गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
| काण्ड ] | सूर्यपुत्री कालिन्दीकी कथा | ६२१ |
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शरीरका परित्यागकर आपकी पुत्रीके रूपमें पृथ्वीपर मैंने जन्म लिया है।
श्रीकृष्ण बोले—हे पक्षिन्! उस मित्रविन्दाने पृथ्वीपर रहनेके लिये वसुदेवकी बहिनके उदरमें सुमित्रा नामसे जन्म लिया। भागवतकथाके श्रवणसे ही वह भगवान् विष्णुको मित्रके रूपमें प्राप्त कर सकी है। इसी कारण उसका मित्रविन्दा यह नाम पड़ा है। हे खगराज! स्वयंवरमें अनेक राजाओंके मध्य भामिनी उस मित्रविन्दाने मेरे गलेमें जयमाला डाल दी और मैं समस्त राजाओंको परास्त कर मित्रविन्दाको साथ लेकर अपनी पुरी आ गया।
(अध्याय २०)
सूर्यपुत्री कालिन्दीकी कथा
श्रीकृष्णने कहा—हे खगेश्वर! अब मैं कालिन्दीकी उत्पत्तिके विषयमें बता रहा हूँ, आप सुनें—विवस्वान् नामके सूर्यकी कालिन्दी नामवाली एक पुत्री उत्पन्न हुई।
हे पक्षिराज! उस कालिन्दीको यमुना तथा यमानुजाके नामसे भी कहा गया है। भगवान् कृष्णकी पत्नी बननेकी इच्छासे उसने विशिष्ट तप किया था। पूर्वजन्ममें अर्जित पापोंका अनुताप अर्थात् उनका शमन करना तप है। हे पक्षिराज! अब आप अनुतापके विषयमें सुनें—पूर्वजन्ममें जिसने भगवान् मुकुन्दके दिव्य मन्त्रोंका जप नहीं किया, हरिनामामृतका स्मरण नहीं किया, भगवान्के पादारविन्दोंकी वन्दना नहीं की, हरिके नैवेद्यको ग्रहण नहीं किया, सुन्दर गन्धसे युक्त पुष्पोंको मुरारिको अर्पित नहीं किया, भगवान्की भक्ति नहीं की, ऐसा सोच-सोचकर मनमें जो पश्चात्ताप होता है, दुःख होता है वह कहने लगता है—हे मुकुन्द! मैं इस पुत्र-मित्र-कलत्रादिसे युक्त संसारमें अत्यन्त संतप्त हो रहा हूँ, हे भगवन्! कब मैं आपके मुखारविन्दका दर्शन करूँगा, मुझसे आपकी सेवा-पूजा नहीं हुई है, मेरा उद्धार कैसे होगा? हे हरे! मैं महान् पापी हूँ कब मुझे आपके दर्शन होंगे! हे प्रभो! मैंने अनन्त जन्मोंमें सांसारिक सम्बन्धोंके द्वारा अणुमात्र भी सुख नहीं प्राप्त किया और न तो मैं आपकी सेवा ही कर सका हूँ और न आपके भक्तजनोंकी संगति ही कर सका हूँ, हे मुरारे! मेरा शरीर कष्टसे जल रहा है। ऐसा अगतिक मैं अब आप मुकुन्दकी शरण छोड़कर और किसकी शरणमें जाऊँ? हे भगवन्! मुझपर दया कर मेरी रक्षा करें।'
श्रीकृष्णने पुनः कहा—हे पक्षिराज! इस प्रकारका पश्चात्ताप करना ही अनुताप है। इसका नाम तप भी है। हे पक्षिराज! सूर्यपुत्री उस कालिन्दीने भी इसी प्रकारका अनुताप करते हुए यमुनाके तटपर तपस्या की और श्रीहरिके ध्यानमें वह निमग्न हो गयी।
