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गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Gautama Dharmasutra Hindi

महर्षि गौतम द्वारा

स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished360 पृष्ठ

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स्मृति थे, श्रुति नहीं तथापि उन्हें स्वाध्याय के अन्तर्गत सम्मिलित किया गया। विभिन्न चरणों एवं शाखाओं में सूत्र साहित्य के विकास के संबन्ध में यह उल्लेखनीय है कि कभी-कभी कल्पसूत्र शाखाओं के अन्तर्गत भिन्न होते हैं और कभी भिन्न नहीं होते। शाखाओं के भेद का एक कारण उनके स्वाध्याय के भेद हैं और कुछ कारण सूत्र की भिन्नता भी है। अतः कई स्थानों पर जहाँ शाखा का भेद है वहाँ सूत्र का भी भेद है। यही बात महादेव ने हिरण्यकेशिसूत्र की टीका में कही है :—

"तत्र कल्पसूत्रं प्रतिशाखं भिन्नमभिन्नमपि क्वचित् शाखाभेदेऽध्ययनभेदाद्वा सूत्रभेदाद्वा। आश्वलायनीयं कात्यायनीयं च सूत्रं हि भिन्नाध्ययनयोर्द्वयोर्द्वयोः शाखयोरेकैकमेव। तैत्तिरीयके च समाम्नाये समानाध्ययने नाना सूत्राणि। अनेन च सूत्रभेदे शाखाभेदः शाखाभेदे च सूत्रभेद इति परस्पराश्रय इति वाच्यम् ॥"

इसी आचार्य ने अर्वाचीन कहे जाने वाले सूत्रों की प्राचीनता के विषय में भी एक नवीन बात कही है कि वे सूत्र भी जिनके रचयिता अर्वाचीन मालूम पड़ते हैं वस्तुतः शाश्वत हैं और प्राचीन ऋषियों से निःसृत हैं।

"न हि सूत्राणां कर्तृसंबंधिसंज्ञाघटनी किन्तु नानाकल्पगतासु तत्तन्नामक-र्षिव्यक्तिषु नित्या तन्प्रणीतसूत्रेषु च नित्यां जातिमवलम्ब्य तिष्ठति यथा पुरुषना-मांकितशाखासु संज्ञा ।"

कल्पसूत्र मुख्यतः चार प्रकार के हैं :— १. श्रौतसूत्र—श्रौत अग्नि से होने वाले बड़े यज्ञों का विवेचन करने वाले सूत्र। २. गृह्यसूत्र—गृह्याग्नि में होने वाले घरेलू यज्ञ का तथा उपनयन, विवाह आदि संस्कारों का विवेचन करने वाले सूत्र। ३. धर्मसूत्र—चारों आश्रमों, चारों वर्णों तथा उनके धार्मिक आचारों का तथा राजा के कर्त्तव्यों का वर्णन करने वाले सूत्र। ४. शुल्वसूत्र—यज्ञ में वेदि आदि के निर्माण की विधि का वर्णन करने वाले सूत्र।

धर्मसूत्र

वैदिक साहित्य के एक महत्वपूर्ण अंग हैं—धर्मसूत्र। सामान्यतः वैदिक साहित्य के अन्य ग्रन्थों के समान धर्मसूत्र भी प्रत्येक शाखा में अलग-अलग होते हैं किन्तु अनेक शाखाओं के विशिष्ट धर्मसूत्र उपलब्ध नहीं हैं। धर्मसूत्र कल्प की परम्परा में आते हैं और कल्प का अर्थ है "वेद में विहित कर्मों का क्रमपूर्वक व्यवस्थित कल्पना करने वाला शास्त्र"। "कल्पो वेदविहितानां कर्मणामानुपूर्व्येण कल्पनाशास्त्रम्"—विष्णुमित्र, ऋग्वेदप्रातिशाख्य की वर्गद्वयवृत्ति, पृ० १२। इस प्रकार धर्मसूत्रों का अटूट संबन्ध यज्ञ-यागादि बड़े कर्मों, विवाह इत्यादि गृह्य कर्मों का प्रतिपादन करने वाले साहित्य के साथ है और इस कल्प साहित्य के

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सन्दर्भ में हमें श्रौतसूत्रों, गृह्यसूत्रों और धर्मसूत्रों का पारस्परिक संबन्ध ध्यान में रखना चाहिए। अनेक शाखाओं के विशिष्ट सूत्र साथ-साथ मिलते हैं। आश्वलायन, शांखायन तथा मानव शाखा के श्रौतसूत्र उपलब्ध हैं किन्तु इनके धर्मसूत्र का अभाव है। जिन शाखाओं के सभी कल्पसूत्र उपलब्ध हैं उनमें प्रमुख हैं—बौधायन, आपस्तम्ब और हिरण्यकेशी। सभी शाखाओं के धर्मसूत्र उपलब्ध न होने का मुख्य कारण यह है कि कई शाखाओं ने पृथक् धर्मसूत्र रचने की आवश्यकता नहीं समझी और उन्होंने अन्य प्रमुख शाखा के धर्मसूत्र को ही अपना लिया। इसी बात का स्पष्ट निर्देश "पूर्वमीमांसासूत्र" १, ३, ११ की तन्त्रवार्तिक व्याख्या में किया गया है, जिसके अनुसार सभी धर्मसूत्र और सभी गृह्यसूत्र सभी आर्यों के लिए प्रामाणिक और मान्य हैं। कल्पसूत्रों के रचयिता अपनी शाखा के नियमों का विधान करते हैं किन्तु दूसरी शाखाओं के विकल्प नियमों का भी अनुसरण करते हैं :

"स्वशाखाविहितैश्चापि शाखान्तरगतान्र्विधीन्।
कल्पकारा निबध्नन्ति सर्व एव विकल्पितान्॥
सर्वशाखोपसंहारो जैमिनेश्चापि संमतः॥" कुमारिल, १. ३।

किन्तु यह बात भी कही गयी है कि कोई भी सूत्रकार अपनी ही शाखा से सन्तुष्ट न था :

"न च सूत्रकाराणामपि कश्चित् स्वशाखोपसंहारमात्रेणावस्थितः।"

धर्मसूत्रों के निर्माण का काल

धर्मसूत्रों का विशेष महत्व इसलिए भी है कि वे सामाजिक जीवन की रोचक झाँकी प्रस्तुत करते हैं। इन ग्रन्थों के टीकाकारों के उल्लेखों से परिलक्षित होता है कि धर्मसूत्र श्रौत और गृह्यसूत्रों के पहले विद्यमान थे। उदाहरण के लिए श्रौतसूत्र में कहा गया है कि यज्ञोपवीत धारण करने के उपरान्त ही विशिष्ट यज्ञों का सम्पादन किया जा सकता है, किन्तु यज्ञोपवीत धारण या उपनयन की विधि नहीं बतायी गयी है और संकेत दिया गया है कि इसकी विधि धर्मसूत्रों से ज्ञात है। इसी प्रकार मुखशुद्धि (आचान्त) और सन्ध्यावन्दन के नियमों के ज्ञात होने का संकेत है, किन्तु इस तर्क को निर्णयात्मक नहीं माना जा सकता। इसके विपरीत धर्मसूत्रों को बाद के समय का सिद्ध करने वाले प्रमाण अधिक पुष्ट हैं जिनके अनुसार धर्मसूत्र, श्रौतसूत्र और गृह्यसूत्र के बाद के रचित ठहरते हैं। धर्मसूत्र के अतिरिक्त किसी अन्य सूत्र में शूद्र की स्थिति का स्पष्ट निर्देश नहीं है, धर्मसूत्रों में शूद्र की सामाजिक स्थिति पतित होकर उस अवस्था में पहुँची हुई है जिस अवस्था में वह स्मृतियों में दिखाई पड़ती है।

अनेक स्थलों पर धर्मसूत्र गृह्यसूत्रों के विषय का ही प्रतिपादन करते हैं किन्तु वे स्वतन्त्र रचनाओं के वर्ग में हैं और प्रामाणिकता में गृह्यसूत्रों के समकक्ष हैं। धर्मसूत्रों का रचनाकाल निश्चित करने के लिये जब हम इनके पूर्ववर्ती साहित्य

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पर दृष्टिपात करते हैं तो देखते हैं कि निरुक्त ३, ४, ५ में रिक्थाधिकार के प्रश्न पर अनेक मतों का उल्लेख किया गया है :

“अथैतां जाभ्या रिक्थप्रतिषेध उदाहरन्ति ज्येष्ठं पुत्रिकाया इत्येके ।”

यास्क ने इस विषय में वैदिक अंशों का संकेत तो किया ही है साथ ही उन्होंने एक श्लोक का भी निर्देश किया है जिससे धर्मसम्बन्धी ग्रंथों के यास्क के समय में विद्यमान होने का पता चलता है।

“तदेतदृक्श्लोकाभ्यामभ्युक्तम् । अङ्गादङ्गात्सम्भवसि···स जीव शरदः शतम् । अविशेषेण पुत्राणां दायो भवति धर्मतः । मिथुनानां विसर्गादौ मनुः स्वायम्भुवोऽब्रवीत् ॥

