भारतकोश
गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Gautama Dharmasutra Hindi

महर्षि गौतम द्वारा

स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished360 पृष्ठ

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स्मृति थे, श्रुति नहीं तथापि उन्हें स्वाध्याय के अन्तर्गत सम्मिलित किया गया। विभिन्न चरणों एवं शाखाओं में सूत्र साहित्य के विकास के संबन्ध में यह उल्लेखनीय है कि कभी-कभी कल्पसूत्र शाखाओं के अन्तर्गत भिन्न होते हैं और कभी भिन्न नहीं होते। शाखाओं के भेद का एक कारण उनके स्वाध्याय के भेद हैं और कुछ कारण सूत्र की भिन्नता भी है। अतः कई स्थानों पर जहाँ शाखा का भेद है वहाँ सूत्र का भी भेद है। यही बात महादेव ने हिरण्यकेशिसूत्र की टीका में कही है :—

"तत्र कल्पसूत्रं प्रतिशाखं भिन्नमभिन्नमपि क्वचित् शाखाभेदेऽध्ययनभेदाद्वा सूत्रभेदाद्वा। आश्वलायनीयं कात्यायनीयं च सूत्रं हि भिन्नाध्ययनयोर्द्वयोर्द्वयोः शाखयोरेकैकमेव। तैत्तिरीयके च समाम्नाये समानाध्ययने नाना सूत्राणि। अनेन च सूत्रभेदे शाखाभेदः शाखाभेदे च सूत्रभेद इति परस्पराश्रय इति वाच्यम् ॥"

इसी आचार्य ने अर्वाचीन कहे जाने वाले सूत्रों की प्राचीनता के विषय में भी एक नवीन बात कही है कि वे सूत्र भी जिनके रचयिता अर्वाचीन मालूम पड़ते हैं वस्तुतः शाश्वत हैं और प्राचीन ऋषियों से निःसृत हैं।

"न हि सूत्राणां कर्तृसंबंधिसंज्ञाघटनी किन्तु नानाकल्पगतासु तत्तन्नामक-र्षिव्यक्तिषु नित्या तन्प्रणीतसूत्रेषु च नित्यां जातिमवलम्ब्य तिष्ठति यथा पुरुषना-मांकितशाखासु संज्ञा ।"

कल्पसूत्र मुख्यतः चार प्रकार के हैं :— १. श्रौतसूत्र—श्रौत अग्नि से होने वाले बड़े यज्ञों का विवेचन करने वाले सूत्र। २. गृह्यसूत्र—गृह्याग्नि में होने वाले घरेलू यज्ञ का तथा उपनयन, विवाह आदि संस्कारों का विवेचन करने वाले सूत्र। ३. धर्मसूत्र—चारों आश्रमों, चारों वर्णों तथा उनके धार्मिक आचारों का तथा राजा के कर्त्तव्यों का वर्णन करने वाले सूत्र। ४. शुल्वसूत्र—यज्ञ में वेदि आदि के निर्माण की विधि का वर्णन करने वाले सूत्र।

धर्मसूत्र

वैदिक साहित्य के एक महत्वपूर्ण अंग हैं—धर्मसूत्र। सामान्यतः वैदिक साहित्य के अन्य ग्रन्थों के समान धर्मसूत्र भी प्रत्येक शाखा में अलग-अलग होते हैं किन्तु अनेक शाखाओं के विशिष्ट धर्मसूत्र उपलब्ध नहीं हैं। धर्मसूत्र कल्प की परम्परा में आते हैं और कल्प का अर्थ है "वेद में विहित कर्मों का क्रमपूर्वक व्यवस्थित कल्पना करने वाला शास्त्र"। "कल्पो वेदविहितानां कर्मणामानुपूर्व्येण कल्पनाशास्त्रम्"—विष्णुमित्र, ऋग्वेदप्रातिशाख्य की वर्गद्वयवृत्ति, पृ० १२। इस प्रकार धर्मसूत्रों का अटूट संबन्ध यज्ञ-यागादि बड़े कर्मों, विवाह इत्यादि गृह्य कर्मों का प्रतिपादन करने वाले साहित्य के साथ है और इस कल्प साहित्य के