिये राजा या श्रीमान्के पास जाय और अपने परिवारके लिये विविध प्रकारके अर्थोंका उपार्जन करे।

इसके पश्चात् मध्याह्न कालके आनेपर स्नान करनेके लिये शुद्ध मिट्टी, पुष्प, अक्षत, तिल, कुश और गोमय (गायके गोबर) आदि पदार्थोंको एकत्र करना चाहिये। उसके बाद नदी, देव, पोखर, तडाग या सरोवरमें जाकर स्नान करे। प्रत्येक दिन तडाग, सरोवर या नदी आदिसे पाँच मृत्तिकापिण्ड बिना निकाले स्नान करना दोषयुक्त होता है। (अतः पाँच पिण्ड मिट्टी निकाल करके ही स्नान करना चाहिये।) स्नानके समय (स्नानके लिये लायी गयी) मिट्टीके एक भागसे सिर धोना चाहिये, दूसरे भागसे नाभिके ऊपरी भागको और तीसरे भागसे नाभिसे नीचेके भागका तथा मृत्तिकाके छठे भागसे पैरोंका प्रक्षालन करना चाहिये। इन मृत्तिकापिण्डोंको परिमाणमें पके हुए आँवलेके