इस प्रकार यदि यह स्वीकारें कि यास्क के पहले धर्मशास्त्र के ग्रन्थ विद्यमान थे तो धर्मसूत्रों की तिथि काफी पहले माननी पड़ेगी। इतना तो निश्चित है कि धर्मसूत्रों में प्राचीनतम—गौतम, बौधायन और आपस्तम्ब के धर्मसूत्र—ईसापूर्व ६०० और ३०० के बीच के समय के हैं। इन सूत्रकारों ने धर्मशास्त्रों के स्पष्ट उल्लेख किये हैं। विशेषतः गौतमधर्मसूत्र में जो प्राचीनतम धर्मसूत्र है, धर्मशास्त्र और धर्मशास्त्रकारों का निर्देश बहुशः हुआ है :

“तस्य च व्यवहारो वेदो धर्मशास्त्राण्यङ्गानि उपवेदाः पुराणम् ।” १. ९. २१

“चत्वारश्चतुर्णां पारगा वेदानां प्रागुत्तमास्त्रय आश्रमिणः पृथग्धर्मविदस्त्रय एतान्दशावरान्परिषदित्याचक्षते ।” ३. १०. ४७, यहाँ पृ० २९० ।

“त्रीणि प्रथमान्यनिर्देश्यान्मनु ।” ३. ३. ७ देखें पृ० २१४ ।

इसी प्रकार कई धर्मशास्त्रकारों के मतों के उल्लेख गौतम ने “इत्येके” कहकर किया है जैसे प्रथम प्रश्न में २. १५ में, २. ५८, ३. १, ४. २१, ७. २३ में। मनु तथा आचार्यों का भी निर्देश है :

“ऐकाश्रम्यं त्वाचार्याः प्रत्यक्षविधानाद् गार्हस्थ्यस्य”—१. ३. ३५
वर्णान्तरगमनमुत्कर्षापकर्षाभ्यां सप्तमे पञ्चमे वाऽऽचार्याः—१. ४. १८.

अन्य सूत्रकारों ने भी दूसरे धर्मशास्त्रकारों का सामान्य अभिधान से या नामतः उल्लेख किया है। पतंजलि ने भी “धर्मशास्त्रं च तथा” एवं जैमिनि ने भी “शूद्रश्च धर्मशास्त्रत्वात्”—पूर्वमीमांसा ६. ७. ६. वाक्यों द्वारा धर्मसूत्रों का निर्देश किया है और जैसा कि डा० काणे ने इन प्रमाणों से निष्कर्ष निकाला है “धर्मशास्त्र यास्क के पूर्व उपस्थित थे, कम से कम ई० पू० ६००-३०० के पूर्व तो वे थे ही और ईसा की द्वितीय शताब्दी में वे मानव आचार के लिए सबसे बड़े प्रमाण माने जाते थे ।”

—धर्मशास्त्र का इतिहास, प्रथम खण्ड, अनु० आचार्य काश्यप, पृ० ८ ।

सूत्र ग्रन्थों और श्लोकबद्ध धर्मग्रन्थों के आपेक्षिक काल के विषय में विद्वानों में मतभेद और विवाद है। प्रो० माक्स म्यूलेर एवं दूसरे विद्वान् यथा डा० भण्डारकर यह मानते हैं कि सूत्रों की रचना के बाद अनुष्टुम् छन्द वाले धर्मग्रन्थों

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की रचना हुई। डा० काणे को यह मत स्वीकार नहीं है, क्योंकि प्राचीन ग्रन्थों के विषय में हमारा ज्ञान अल्प है तथा श्लोक छन्द वाले कुछ ग्रन्थ जैसे मनुस्मृति कुछ धर्मसूत्रों यथा विष्णु-धर्मसूत्र से प्राचीन है और वशिष्ठधर्मसूत्र के समय का है। इसी प्रकार कुछ बहुत पुराने सूत्रों यथा बौधायनधर्मसूत्र में भी श्लोक उद्धृत हैं। "इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि श्लोकबद्ध ग्रन्थ धर्मसूत्रों से पूर्व भी विद्यमान थे"—काणे, वही, पृ० ९।

धर्मसूत्रों में प्राचीनतम गौतमधर्मसूत्र है। इसके विषय में आगे विस्तारपूर्वक कहा जायगा। इसका रचनाकाल ६०० वि० पू० और ४०० वि० पू० के बीच माना जाता है।

बौधायन धर्मसूत्र

बौधायन का धर्मसूत्र चार प्रश्नों में विभक्त है, इनमें अन्तिम प्रश्न परिशिष्ट माना जाता है और उसे बाद के समय की रचना मानते हैं। यह आपस्तम्ब धर्मसूत्र से पहले के समय का है। इसमें दो बार गौतम के नाम का तथा एक बार उनके धर्मसूत्र का उल्लेख आता है। बौधायन ने अनेक आचार्यों के नाम गिनाये हैं तथा उपनिषदों के उद्धरण दिये हैं। कुमारिल ने बौधायन को आपस्तम्ब से बाद के समय का माना है। बौधायन का काल ई० पू० २००-५०० के बीच माना जाता है।

आपस्तम्ब धर्मसूत्र

इस धर्मसूत्र में दो प्रश्न हैं जिनमें प्रत्येक में ग्यारह पटल हैं। सभी सूत्रों में यह सूत्र छोटा है और इसकी शैली बड़ी चुस्त है, भाषा भी पाणिनि से बहुत पहले की है। अधिकांश सूत्र गद्य में हैं किन्तु यत्र-तत्र श्लोक भी हैं। इसका संबन्ध पूर्वमीमांसा से दिखाई पड़ता है। यह बहुत प्रामाणिक माना जाता रहा है। इसका समय ६००-३०० ई० पू० स्वीकार किया गया है।

हिरण्यकेशि धर्मसूत्र

हिरण्यकेशीकल्प का २६ वां और २७ वां प्रश्न है। प्रायः इसे स्वतन्त्र धर्मसूत्र नहीं माना जाता, क्योंकि इसमें आपस्तम्ब धर्मसूत्र से सैकड़ों सूत्र लिये गये हैं।

वसिष्ठ धर्मसूत्र

इसके कई संस्करण हैं। जीवानन्द के संस्करण में २० अध्याय हैं तथा ३१ वें अध्याय का कुछ अंश है। इसके अतिरिक्त इसके ३० अध्यायों, ६ अध्यायों एवं २१ अध्यायों के अलग-अलग संस्करण भी हैं। इससे पता चलता है कि यह कालान्तर में परिबृंहित, परिवर्धित और परिवर्तित होता रहा है। इसका समय ३००-२०० ई० पू० है।

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विष्णु धर्मसूत्र

इस सूत्र में १०० अध्याय हैं, किन्तु सूत्र छोटे हैं। पहला अध्याय और अन्त के दो अध्याय पद्य में हैं। शेष में गद्य है या गद्य और पद्य का मिश्रण। इसका संबन्ध यजुर्वेद की कठ शाखा से बताया गया है। इसमें भिन्न-भिन्न कालों के अंश दृष्टिगोचर होते हैं, जिससे इसका काल निश्चित करना कठिन होता है। इसके आरम्भ के अंशों का समय ३००-१०० ई० पू० के बीच माना जा सकता है। इसमें भगवद्गीता, मनुस्मृति तथा याज्ञवल्क्यस्मृति से बहुत सी बातें ली गयी हैं।

हारीत धर्मसूत्र

इस सूत्र का ज्ञान उद्धरणों से मिलता है। अनेक धर्मशास्त्रकारों ने इनका उल्लेख किया है। इसमें गद्य के साथ अनुष्टुप् एवं त्रिष्टुप् छन्द का प्रयोग है। हारीत का संबन्ध कृष्णयजुर्वेद से है, किन्तु उन्होंने सभी वेदों से उद्धरण लिये हैं। इससे यह भी ज्ञात होता है कि वे किसी एक वेद से संबद्ध नहीं थे।

शंखलिखित धर्मसूत्र

यह शुक्लयजुर्वेद की वाजसनेयि शाखा का धर्मसूत्र था। 'तन्त्रवार्तिक' में इस सूत्र के अनुष्टुप् श्लोकों का उद्धरण है। याज्ञवल्क्य और पराशर ने इनका उल्लेख किया है। "जीवानन्द के स्मृतिसंग्रह में इस धर्मसूत्र के १८ अध्याय एवं शंखस्मृति के ३३० तथा लिखितस्मृति के ९३ श्लोक पाये जाते हैं। यह धर्मसूत्र गौतम एवं आपस्तम्ब के बाद के काल का है और इसकी रचना का समय ई० पू० ३०० से ई० सन् १०० के बीच है।

अन्य सूत्र ग्रन्थ

अनेक धर्मसूत्र धर्मविषयक ग्रन्थों में विकीर्ण हैं। उनमें इन आचार्यों के सूत्र ग्रन्थ गिनाये जाते हैं—अत्रि, उशना, कण्व एवं काण्व, कश्यप एवं काश्यप, गार्ग्य, च्यवन, जातूकर्ण्य, देवल, पैठीनसि, बुध, बृहस्पति, भरद्वाज एवं भारद्वाज, शातातप, सुमन्तु आदि।