तत्पश्चात् हे पक्षिराज! एक दिन मैं अर्जुनके साथ यमुनाके तटपर गया। तप करती हुई उसको वहाँ देखकर मैंने अपने मित्र अर्जुनसे कहा कि हे पार्थ! आप शीघ्र ही उस कन्याके समीपमें जाकर पूछें कि 'वह किस कारणसे तप कर रही
६२२ संक्षिप्त गरुडपुराण [ ब्रह्म-
है' मेरे ऐसा कहनेपर अर्जुनने वैसा ही किया और कालिन्दीका सब वृत्तान्त भी बता दिया। तत्पश्चात् मैंने शुभ मुहूर्त आनेपर सम्यक् रीतिसे वहाँ जाकर उस कालिन्दीका पाणिग्रहण किया। हे पक्षिश्रेष्ठ! मुझ पूर्णानन्दको किस सुखकी अभिलाषा है? फिर भी उसपर अनुग्रह करनेकी दृष्टिसे ही मैंने उस कालिन्दीका पाणिग्रहण किया है। (अध्याय २१)
लक्ष्मणाद्वारा भगवान् श्रीकृष्णको प्राप्त करनेकी कथा
श्रीकृष्णने कहा— हे पक्षिराज! जो ये लक्ष्मणा हैं, पूर्व-सृष्टिमें वेदोंके पारंगत अग्निदेवकी पुत्री थीं। सभी प्रकारके शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न होनेके कारण सुलक्षणा इस नामसे इनकी प्रसिद्धि हुई। जिस प्रकार लक्ष्मी सभी लक्षणोंसे पूर्ण हैं, जैसे भगवान् विष्णु सभी लक्षणोंसे परिपूर्ण हैं, उसी प्रकार लक्ष्मणा भी सभी गुणोंसे पूर्ण हैं। वह सुलक्षणा श्रीकृष्णको पतिरूपमें प्राप्त करनेके लिये नित्य विविध उपचारोंसे उनकी पूजा किया करती थी, एक बार उसने अपने पिताजीसे कहा—हे तात! वे हरि सर्वत्र व्याप्त हैं, सबमें स्थित हैं और सर्वान्तर्यामी हैं। दान आदि जो भी शुभ कर्म किया जाता है उन्हींको उद्देश्य करके करना चाहिये। उनकी संतुष्टिके लिये उन्हें भक्तिपूर्वक विविध उपचारोंको समर्पित करना चाहिये। भक्तिपूर्वक समर्पित किये गये अन्न-पानादि पदार्थोंको वे मुकुन्द निश्चित ही ग्रहण करते हैं।
गृहस्थको चाहिये कि वह सर्वप्रथम भोग्य पदार्थोंका समर्पण भगवान् हरिके लिये अवश्य करे। जो गृहस्थ ऐसा करता है वह गृहस्थ धन्य है। अन्यथा उसका जीवन व्यर्थ है। माधव नामसे अभिहित वे भगवान् हरि इस प्रकारसे हमारे द्वारा समर्पित अन्नादिको ग्रहण करते हैं। ऐसा समझकर उन्हें पदार्थ अर्पित करना चाहिये। इस प्रकारसे दिये गये अन्नादिक नैवेद्यसे भगवान् विष्णु अत्यन्त संतुष्ट होते हैं। इसके विपरीत भावसे दिये गये पदार्थको वे ग्रहण नहीं करते, उनके लिये वह सब व्यर्थ ही है। हे सुपर्ण! वासुदेव हरि हमारे घरमें नित्य निवास करते हुए प्रसन्न रहते हैं। ऐसा समझकर अपने घरको देवालय मानकर सर्वदा अलंकृत रखना चाहिये। हे तात! अनन्तरूपी ऐसे वे हरि अनन्त रूपोंसे सबमें स्थित रहते हैं।