धर्मसूत्रों का वर्ण्यविषय

धर्मसूत्रों का मुख्य वर्ण्यविषय है "आचार, विधि-नियम, एवं क्रियासंस्कार"। ये इन्हीं का विधिवत् विवेचन करते हैं। निश्चय ही, धर्मसूत्र कभी-कभी गृह्यसूत्रों के प्रतिपाद्य विषयों के भी क्षेत्र में पहुँच जाते हैं, किन्तु ऐसा कम स्थलों पर हुआ है। गृह्यसूत्रों का ध्येय गृह्ययज्ञ, प्रातः सायंपूजन, पके हुए भोजन की बलि, वार्षिक यज्ञ, विवाह, पुंसवन, जातकर्म, उपनयन एवं दूसरे संस्कार, छात्रों एवं स्नातकों के नियम, मधुपर्क और श्राद्धकर्म का वर्णन करना तथा इनकी विधियों को स्पष्ट करना है। इस प्रकार गृह्यसूत्रों का स्पष्ट संबन्ध घरेलू जीवन तथा व्यक्तिगत जीवन से है। ये कर्त्तव्यों ( duties ) और कानून ( laws ) को अपना विषय नहीं बनाते। इनके विपरीत धर्मसूत्र मनुष्य को समाज में लाकर खड़ा कर देता

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है जहाँ उसे व्यावहारिक जगत् में दूसरों के साथ रहते हुए अपने आचार-व्यवहार को नियमित और संयमित करना है, उसे कुछ कर्तव्यों एवं दायित्वों का पालन करना होता है, कुछ अधिकार प्राप्त करने होते हैं और अपने अपराधों के लिए दण्ड भोगने होते हैं। इस प्रकार धर्मसूत्रों का वातावरण अधिक सामाजिक और नैतिक है। जैसा हम कह आये हैं धर्मसूत्रों में गृह्यसूत्रों के कुछ विषयों पर भी विचार किया गया है जैसे विवाह, संस्कार, मधुपर्क, स्नातक का जीवन, श्राद्धकर्म आदि। संक्षेप में धर्मसूत्रों के वर्ण्यविषय की सूची इस प्रकार दी जा सकती है :—धर्म और उसके उपादान, चारों वर्णों के आचार और कर्तव्य एवं जीवन-वृत्तियाँ, ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास आश्रमों के आचार, उपजातियाँ और मिश्रित जातियाँ, सपिण्ड और सगोत्र, पाप और उनके प्रायश्चित्त एवं व्रत, अशौच और उससे शुद्धि, ऋण, ब्याज, साक्षी और न्यायव्यवहार, अपराध और उनके दण्ड, राजा और राजा के कर्तव्य, स्त्री के कर्तव्य, पुत्र और दत्तक पुत्र, उत्तराधिकार, स्त्रीधन और सम्पत्ति का विभाजन।

धर्मसूत्र और स्मृतियाँ

‘स्मृति’ शब्द का प्रयोग श्रुति अर्थात् वेद के ईश्वरप्रकाशित एवं ऋषिदृष्ट वाङ्मय से भिन्न साहित्य के लिए हुआ है। श्रुति और स्मृति के विषय में आगे धर्म के स्वरूप का विवेचन करते समय विचार किया गया है। उपर्युक्त अर्थ के अनुसार धर्मसूत्र भी स्मृति ग्रन्थ है :

“श्रुतिस्तु वेदो विज्ञेयो धर्मशास्त्रं तु वै स्मृतिः।” मनु० २. १०

किन्तु संकुचित अर्थ में स्मृति से धर्मशास्त्र की उन रचनाओं का तात्पर्य है जो प्रायः श्लोकों में हैं और उन्हीं विषयों का विवेचन करती हैं जिनका प्रतिपादन धर्मसूत्रों में किया गया है। इन स्मृतियों में अग्रणी हैं—मनु और याज्ञवल्क्य की स्मृतियाँ। “मनुस्मृति” सबसे प्राचीन है और ईसा से कई सौ वर्ष पहले रची गयी थी। अन्य स्मृतियाँ ४०० से १००० ई० के बीच की हैं। स्मृतिकारों की संख्या विस्तृत है, मुख्य स्मृतिकार १८ हैं, इनके अतिरिक्त २१ अन्य स्मृतिकार हैं जिनके नाम वीरमित्रोदय ने गिनाये हैं।

डॉ० काणे ने अपने धर्मशास्त्र के इतिहास में धर्मसूत्रों एवं स्मृतियों के प्रमुख लक्षण स्पष्टतः निर्दिष्ट किये हैं, जिन्हें यहाँ साभार उल्लिखित करना असंगत नहीं होगा।

१. अनेक धर्मसूत्र किसी चरण के कल्प के अंग हैं, अथवा उनका गहरा संबन्ध गृह्यसूत्रों से है।

२. धर्मसूत्रों में कभी-कभी अपने चरण तथा अपने वेद के उद्धरण विशेषतः दिये गये हैं।

३. प्राचीन धर्मसूत्रों के रचयिताओं को ऋषियों का ओहदा प्राप्त नहीं है और न वे अपने को मानवीय धरातल से ऊपर उठे हुए अलौकिक बताते हैं, इसके

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विपरीत मनु और याज्ञवल्क्य जैसे स्मृतिकारों को मानव से ऊपर दैवी शक्ति से संपन्न दर्शाया गया है।

४. धर्मसूत्र प्रायः गद्य में हैं या कहीं-कहीं मिश्रित गद्य और पद्य में हैं, किन्तु स्मृतियाँ श्लोकों में या पद्यबद्ध हैं।

५. भाषा की दृष्टि से धर्मसूत्र स्मृतियों के पहले के हैं और स्मृतियों की भाषा अपेक्षाकृत अर्वाचीन है।

६. विषयवस्तु के विन्यास की दृष्टि से भी उनमें भेद है। धर्मसूत्रों में विषय की व्यवस्था क्रम या तारतम्य का अनुसरण नहीं करती, किन्तु स्मृतियाँ अधिक व्यवस्थित और सुगठित हैं, उनमें विषयवस्तु मुख्यतः तीन शीर्षकों में विभक्त है—आचार, व्यवहार और प्रायश्चित्त ।

७. बहुत बड़ी संख्या में धर्मसूत्र अधिकतम स्मृतियों से प्राचीन हैं।

गौतम धर्मसूत्र

सभी धर्मसूत्रों में गौतम धर्मसूत्र सबसे प्राचीन है। यह केवल गद्य में है तथा इसमें श्लोक का कोई उद्धरण नहीं दिया गया है, जबकि दूसरे धर्मसूत्रों में श्लोक का उद्धरण आ जाता है। इसकी प्राचीनता के कई प्रमाण हैं :

१. सर्वप्रथम इसका उल्लेख बौधायनधर्मसूत्र में कई जगह किया गया है। यहाँ तक कि गौतमधर्मसूत्र का उन्नीसवां अध्याय अल्प परिवर्तित रूप में बौधायन-धर्मसूत्र में मिलता है और इन दोनों में बहुत से सूत्र एक दूसरे से मिलते-जुलते हैं। अनेक प्रमाणों से यह बात सिद्ध है कि बौधायन ने ही गौतमधर्मसूत्र से सामग्री ग्रहण की है।

२. इसी प्रकार वसिष्ठधर्मसूत्र में भी गौतमधर्मसूत्र से सामग्री ली गयी है। इसमें दो स्थानों ४. ३४ एवं ४. ३६ में गौतमधर्मसूत्र का उद्धरण है। इसके अतिरिक्त गौतमधर्मसूत्र का उन्नीसवां अध्याय वसिष्ठधर्मसूत्र में बाइसवें अध्याय के रूप में आता है। वसिष्ठधर्मसूत्र में कई सूत्र ठीक गौतमधर्मसूत्र में आये हुए सूत्रों के समान हैं जिनसे यह सिद्ध होता है कि गौतमधर्मसूत्र वसिष्ठधर्मसूत्र से पहले का है।

३. मनुस्मृति ३. १६ में गौतम का उल्लेख किया गया है और उन्हें उतथ्य का पुत्र बताया गया है।

४. याज्ञवल्क्यस्मृति १. ५ में उन्हें धर्मशास्त्रकारों में गिनाया गया है : “पराशरव्यासशंखलिखिता दक्षगौतमौ”।

५. अपरार्क ने 'भविष्यपुराण' से यह श्लोक उद्धृत किया है : “प्रतिषेधः सुरापाने मद्यस्य च नराधिप। द्विजोत्तमानामेवोक्तः सततं गौतमादिभिः॥” और यह सुरापान के विषय में ठीक गौतम के सूत्र के अनुरूप है।

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६. मनुस्मृति के टीकाकार कुल्लूक ने गौतम के ३. ६. २ सूत्र को भी भविष्य-पुराण का बताया है।

७. 'तन्त्रवार्तिक' के लेखक कुमारिल ने गौतम के अनेक सूत्र उद्धृत किये हैं।

८. शंकराचार्य ने अपने वेदान्तसूत्रभाष्य ३. १. ८ में गौतम के २. २. २९ को तथा १. ३. ३८ में २. ३. ४ को उद्धृत किया है।

९. याज्ञवल्क्यस्मृति के टीकाकार विश्वरूप ने गौतम के कई सूत्रों का निर्देश किया है।

१०. मनुस्मृति के भाष्यकार मेधातिथि ने गौतम का उद्धरण अनेक स्थलों पर दिया है।

११. गौतमधर्मसूत्र में हिन्दूधर्म पर बौद्धों द्वारा किये गये आक्षेपों की ओर संकेत नहीं है।