श्रीकृष्णने कहा— हे पक्षिराज! अपने पितासे इस प्रकार कहकर वह उन भगवान्को पतिरूपमें वरण करनेके लिये अनन्य-मनसे उनकी सपर्यामें लग गयी और की जा रही मेरी इस सेवासे भगवान् हरि ही मेरे पति हों ऐसा चिन्तन करती हुई उस लक्ष्मणाने अपने शरीरका परित्याग कर दिया और पुनः मद्रदेशके राजाकी पुत्रीके रूपमें जन्म लिया। हे पक्षिश्रेष्ठ! तदनन्तर उस लक्ष्मणाके स्वयंवरमें लक्ष्यका भेदन करके मैंने ही वहाँ उपस्थित राजाओंका मान-मर्दन कर उसका पाणिग्रहण किया और अपनी पुरीमें आकर उस देवीके साथ मैं निवास करने लगा। (अध्याय २२)
सोमपुत्री जाम्बवतीकी कथा
भगवान् श्रीकृष्णने कहा— हे पक्षिश्रेष्ठ गरुड! इस सृष्टिसे पूर्व-सृष्टिकी बात है। जाम्बवती श्रीसोमकी पुत्री थी। श्रीसोम श्रीविष्णुकी सेवामें लगे रहते थे। उनकी पुत्री जाम्बवती भी पिताका अनुसरण करती थी। वह नित्य पुराण सुनती, प्रतिक्षण भगवान्का स्मरण करती, उनके चरणोंकी वन्दना करती और उनकी सेवामें लगी रहती। धीरे-धीरे जाम्बवतीके अन्तःकरणमें संसारकी नश्वरता घर करती चली गयी। वह समझ गयी कि सुख-दुःख मायाके खेल हैं। इनसे ऊपर उठकर वह भगवत्प्रेममें
काण्ड ] सोमपुत्री जाम्बवतीकी कथा ६२३
आनन्द-विभोर रहने लगी। उसकी वाणीसे भगवान्के नाम और गुणका कथन होता रहता। आँखें प्रभुकी प्रतीक्षामें रत रहतीं, कान उनकी मीठी बातें सुननेके लिये उत्सुक रहते, हाथ अर्चनाके सम्भारमें लगे रहते और पैर उनकी प्रदक्षिणामें व्यस्त रहते। हृदयमें एक ही कामना रह गयी थी कि मैं भगवान्के चरणोंकी दासी कैसे बन जाऊँ। वह सारा कार्य भगवान्के लिये करती थी और सम्पन्न होनेपर उन्हें भगवान्को ही समर्पित कर देती थी। ब्राह्मणों और संतोंकी पूजामें उसे रस मिलता था।
एक दिन श्रीसोमने तीर्थयात्राका विचार किया। इस समाचारसे जाम्बवती फूली न समायी। वह पहलेसे ही उन स्थलोंको देखना चाहती थी, जहाँ भगवान्ने अपनी लीलाएँ की हैं और जहाँ वे अदृश्य-रूपसे आज भी विराजते हैं। भगवान् श्रीनिवासमें जाम्बवतीका मधुर भाव था। शेषाचलपर अब प्रियतमके दर्शन हो जायँगे, इस आशासे उसका रोम-रोम खिल उठा। पिताका भी भगवान्में पूरा लगाव था। दोनोंकी उत्सुकता अनिर्वचनीय थी। यात्रा प्रारम्भ हो गयी। पिता-पुत्रीके पग बिना बढ़ाये बढ़ रहे थे। धीरे-धीरे कपिल नामक तीर्थ आ गया। सद्गुरु जैगीषव्यकी आज्ञासे पिताने मुण्डन कराया, स्नान किया और तीर्थ-श्राद्ध किया। फिर विविध प्रकारके दान दिये। इसके बाद सद्गुरुने वेंकटाद्रिका महत्त्व सुनाया। इससे उन यात्रियोंके मनमें श्रद्धाका अतिरेक हो गया। वे लोग बहुत प्रेमसे इस पवित्र पर्वतपर चढ़ने लगे।