इन सब उल्लेखों से गौतमधर्मसूत्र के काल के विषय में यह निष्कर्ष निकलता है कि यह सूत्र निश्चित रूप से उपर्युक्त सभी रचनाओं से पहले का है। गौतमधर्मसूत्र का समय यास्क के 'निरुक्त' के बाद आता है और जैसा कि म० म० काणे ने कहा है गौतम धर्मसूत्र की रचना के समय “पाणिनि का व्याकरण या तो था ही नहीं और यदि था तो वह तब तक अपनी महत्ता नहीं स्थापित कर सका था।” इस प्रकार यह निश्चित होता है कि गौतमधर्मसूत्र ईसापूर्व ४००-६०० के पहले रचा जा चुका था।

गौतम धर्मसूत्र में अन्य साहित्य का उल्लेख

गौतम धर्मसूत्र सभी धर्मसूत्रों में प्राचीनतम है इसका एक प्रमाण यह भी है कि इसमें किसी अन्य धर्मसूत्र का या धर्मसूत्रकार का निर्देश नामतः नहीं है किन्तु इसके पहले धर्मशास्त्र और उसके रचयिता विद्यमान थे इस बात की ओर बहुशः उल्लेख इसमें मिलता है। राजा के व्यवहार के साधन बताते समय २. २. १९ में कहा गया है—

“तस्य च व्यवहारो वेदो धर्मशास्त्राण्यङ्गान्यपवेदाः पुराणम्”।

इसी प्रकार त्रयी के साथ आन्वीक्षिकी का भी उल्लेख है :—

“त्रय्यामान्वीक्षिक्यां वाऽभिविनीतः” २. २. ३

अन्य धर्माचार्यों में केवल मनु के मत का महापातकों का वर्णन करते समय उल्लेख किया गया है। 'एके' 'इत्येके' 'एकेषाम्' शब्दों द्वारा उस समय के तथा पूर्ववर्ती धर्मशास्त्रकारों के मतों का उल्लेख किया गया है।

वैदिक संहिता एवं ब्राह्मण साहित्य का उल्लेख तो किया ही गया है, उपनिषद्, वेदान्त आदि का भी हवाला गौतमधर्मसूत्र में कई जगह मिलता है। यथा, ३. १. १२।

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"उपनिषदो वेदान्तः सर्वच्छन्दःसु संहिता मधून्यघमर्षणमथर्वशिरो रुद्राः पुरुषसूक्तं राजतरौहिणे सामनी बृहद्रथन्तरे पुरुषगतिमहानाम्न्यो महावैराजं महादिवाकीर्त्यं ज्येष्ठसाम्नामन्यतमद् बहिष्पवमानं कूष्माण्डानि पावमान्यः सावित्री चेति पावमाननानि।"

इसी प्रकार वेदवेदांग और इतिहास पुराण का उल्लेख बहुश्रुत व्यक्ति का लक्षण बताते समय किया गया है :

"लोकवेदवेदाङ्गवित्" १. ८. ५। "वाकोवाक्येतिहासपुराणकुशलः" १. ८. ६।

गौतमधर्मसूत्र ३. २. २८ में "दण्डो दमनादित्याहुः" कहकर निरुक्त ११. ३ की ओर भी संकेत किया गया है। इस प्रकार गौतमधर्मसूत्र में इतर साहित्य की भी पर्याप्त चर्चा है।

गौतमधर्मसूत्र का सामवेद से संबन्ध

गौतमधर्मसूत्र का सामवेद से घनिष्ठ संबन्ध है इस विषय में कोई विवाद नहीं है। इस सूत्र का अध्ययन विशेषतः सामवेद के अनुयायी करते थे। चरणव्यूह की टीका के अनुसार गौतम सामवेद की राणायनीशाखा के एक विभाग के आचार्य या शाखा के संस्थापक थे। सामवेद के श्रौतसूत्रों (लाट्यायन श्रौतसूत्र १. ३. ३, १. ४. १७ तथा द्राह्यायण श्रौतसूत्र १. ४. १७, ९. ३. १५) में गौतम का उल्लेख है। सामवेद के गृह्यसूत्र गोभिलगृह्यसूत्र ३. १०. ६ में भी गौतमधर्मसूत्र के नियम को प्रामाणिक माना गया है।

इन उल्लेखों के अतिरिक्त गौतमधर्मसूत्र का सामवेद से गहरा संबन्ध इस बात से भी प्रमाणित होता है कि इस सूत्र में सामवेद के अनेक विषय ग्रहण किये गये हैं। उदाहरण के लिए गौतमधर्मसूत्र के अध्याय २६ में कुछ सूत्र ऐसे हैं जो शब्दशः सामवेद के सामविधान ब्राह्मण से उद्धृत किये गये हैं। इसी प्रकार गौतमधर्मसूत्र के तृतीय प्रश्न, प्रथम अध्याय के १२ वें सूत्र में सामवेद के ९ मन्त्रों का निर्देश किया गया है। ये मन्त्र किसी अन्य शाखा के धर्मसूत्र में नहीं उल्लिखित हैं जिससे गौतमधर्मसूत्र का सामवेद के प्रति पक्षपात स्पष्टतः दिखाई पड़ता है। गौतमधर्मसूत्र में प्रथम अध्याय के सूत्र ५२ में पाँच व्याहृतियाँ गिनायी गयी हैं और ये व्याहृति साम से उद्धृत हैं, गौतमधर्मसूत्र के अतिरिक्त अन्य शाखा के सूत्रों में पाँच के स्थान पर तीन या सात व्याहृतियों का ही उल्लेख है। गौतमधर्मसूत्र की यह विशेषता भी सामवेद के साथ इसका घनिष्ठ संबन्ध प्रकट करती है।

अतः यह प्रतीत होता है कि गौतम की शाखा का संबन्ध सामवेद से था, यद्यपि वैदिक काल की इस प्राचीन शाखा के विषय में कुछ निश्चित नहीं कहा जा सकता, क्योंकि प्राचीन साहित्य में क्षेपकों के लिए पर्याप्त अवसर था और किसी ग्रन्थ का विशुद्ध रूप निर्धारित करना असंभव सा ही है।

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धर्मसूत्र के रचयिता-गौतम

गौतमधर्मसूत्र के रचयिता का नाम सूत्र के नाम के अनुसार गौतम है। ऊपर यह निर्देश किया जा चुका है कि सामवेद के लाट्यायन श्रौतसूत्र और द्राह्मायण श्रौतसूत्र में गौतम का उल्लेख प्रायः आया है। इसी प्रकार गोभिल गृह्यसूत्र में भी गौतम को प्रमाण माना गया है। वस्तुतः गौतम नाम एक जातिगत नाम है और अनेक व्यक्तियों के नाम के साथ इसका प्रयोग उपलब्ध होता है, उदाहरण के लिए कठोपनिषद् २. ४. ५५ और २. ५. ६ में इसका प्रयोग नचिकेता के साथ तथा उसी उपनिषद् में १. १. १० में इस नाम का प्रयोग उसके पिता के लिए हुआ है। छान्दोग्योपनिषद् ४. ४. ३ में हारिद्रुम गौतम नाम के एक आचार्य का नाम आता है।

कुछ अन्य धर्मग्रन्थों के साथ भी गौतम नाम जुड़ा हुआ मिलता है। जैसा कि म० म० काणे ने बताया है मिताक्षरा, स्मृतिचन्द्रिका, हेमाद्रि, माधव आदि ने किसी श्लोक-गौतम के उद्धरण दिये हैं। वृद्ध-गौतम नाम के धर्मशास्त्र का उल्लेख अपरार्क, हेमाद्रि तथा माधव ने किया है। दत्तकमीमांसा में वृद्ध गौतम के अतिरिक्त बृहद् गौतम से उद्धरण दिया गया है। किन्तु गौतम नाम की ये रचनायें गौतमधर्मसूत्र से बहुत बाद के समय की हैं और गौतम धर्मसूत्र से इनमें काफी अन्तर है।

सामवेद के वंशब्राह्मण में गौतम गोत्र नाम वाले चार सामवेदी आचार्यों के नाम आये हैं:—गात् गौतम, सुमन्त्र बाभ्रव्य गौतम, संकर गौतम तथा स्थविर गौतम। श्रौतसूत्रों और गृह्यसूत्रों में गौतम तथा स्थविर गौतम के मत उद्धृत किये गये हैं।

गौतमधर्मसूत्र के संस्करण और टीकाकार

गौतमधर्मसूत्र का कई बार प्रकाशन हुआ है। डा० स्टेन्जलर ने इसका सम्पादन 'दि इंस्टीट्यूट्स आफ गौतम नाम से लन्दन से १८७६ में किया और कलकत्ता से भी १८७६ में एक संस्करण प्रकाशित हुआ। आनन्दाश्रम ग्रन्थावली के अन्तर्गत इसका संस्करण हरदत्त की 'मिताक्षरा' टीका के साथ १९१० में प्रकाशित हुआ। इसका एक संस्करण मैसूर से भी निकला है। मैसूर संस्करण में मस्करी का भाष्य है। डा० ब्यूहूलर कृत अंग्रेजी अनुवाद 'सेक्रेड बुक्स आफ दी ईस्ट' सीरीज़ की दूसरी जिल्द में प्रकाशित है।

इस धर्मसूत्र के टीकाकारों में मुख्य हैं हरदत्त और मस्करी। हरदत्त का समय ११००-१३०० के बीच माना गया है। इनके अतिरिक्त कुछ अन्य टीकाकारों का भी उल्लेख पाया जाता है। अद्भुत सागर के लेखक अनिरुद्ध ने तथा भाष्यकार विश्वरूप ने गौतमधर्मसूत्र पर असहाय नाम के आचार्य की टीका का भी निर्देश किया है।

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गौतमधर्मसूत्र में वर्णित विषय

टीकाकार हरदत्त के अनुसार गौतमधर्मसूत्र में कुल २८ अध्याय हैं। कलकत्ता से प्रकाशित संस्करण में एक अध्याय 'कर्मविपाक' १९ वें अध्याय के बाद आता है। आनन्दाश्रम ग्रन्थावली से प्रकाशित इस ग्रन्थ में तथा वर्तमान संस्करण में भी इस धर्मसूत्र का विभाजन तीन प्रश्नों के अन्तर्गत है और प्रथम प्रश्न में ९ अध्याय, द्वितीय प्रश्न में ९ अध्याय तथा तृतीय प्रश्न में १० अध्याय हैं। इसमें वर्णित विषयों की सूची संक्षेप में इस क्रम से है।

प्रथम प्रश्न

प्रथम अध्याय—धर्म, उपनयन, शुद्धिप्रकरण, छात्र के नियम। द्वितीय अध्याय—ब्रह्मचारी के नियम, आचरण और निषेध। तृतीय अध्याय—गृहस्थाश्रम, संन्यास और वानप्रस्थ के नियम। चतुर्थ अध्याय—गृहस्थ का धर्म, विवाह और पुत्रों का प्रकार। पंचम अध्याय—पंच महायज्ञ और मधुपर्क। षष्ठ अध्याय—अभिवादन के नियम, और श्रेष्ठ व्यक्तियों के प्रति आचरण। सप्तम अध्याय—गुरु सेवा और ब्राह्मण के कर्तव्य। अष्टम अध्याय—राजा और बहुश्रुत संस्कार। नवम अध्याय—व्रत और आचरण के दैनिक नियम।

द्वितीय प्रश्न

प्रथम अध्याय—चारों वर्णों के कर्तव्य। द्वितीय अध्याय—राजा के कर्तव्य और धर्मनिर्णय की प्रक्रिया। तृतीय अध्याय—अपराध और उनके दण्ड, ब्याज, ऋण। चतुर्थ अध्याय—विवाद और उनके निर्णय, साक्षी और व्यवहार, सत्यभाषण, न्यायकर्ता। पंचम अध्याय—मृत्यु और जन्मविषयक अशौच। षष्ठ अध्याय—श्राद्धकर्म। सप्तम अध्याय—वेदाध्ययन की विधि और अनध्याय। अष्टम अध्याय—भक्ष्य और पेय पदार्थ। नवम अध्याय—स्त्री के धर्म।

तृतीय प्रश्न

प्रथम अध्याय—प्रायश्चित्त। द्वितीय अध्याय—त्याज्य व्यक्ति। तृतीय अध्याय—पातक और महापातक। चतुर्थ अध्याय से सप्तम अध्याय—प्रायश्चित्त। अष्टम अध्याय—कृच्छ्र व्रत। नवम अध्याय—चान्द्रायण व्रत और दशम अध्याय—सम्पत्ति का विभाजन।

धर्म

धर्म शब्द का वास्तविक अर्थ जानने के लिए जब हम अपने प्राचीनतम साहित्य 'ऋग्वेद' का अवलोकन करते हैं तो हम देखते हैं कि इस शब्द का प्रयोग विशेषण या संज्ञा शब्द के रूप में हुआ है। प्रायः यह शब्द 'धर्मन्' है और इसका प्रयोग नपुंसकलिंग में हुआ है। 'धर्मन्' शब्द का प्रयोग निम्नलिखित स्थलों पर हुआ है—ऋग्वेद—१. २२. १८, १. १६४. ४३, ५०, ३. ३. १, ३. १७.

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१, ३. ६०. ६, ५. २६. ६, ५. ६३. ७, ५. ७२. २ । अथर्ववेद में १४. १. ५१ वाजसनेयिसंहिता में १०. २९ और धर्म शब्द का प्रयोग अथर्ववेद में ११, ७. १७ और १२. ५. ७, १. ३. १ तैत्तिरीयसंहिता ३. ५. २. २ वाजसनेयिसंहिता १५. ६, २०, ९. ३०. ६ । अधिकतर वैदिक साहित्य में धर्म का अर्थ है 'धार्मिक विधि' 'धार्मिक क्रिया', 'निश्चित नियम', 'आचरण नियम' जैसा कि इन प्रयोगों से स्पष्ट है :

"पितुं न स्तोषं महो धर्माणं तविषीम्" १. १८७. १
"इममञ्जस्मामुभये अकृण्वत धर्माणमग्निं विदथस्य साधनम्"
"आ प्र रजांसि दिव्यानि पार्थिवा श्लोकं देवः कृणुते स्वाय धर्मणे ।"
"धर्मणा मित्रावरुणा विपश्चिता व्रता रक्षेथे असुरस्य मायया ।" ५. ६३. ७
"द्यावापृथिवी वरुणस्य धर्मणा विष्कभिते अनरे भूरिरेतसा ।" ६. ७०. १
"अचित्ती यत्तव धर्मा युयोपिम मा नस्तस्मादेनसो देव रीरिषः ।" ७. ८९. ५
"सनता धर्माणि" ३. ३. १
"प्रथमा धर्मा" ३. १७. १
"तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्" १०. ९०. १६

अथर्ववेद के निम्नलिखित मन्त्र में धर्म का अर्थ 'पुष्प फल' प्रतीत होता है :-
ऋतं सत्यं तपो राष्ट्रं श्रमो धर्मश्च कर्म च ।
भूतं भविष्यदुच्छिष्टे वीर्यं लक्ष्मीर्बलं जले ॥ ९. ९. १७ ।

किन्तु आगे चलकर धर्म वर्णाश्रम की विधियों के समीप आ जाता है । उपनिषद् काल में धर्म द्वारा वर्ण और आश्रमों के आचारों एवं संस्कारों का स्पष्ट बोध होता था यह तथ्य छान्दोग्योपनिषद २. २३ से सिद्ध होता है—

"त्रयो धर्मस्कन्धा यज्ञोऽध्ययनं दानमिति प्रथमस्तप एवेति द्वितीयो ब्रह्मचार्याचार्यकुलवासी तृतीयोऽत्यन्तमात्मानमाचार्यकुलेऽवसादयन् । सर्वं एते पुण्यश्लोका भवन्ति ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति ॥"

धर्म को जिस रूप में धर्मशास्त्रों में—धर्मसूत्रों और स्मृतियों में वर्णित किया गया है उसके अन्तर्गत चार प्रकार के धार्मिक नियमों का निर्देश किया जा सकता हैं : १. वर्णधर्म, २. आश्रमधर्म, ३. नैमित्तिकधर्म जैसे प्रायश्चित्त, ४. गुणधर्म, राजा के कर्त्तव्य ।

धर्म की कुछ परिभाषाएं बहुत प्रचलित हैं जिनका यहाँ उल्लेख करना उचित होगा ।

"चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः" अर्थात् वेद में बताये गये प्रेरक नियम और लक्षण धर्म हैं, उन नियमों का आचरण ही धर्म का आचरण है ।
—जैमिनि, पूर्वमीमांसासूत्र १. १. २

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वैशेषिकसूत्र में धर्म उसे माना गया है जिससे अभ्युदय और निःश्रेयस् की सिद्धि होती है—“यतोऽभ्युदयनिःश्रेयससिद्धि स धर्मः”।

श्रुतिप्रमाणको धर्मः हारीत, कुल्लूक, मनु० २. १ की टीका। श्रुतिस्मृतिविहितो धर्मः—श्रुति और स्मृति द्वारा विहित आचरण धर्म है।—वसिष्ठधर्मसूत्र १. ४. ६।

इन कतिपय परिभाषाओं से यही ज्ञात होता है कि भारतीय धर्म का मूल है वेद और स्मृति, और इनको प्रमाण मानकर विहित नियम या आचार ही धर्म हैं। धर्म के इन उपादानों और आधारों पर विचार करना आवश्यक है।

धर्म के उपादान—

धर्म के उपादानों या स्रोतों का उल्लेख प्रायः नियमपूर्वक प्रत्येक धर्मसूत्र और स्मृति में किया गया है। गौतमधर्मसूत्र में यह स्पष्टतः कहा गया है कि वेद धर्म का मूल है—“वेदो धर्ममूलम्। तद्विदां” च स्मृतिशीले। आपस्तम्बधर्मसूत्र—“धर्मसमयः प्रमाणं वेदाश्च” १. १. १. २। धर्म को जानने वाले वेद का मर्म समझने वाले व्यक्तियों का मत ही वेद का प्रमाण है। इसी प्रकार वसिष्ठधर्मसूत्र में भी, जिसकी धर्म की परिभाषा का ऊपर उल्लेख किया गया है, श्रुति और स्मृति द्वारा विहित आचरण-नियमों को धर्म माना गया है तथा उसके अभाव में शिष्ट जनों के आचार को प्रमाण माना गया है—