सद्गुरु जैगीषव्य नारद, प्रह्लाद, पराशर, पुण्डरीक आदि महाभागवतोंकी कथा सुनाते रहे। नामके रसका आस्वादन करते हुए लोग चल रहे थे। सच पूछा जाय तो वे चल नहीं रहे थे, अपितु आनन्द-वापीमें डूब-उतरा रहे थे और तरंगें स्वयं उन्हें आगे पहुँचाती जाती थीं। जाम्बवती तो मानो आनन्द-वारिधिमें उतराती चली जा रही थी।
चढ़ते-चढ़ते एक मनोरम तीर्थ आया। जाम्बवतीने पूछा—'गुरुदेव! यह कौन-सा तीर्थ है? वह कौन भाग्यशाली है, जिसपर भगवान्ने यहाँ अनुग्रह किया है।' इस प्रश्नसे जैगीषव्य बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा—'बेटी! इस तीर्थका नाम नारसिंह तीर्थ है। भक्तराज प्रह्लाद प्रेमवश भगवान् श्रीनिवासके दर्शनोंके लिये यहाँ पधारे थे। उनके साथ दैत्योंके कुमार भी थे। वे यहाँ भगवान्के दर्शनोंके लिये उत्कण्ठित हो गये थे। उन्होंने प्रह्लादसे कहा था—'मित्र! जब नृसिंह-रूप भगवान् श्रीनिवास कण-कणमें व्याप्त हैं, तब इस जलमें क्यों नहीं दिखायी देते? कृपाकर उनके दर्शन करा दीजिये!'
भक्तराज प्रह्लादने अपने भगवत्प्रेमी मित्रोंको बहुत आदर दिया। इसके बाद उन्होंने भगवान्से प्रार्थना की कि 'वे सबको दर्शन दे दें।' भगवान्ने संतराजकी प्रार्थना स्वीकार की। दैत्यकुमार दर्शन पाकर कृतकृत्य हो गये और भगवान् 'इस जलमें स्नान करनेसे ज्ञानकी प्राप्ति होगी'—ऐसा वरदान देकर प्रह्लाद तथा दैत्यकुमारोंके साथ सदाके लिये इस तीर्थमें बस गये। उनका यह वास आज भी वैसे ही है और आगे भी वैसा ही रहेगा। मध्याह्नके बाद आज भी चारों ओर जय-जयके शब्द सुनायी पड़ते हैं।
इस इतिहासको सुनकर सबको रोमाञ्च हो आया। सभीको भगवान् श्रीनिवासने दर्शन दिया। जाम्बवतीके मधुर भावके अनुरूप भगवान्ने हजारों कामदेवके समान अपना कमनीय रूप दिखाया। देखते ही जाम्बवतीका प्रत्येक अङ्ग शिथिल हो गया, रोमाञ्च हो आया और आँखोंसे प्रेमके अश्रु ढलने लगे। किसी प्रकार टूटे-फूटे शब्दोंमें जाम्बवतीने कहा—'नाथ! श्रीचरणोंमें रख लो।'
अबतक भगवान्ने अपने सौन्दर्य-सुधाका ही पान कराया था, अब उन्होंने अपने वचन-सुधाका पान कराते हुए कहा—'जाम्बवति! मैं तुम्हें वेंकटेश-मन्त्र बताता हूँ। तुम यहीं रहकर इसका जप करो।' जाम्बवतीको लगा कि उसके कानोंमें अमृत उड़ेल दिया गया हो। वह आनन्दसे बेसुध होने लगी। उसे न अपना पता था, न परायेका। जन्मकी साथिन लाज कहाँ चली गयी, इसका भी उसे पता न था।
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आनन्दावेशमें वह नाचने लगी। जाम्बवतीके उस नृत्यसे सारा ब्रह्माण्ड रस-विभोर हो उठा। स्वर्गसे अप्सराएँ उतर आयीं और जाम्बवतीके अगल-बगलमें नाचने लगीं। देवताओंने दुंदुभी बजायी और आकाशसे पुष्पकी वृष्टि की।