“श्रुतिस्मृतिविहितो धर्मः। तदलाभे शिष्टाचारः प्रमाणम्। शिष्टः पुनरकामात्मा।”

इसी प्रकार मनुस्मृति में वेद, स्मृति, वेदज्ञों के आचरण के अलावा अपनी आत्मा की तुष्टि को भी धर्म का मूल कहा गया है—

“वेदोऽखिलो धर्ममूलं स्मृतिशीले च तद्विदाम्।
आचारश्चैव साधूनामात्मनस्तुष्टिरेव च ॥” २. ६

याज्ञवल्क्यस्मृति में उपर्युक्त के साथ-साथ उचित संकल्प से उत्पन्न अभिलाषा या इच्छा को भी धर्म का मूल स्वीकारा गया है :—

“श्रुतिः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः।
सम्यक्संकल्पजः कामो धर्ममूलमिदं स्मृतम् ॥ १. ७

इस प्रकार धर्म के उपादान, स्रोत, मूल या प्रमाण स्वयं धर्मशास्त्रों की दृष्टि में ये हैं : १—वेद, २—वेद से भिन्न परम्परागत ज्ञान अर्थात् स्मृति, ३—श्रेष्ठ लोगों के आचार-विचार, ४—अपनी विवेकबुद्धि से स्वयं को रुचिकर लगनेवाला आचरण और उचित संकल्प से उत्पन्न इच्छा।

वेद और धर्मशास्त्रों पर दृष्टिपात करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि धर्मशास्त्रों में जो कुछ भी कहा गया है उसका आधार वेद ही है और वेद की मान्यताओं के अनुसार ही धर्मसूत्रों के नियमों की रचना हुई। वेद की संहिताओं में और ब्राह्मण-ग्रन्थों में धर्मसूत्रों के विषयों का प्रसंगतः उल्लेख प्रचुर मात्रा में मिलता है, जैसे विवाह, उत्तराधिकार, श्राद्ध, स्त्री की स्थिति आदि। संहिताओं और ब्राह्मणों में

३ गौ० भू०

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जिस समाज और सभ्यता का दर्शन होता है वह धर्मशास्त्र की व्यवस्थाओं की व्यावहारिक पृष्ठभूमि है। आख्यानों में भी नियमों का पोषण हुआ दिखायी पड़ता है, जिनका उपदेश धर्मशास्त्रों ने दिया है। ब्रह्मचर्य का महत्व, उत्तराधिकार और सम्पत्ति का विभाजन, यज्ञ और अतिथिसत्कार ऐसे ही विषय हैं, जिन पर धर्मसूत्रों से पूर्ववर्ती वैदिक साहित्य में भी अनेक स्थलों पर विचार हुआ है। जैसा कि म० म० काणे ने कहा है : "कालान्तर में धर्मशास्त्रों में जो विधियाँ बतलायी गयीं, उनका मूल वैदिक साहित्य में अक्षुण्ण रूप में पाया जाता है। धर्मशास्त्रों ने वेद को जो धर्म का मूल कहा है वह उचित ही है।"—धर्मशास्त्र का इतिहास, पृ० ७, अनु० अ० काश्यप।

भारतीय धर्म का स्वरूप

भारतीय संस्कृति और विशेषतः धर्म पर भिन्न-भिन्न विचारकों ने भिन्न-भिन्न प्रकार से दृष्टिपात किया है। कुछ ने इसके मर्म को समझा है तो कुछ ने इसके वास्तविक तत्त्व को जाने बिना अपनी आलोचनात्मक प्रतिभा का दुरुपयोग मात्र किया है। वस्तुतः भारतीय धर्म या हिन्दू धर्म को किसी एक विशेष शब्द द्वारा नहीं व्यक्त किया जा सकता। जान मेकेंजी ने यह परामर्श ठीक ही दिया है कि धर्म में 'रिलीजन', 'वर्च्यू', ला, और ड्यूटी, अंग्रेजी के इन चारों पदों का अर्थ समाहित समझना चाहिए। 'हिन्दू एथिक्स' नामक पुस्तक के पृ० ३८ पर वे कहते हैं :

“In India in those days no clear distinction was drawn between moral and religious duty, usage, customary observance and law and dharma was the term which was applied to the whole complex of forms of conduct that were settled or established.”

परन्तु मेकेंजी साहब का यह कथन भ्रमपूर्ण है कि हिन्दू ने धर्म को अन्य सभी व्यवस्थित नियमों से पृथक् नहीं किया, मानो ऐसा अज्ञानवश किया गया हो। वस्तुस्थिति तो यह है कि हिन्दू धर्म में धर्म बहुत व्यापक रहा है। वह जीवन के विविध पक्षों के पार्थक्य को ज्ञानपूर्वक समाप्त करता है। समन्वय उसका मूलमन्त्र है। मानवजीवन के चार पुरुषार्थ समन्वित होकर ही उपयोगी बनते हैं अलग-अलग नहीं। हिन्दू धर्म कोरा आदर्शवादी नहीं है, अपितु वह व्यावहारिक जीवन में वास्तविक और आदर्श का समन्वय करता है। यह धर्म मनुष्य से भिन्न नहीं है, अलग नहीं है। यह उसकी मौलिक अहंता है, जिसके अभाव में मनुष्य मनुष्य नहीं रह जाता। पशु में और धर्महीन मनुष्य में कोई भेद नहीं रह जाता, अतः भारतीय धर्म मनुष्य के समूचे व्यक्तित्व से सम्बद्ध है। वह उसके छोटे-छोटे कार्यों पर भी दृष्टिपात करता है और उनका नियमन करता है। मनुष्य को प्रत्येक स्थिति और अवस्था के परिप्रेक्ष्य में देखता है—सुख में, दुःख में, समृद्धि में और विपत्ति में भी। उसके सामाजिक, पारिवारिक, वैयक्तिक और पारलौकिक जीवन

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पर विचार करता है। भारतीय धर्म मनुष्य से संबद्ध सभी बातों पर इस प्रकार दृष्टिपात करता है और उन्हें इस प्रकार व्याप्त करता है कि सम्पूर्ण जीवन धर्ममय प्रतीत होता है। संस्कारों की शृङ्खला रेलगाड़ी की पटरी की तरह बनायी गयी है, जिससे जीवन की गाड़ी उतरने पर अनर्थ ही होता है। मानवजीवन की अवधि में भिन्न-भिन्न अवस्था में उस अवस्था के उपयुक्त आश्रमों का विधान संस्कारों की व्यवस्था को और भी पुष्टि प्रदान करता है।

धर्म का जीवन के साथ तादात्म्य इतना स्पष्ट है कि पाश्चात्य विद्वान् भी भारतीय धर्म के इस अनूठे स्वरूप से प्रभावित होते हैं। प्रो० माक्स म्यूलर ने इस रूप को सही ढंग से समझा है और अपना विचार व्यक्त करते हुए लिखा है : "प्राचीन भारतवासियों के लिए सबसे पहले धर्म अनेक विषयों के बीच एक रुचि का विषय नहीं था, यह सबका आत्मार्पण करने वाली रुचि थी। इसके अन्तर्गत न केवल पूजा और प्रार्थना आती थी, परन्तु वह सब भी आता था जिसे हम दर्शन, नैतिकता, कानून और शासन कहते हैं—सभी धर्म से व्याप्त थे। उनका सम्पूर्ण जीवन उनके लिए एक धर्म था और दूसरी चीजें मानो इस जीवन की भौतिक आवश्यकताओं के लिए निर्मित सुविधा मात्र थीं।" —व्हाट कैन इण्डिया टीच अस, पृ० १०७।

"धर्मो रक्षति रक्षितः" धर्म की रक्षा करने पर धर्म मनुष्य की रक्षा करता है। धर्महीन उच्छृङ्खल जीवन विनाश और विक्रिया की ओर ही ले जाता है। जीवन को एक उद्देश्य प्रदान करता है, उसे एक सुनिश्चित मार्ग प्रदान करता है, जिस पर चलकर आदमी अपना विकास कर सकता है, जीवन के कर्त्तव्यों का पालन कर सकता है। साथ ही इस जीवन से परे दूसरे जीवन की स्पृहा से प्रेरित होता है। परलोक की यह स्पृहा कल्पना की तरंग में बहते हुए कवि की कृति नहीं, वास्तविक जीवन की अनुभूति की अभिव्यक्ति है। इसी पारलौकिक स्पृहा को कवि वर्डस्वर्थ ने इन शब्दों में व्यक्त किया है—

"those obstinate questionings
Of sense and outward things,
Falling form us, vanishings,
Blank misgivings of a creature
Moving about in worlds not realised."

माक्स म्यूलर ने भारतीय चरित्र की विशेषता यह बतायी है कि वह पारलौकिक होता है : "यदि मुझसे एक शब्द में भारतीय चरित्र की विशेषता बताने को कहा जाय तो मैं यही कहूँगा कि वह पारलौकिक था।"—"भारतीय चरित्र में इस पारलौकिक मनोवृत्ति ने अन्य किसी देश की अपेक्षा अधिक प्राधान्य प्राप्त किया।"—व्हाट कैन इण्डिया टीच अस, पृ० १०४, १०५।

भारतीय धर्म और दर्शन एक दूसरे से पृथक् नहीं हैं अपितु एक ही वस्तु के दो पहलू हैं। यद्यपि इन दोनों में इतना अन्तर अवश्य होता है कि धर्म में विश्वास

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और भावना मुख्य होती है जबकि दर्शन में विचार और तर्क प्रमुख होते हैं। भारतीय धर्म का दर्शन एवं नीति से कितना अनोखा सम्बन्ध है इसे हम आचार की महत्ता पर विचार करते समय देखेंगे। धर्म के साथ अर्थ, काम, मोक्ष का समन्वय भारतीय जीवन का उद्देश्य है और इस कारण यह धर्म सन्तुलित रूप में आदर्शवादी है और यथार्थवादी भी, लौकिक है और पारलौकिक भी, आध्यात्मिक है और भौतिक भी। वह आचरण की वस्तु है। आचार उसका मूलाधार है। उसकी नींव गहरी है और उसके कुछ मौलिक तत्त्व हैं जो उसे स्थायित्व प्रदान करते हैं। एक पाश्चात्य आलोचक ने इसी बात का संकेत इन वाक्यों में किया है :—"भारत का आध्यात्मिक इतिहास उसके अत्यन्त मौलिक विचार से घनिष्ठ रूप से सम्बद्ध है और यह बात सोची भी नहीं जा सकती कि इस प्रकार की संस्कृति जो हजारों वर्षों से भारत में फूलती-फलती रही है, इतनी गहरी जड़ों पर आधारित होती और स्वयं को इतनी दृढ़ता से बनाये रखती अगर इसमें महान् एवं चिरस्थायी मूल्य वाले तत्त्व निहित न होते।”

भारतीय धर्म में मानवीय प्रतिभा के एक विकसित रूप का उपयोग दिखायी देता है, उसमें मानजीवन की अनेक समस्याओं पर भलीभाँति विचार करके व्यवस्था दी गयी है। मैक्स म्यूल्लर ने भारतीय धर्म और संस्कृति की उपलब्धियों का इन शब्दों में उल्लेख किया है :—

“If I were asked under what sky the human mind has fully developed some of its choicest gifts, has most deeply pondered on the greatest problems of life, and has found solutions of sone of them which well deserve the attention even of those who have studied Plato and Kant—I should point to India.”

—What Can India Teach Us ?—p.6

आचार इस धर्म का मूल है और धर्म के ज्ञान के साथ उसका अनुष्ठान और व्यवहार ही उसके वास्तविक प्रयोजन को सिद्ध करते हैं। गौतमधर्मसूत्र के शब्दों में—

“धर्मिणां विशेषेण स्वर्गं लोकं धर्मविदाप्नोति ज्ञानाभिनिवेशाभ्याम्”। इस धर्म का शाश्वत सन्देश है :—

“धर्मं चरत मा धर्मं सत्यं वदत मानृतम् ।
दीर्घं पश्यत मा ह्रस्वं परं पश्यत मापरम् ॥ वसिष्ठ ध० सू०

धर्म का आचरण करो, अधर्म का नहीं। सत्य बोलो, झूठ मत बोलो। दूर तक देखो, संकुचित दृष्टि मत रखो, हीन वस्तु देखकर अपना विचार हीन मत बनाओ, श्रेष्ठ वस्तु को देखो और जीवन का लक्ष्य सदा ऊँचा से ऊँचा बनाये रखो।

आचार और नैतिक भावना

भारतीय संस्कृति का मूल आधार है आचार। आचार के आधार पर ही हिन्दू समाज का निर्माण हुआ था और जब तक व्यावहारिक जीवन में इस आधार को

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प्राधान्य मिला तबतक समुन्नति तथा समृद्धि का समय बना रहा । धर्म का व्यावहारिक पहलू है आचार और इसी कारण इसे परम धर्म भी कहा गया है, धर्म की आधारशिला कहा गया है :

“आचारः परमो धर्मः सर्वेषामिति निश्चयः ।
हीनाचारपरीतात्मा प्रेत्य चेह च नश्यति ॥”—वसिष्ठधर्मसूत्र ६।१

आचार से हीन व्यक्ति के लिए लोक में कोई सुख नहीं है और उसे दूसरे लोक में भी सुख की प्राप्ति नहीं होती । कोई व्यक्ति वेद और शास्त्रों के ज्ञान में भले ही पारंगत हो यदि आचार से भ्रष्ट है तो सम्पूर्ण धर्मज्ञान उसे कोई लाभ नहीं पहुँचाते और न आनन्द ही देते हैं जैसे अन्धे के हृदय में उसकी सुन्दर प्रियतमा भी कोई सौन्दर्यानुभूति का सुख उत्पन्न नहीं करती ।

आचारहीनस्य तु ब्राह्मणस्य वेदाः षडङ्गास्त्वखिलाः सयज्ञाः ।
कां प्रीतिमुत्पादयितुं समर्था अन्धस्य दारा इव दर्शनीयाः ॥ वही, ६।४

इस प्रकार धर्मशास्त्रकारों का आग्रह आचार के प्रति बराबर रहा है और वे आचार को सम्मान, दीर्घ जीवन और सुख का कारण मानते हैं ।

आचारो भूतिजनन आचारः कीर्तिवर्धनः ।
आचाराद् वर्धते ह्यायुराचारो हन्त्यलक्षणम् ॥

और आचार की इसी महिमा के कारण ही सदाचार को धर्म का साधन माना गया है, जैसे वेद और स्मृति को । “वेदः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः ।” सम्पूर्ण ज्ञान का उपयोग है उस ज्ञान को आचार में परिणत करना । इसी कारण भारत का दार्शनिक कोरे चिन्तन में समय नहीं गंवाता । वह अपने जीवन को अपने दर्शन के अनुरूप ढालता है और आदर्श प्रस्तुत करता है । दर्शन और आचारशास्त्र या नीतिशास्त्र का परस्पर अन्योन्याश्रय संबन्ध रहा है और यह संबन्ध वैसा ही रहा है जैसा कि “विज्ञान और प्रयोग का, ज्ञान और योग का ।” एक ओर धर्म का मूल आधार है नीति और दूसरी ओर नीति दर्शन का व्यावहारिक पक्ष है, इस प्रकार धर्म, दर्शन और नीति एक दूसरे से अपृथक् हैं, वे एक दूसरे पर निर्भर हैं और एक दूसरे के पूरक भी हैं । इसी बात का उल्लेख जान केअर्ड ने ‘एन इण्ट्रोडक्शन टू द फिलासाफी आफ रिलीजन’ पुस्तक में किया है :—

“Indian philosophers and thinkers have even declared that the philosophy and ethics both are inter-dependent. There can be no intellectual growth without a morally elevated life. To be a good philosopher a man should be religious, moral and of good conduct.”

भारतीय धर्म या दर्शन में केवल नैतिक भावनाओं का प्रतिपादन ही नहीं किया गया है, अपितु वास्तविक जीवन में उनकी अभिव्यक्ति प्रस्तुत की गयी है और इस अभिव्यक्ति का मनोवैज्ञानिक आधार भी प्रतिस्थापित किया गया है।

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इन्हीं नैतिक भावनाओं के सन्दर्भ में मेकेंजी जैसे आलोचनात्मक दृष्टि वाले लेखक ने भी यह स्वीकारा है कि इनमें ऐसे तत्त्व निहित हैं जो स्वतः इतने मूल्य के हैं कि वे विश्व के विचार और संस्कृति को समृद्ध कर सकते हैं।

“We may claim for them that they contain elements which are of great value in themselves, and which may serve to enrich the thought and culture of the world.”

<div align="right">—Hindu Ethics, p. 241.</div>

वस्तुतः आचार वह कसौटी है जिस पर व्यक्ति की योग्यता और अर्हा का आकलन होता है। चरित्रहीन विद्वान् की विद्वत्ता फीकी होती है और शीलहीना सुन्दरी का सौन्दर्य केवल निम्नकोटि के विचारों को उत्तेजित करता है, आत्मिक सन्तोष का बोध नहीं कराता। ऊँचे पद पर आसीन और परोपदेश में कुशल व्यक्ति का छद्मव्यापार एवं अनैतिक आचरण जब प्रकाश में आता है तो दुनिया की आँखों में धूल झोंकने की उसकी सारी चालों पर पानी फिर जाता है। आचार और ज्ञान का समन्वय तथा परस्पर समायोजन ही हमारी नैतिक भावना का पहला सूत्र है, जिसने महान् दार्शनिकों एवं अलौकिक प्रतिभा और प्रभाव वाले पुरुषों को जन्म दिया है। भारतीय नीतिशास्त्री जब किसी नियम का विधान करता है तब वह उसे मानव के यथार्थ जीवन के सन्दर्भ में परख लेता है और मानव की स्वाभाविक कमजोरियों को भी ध्यान में रखता है। हरेक अवसर पर वह मनोविज्ञान के अनुसार मनुष्य के आचरण में उत्कर्ष लाने की व्यवस्था करता है। वह जानता है कि गलती मनुष्य से होती है, मनुष्य पतनोन्मुख होता है, यह सर्वथा स्वाभाविक है। किन्तु इन प्रवृत्तियों से दूर होने में ही वह मानवकल्याण की संभावना देखता है और इसी लिए धर्म की व्यवस्था करता है, जिसके अभाव में मनुष्य और पशु में कोई भेद नहीं रह जाता। मनु ने इसी का संकेत किया है :—