इसी प्रकार भगवान्के प्रेममें आह्लादित होते हुए जाम्बवतीकी तीर्थयात्रा चलती रही। गुरु जैगीषव्यने भगवान् वेंकटेशका माहात्म्य उसे सुनाया। स्वामिपुष्करिणी तीर्थ, जहाँ श्रीनिवास सदा विराजमान रहते हैं*—का इतिहास बतलाया। जिसे सुनकर वह आनन्दसे भर गयी, श्रीनिवासके प्रति उसका अनुराग बढ़ता ही गया। गुरुद्वारा बताये गये वेंकटाद्रिके सभी तीर्थोंका जाम्बवतीने बड़े ही भावसे सेवन किया। अन्तमें वह ऋषितीर्थ पहुँची। सप्तर्षियोंसे सेवित उस पुण्य-पवित्र ऋषितीर्थमें उसका मन रम गया, वह वहीं रुक गयी। दीर्घ समयतक उसने वहाँ तपका अनुष्ठान किया।
हे पक्षिराज! वह कन्या जाम्बवती मेरे कृष्णावतार-धारण करनेतक वहाँ तपस्यामें अनुरक्त रही। उसका शरीर अत्यन्त पवित्र हो चुका था। अन्तमें उसने मुझे पतिरूपमें प्राप्त करनेकी अभिलाषासे योगधारणाद्वारा अपने उस शरीरका परित्याग कर दिया और वह भक्तराज जाम्बवान्के घरमें पुनः उत्पन्न हुई। वहाँ उसका नाम भी जाम्बवती ही पड़ा। भक्तिपरायणा जाम्बवती पिताके घरमें धीरे-धीरे बढ़ने लगी, पूर्व-जन्मके समान ही इस जन्ममें भी वह एकमात्र हरिनिष्ठ थी। उसके पिता जाम्बवान् भी महान् भक्त थे। उन्होंने अपनी पुत्री जाम्बवतीको पत्नीरूपमें मुझे समर्पित कर अपनेको धन्य माना।
जाम्बवतीने भगवान् श्रीकृष्णको सदाके लिये अपना पति बना लिया। उसकी भक्ति सफल हो गयी। विश्वके नाथने विधिके साथ जाम्बवतीसे विवाह किया। सब ओर आनन्द-ही-आनन्द छा गया।
जाम्बवतीके विवाहकी पवित्र कथा बताकर श्रीकृष्णने पक्षिराज गरुडको उन कृपालु भगवान् श्रीनिवासकी भक्तिका विस्तारसे माहात्म्य बतलाया और कहा कि हे गरुडजी! भगवान्को कभी भूलना नहीं चाहिये, निरन्तर उनके हरि आदि मङ्गलमय नामोंका उच्चारण करते रहना चाहिये—
हरिं हरिं प्रवदेत् सर्वदैव। (२९।६४)
कल्याणकामी मनुष्यको चाहिये कि वह अपने शास्त्रविहित कर्मोंको करते हुए प्रत्येक समय वासुदेव हरिका स्मरण करता रहे—
पूर्तिर्यदा क्रियते कर्मणां च
सम्यक् स्मरेद्वासुदेवं हरिं च ॥ (२९।६८)
ऐसा करनेसे नारायण अत्यन्त प्रसन्न होते हैं, इसलिये हे गरुडजी! भगवान् हरिको प्रिय लगनेवाले कार्योंमें ही सदा व्यक्तिको अनुराग रखना चाहिये—
हरिप्रीतिकरे धर्मे प्रीतियुक्तो भवेत् सदा ॥ (२९।७०)
(अध्याय २३—२९)
॥ गरुडपुराणान्तर्गत ब्रह्मकाण्ड सम्पूर्ण ॥
॥ गरुडपुराण सम्पूर्ण ॥
* स्वामिपुष्करिणीमध्ये श्रीनिवासोऽस्ति सर्वदा ॥ (२६।३८)