“न मांसभक्षणे दोषो न मद्ये न च मैथुने ।
प्रवृत्तिरेषा भूतानां निवृत्तिस्तु महाफला ।”

यही नहीं भारतीय धर्म में न केवल मनुष्यों को अपितु देवताओं तक को अनैतिक आचरण की ओर उन्मुख दिखाया गया है और उनके लिए भी आचार की पवित्रता को सर्वोपरि बताया गया है। भारतीय आख्यानों में इस बात को सर्वत्र प्रमाणित किया गया है कि सारी बातें एक ओर हैं और मनुष्य का आचार एक ओर, इसी आधार के कारण निम्नकोटि का व्यक्ति भी ईश्वर के तत्त्व का दर्शन कर सकता है, उच्चवर्ण के व्यक्ति को शिक्षा दे सकता है। इसी आचार के अभाव में महर्षि की तपस्या भी व्यर्थ हो जाती है और वह सामान्य व्यक्ति की तरह पाप का भागी होता है।

जिस वर्णव्यवस्था की सम्प्रति मुक्तकण्ठ से निन्दा करना हमारा कर्तव्य है और जो निश्चय अच्छी नहीं है, वह भी मूल रूप में आचार के आधार पर ही थी।

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जिस समय उसने आचार का विवेक छोड़कर केवल पद और कुल को आधार बनाया तब से वह अपनी अच्छाइयों से वियुक्त हो गयी। जब पद के अनुसार सम्मान प्राप्त होने लगता है, आचरण और योग्यता के अनुसार नहीं तब स्वाभाविक है कि उस पद पर पहुँचने के लिए न तो योग्यता की कोई इच्छा या प्रयत्न करेगा और न उस पद को प्राप्त कर लेने पर अयोग्य या आचारहीन व्यक्ति योग्यता की चर्चा होने देगा, उल्टे वह ऐसी व्यवस्था करेगा कि उसका पद सदैव सुरक्षित रहे। इसके लिए वह धर्म के नाम पर अपने चारों ओर कटीले तारों की दीवार खड़ी करेगा। ऐसी ही व्यवस्था का रूप वर्णव्यवस्था ने ले लिया।

धर्मशास्त्र की दृष्टि में आचार का इतना महत्त्व है कि आचारहीन पिता तक का परित्याग करने का आदेश दिया गया है :

“त्यजेत्पितरं राजघातकं शूद्रयाजकं शूद्रार्थयाजकं वेदविप्लावकं
भ्रूणहनं यश्चान्त्यावसायिभिः सह संवसेदन्त्यावसायिन्यां वा ।”
\hfill ३. २. १. पृ० २०७

ऐसे व्यक्ति के सामाजिक अपमान का विधान भी इसी बात का संकेत करता है कि आचार से च्युत व्यक्ति को समाज में सामाजिक जीवन व्यतीत करने का अधिकार नहीं है। उससे भाषण या संबन्ध करने वाले व्यक्ति को भी दुराचार में प्रोत्साहन देने के लिए दण्ड की व्यवस्था की गयी है, किन्तु उसके प्रायश्चित्त कर लेने पर तथा अपना आचरण सुधार लेने पर पुनः समाज में प्रवेश करने का द्वार खोल दिया गया है।

पाप और प्रायश्चित्त की धारणा के पीछे भी आचार के अतिरिक्त और क्या हो सकता है ? समाज में जीने और दूसरों को जीने देने का मन्त्र ही इस लोक में कल्याण का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। हमारे धर्मसूत्र में व्यक्ति को पर्याप्त महत्त्व मिला है। किन्तु इस महत्त्व की शर्त है कि वह आचार या धर्म का पालन करे। यदि वह आचार का उल्लङ्घन करता है तो उसे जीने का अधिकार नहीं, उसे पाप से तभी मुक्ति हो सकती है जब वह प्रायश्चित्त करे, अर्थात् पाप गम्भीर हो तो जीवन का अन्त कर दे, क्योंकि ऐसा व्यक्ति समाज के अन्य लोगों के लिए एक बुरा उदाहरण प्रस्तुत करेगा। हमारा धर्मसूत्र कहता है कि इस संसार में मनुष्य बुरे कर्मों से पाप से सन जाता है : “अथ खल्वयं पुरुषो याप्येन कर्मणा लिप्यते... ३. १. २.। और तब मनुष्य के ये कर्म स्थायी फल उत्पन्न करते हैं। पाप और प्रायश्चित्त का विचार धर्मसूत्र में नितान्त भौतिक या व्यावहारिक है। इनका सीधा संबन्ध शरीर की यातना से है किन्तु पाप करने वाला साधन भी तो शरीर ही है। साथ ही साथ प्रायश्चित्त की मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमि यह है कि जप और दान तो साक्षात् उत्तम विचार और परोपकार की प्रेरणा देते हैं। पाप का प्रकाशन और पश्चाताप भी हो जाता है। तप, उपवास और होम धर्म में आस्था उत्पन्न करके पुनः उत्तम आचरण की प्रेरणा देते हैं। किन्तु यह मानना पड़ेगा कि धर्म-सूत्रकार का प्रायश्चित्त का विधान करते समय साक्षात् प्रयोजन है लोक और

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परलोक की प्राप्ति। वह लोक की अपेक्षा परलोक की अधिक परवाह करता है और सभी लौकिक कर्मों को इस लिए करने का आदेश देता है कि उनसे परलोक मिलने की संभावना है। यह धर्मभीरुता और ईश्वर या परलोक का भय मनुष्य के आचरण को निरन्तर सही दिशा की ओर प्रेरित करता रहा है, किन्तु हम धर्मसूत्र में देखते हैं कि पाप-प्रायश्चित्त और अपराध-दण्ड की नैतिक भावनाओं के ऊपर भी वर्ण का विचार हावी हो जाता है। यदि कोई क्रोध में आकर ब्राह्मण के ऊपर हाथ या हथियार उठाता है तो वह सौ वर्ष तक स्वर्ग नहीं पाता, यदि उस पर प्रहार कर देता है तो वह एक हजार वर्ष तक स्वर्ग पाने से रह जाता है। उसके प्रहार से ब्राह्मण का खून बहे तो उसके खून से जितने रजकण भींगते हैं उतने वर्षों तक वह स्वर्ग नहीं पाता।

“अभिक्रुद्धावगोरणं ब्राह्मणस्य वर्षशतमस्वर्ग्यम् । निघाते सहस्रम् । लोहितदर्शने यावतस्तत्प्रस्कन्द्य पांसून्संगृह्णीयात् ॥ ३. ३. २०–२२

जानबूझकर ब्राह्मण की हत्या करने वाला मृत्यु का भागी होता है। उसे कठोर प्रायश्चित्त करना होता है। किन्तु यदि वह ब्राह्मण की प्राणरक्षा करे या उसके धन की रक्षा करे तो वह पाप से छूट जाता है : “प्राणलाभे वा तन्निमित्ते ब्राह्मणस्य” ३. ४. ७। ब्राह्मण की हत्या का असफल प्रयत्न करने पर भी वही पाप और प्रायश्चित्त होता है जो उसके वध का तथा ब्राह्मण की पत्नी के गर्भ का नाश करनेपर भी वही पाप होता है। किन्तु दूसरी ओर अन्य वर्ण के व्यक्तियों के वध पर पाप कम होता है। शूद्र की हत्या का तो यही प्रायश्चित्त है कि साल भर व्रत करके दश गाय और एक सांड़ का दान कर दे बस पाप से छुटकारा मिल जाता है। जितना पाप एक गाय के वध का होता है उससे भी कम पाप शूद्र के वध का होता है। गाय का वध वैश्य के वध के बराबर बताया गया है और इसी प्रकार मेढक, नेवला, कौआ, कृकलास, चूहा, छछून्दर के एक साथ वध का पाप भी शूद्र के वध के पाप से बढ़कर होता है। बिना अस्थिवाले एक सहस्र जीवों का वध भी शूद्र के वध से अधिक पापयुक्त होता है। ३. ४. १८-१९।

इसी प्रकार अन्य पापकर्मों और उनके प्रायश्चित्त के विषय में भी धारणाएँ कुछ असंगतिपूर्ण हैं। कुल मिलाकर पाप से विरक्ति का ध्येय बनाया गया है और निरन्तर इस बात का ध्यान दिया गया है कि प्रायश्चित्त का भय दिखाकर पाप से दूर करने का उपाय किया जाय।

अपराध और दण्ड की नैतिक भावना भी धर्मसूत्र में सर्वत्र व्याप्त है और उसके सन्दर्भ में भी बहुत कुछ वैसी मान्यतायें हैं जैसी पाप और प्रायश्चित्त के विषय में। समाज में राजा इसी लिए होता है कि वह धर्मभ्रष्ट लोगों को दण्ड देकर उन्हें सही मार्ग पर ले आवे : “चलतश्चैतान्स्वधर्मे स्थापयेत्” २. २. १० धर्मसूत्र में प्रायः विवेचित अपराधों में अधिकतर सामान्य व्यवहार, चोरी, दूसरे के साथ छल, और व्यभिचार के अपराधों का उल्लेख है। अपराध के लिए दण्डकी व्यवस्था में भी अपराधी के वर्ण का विचार सर्वोपरि आ जाता है, यद्यपि धर्म या कानून के