गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Gautama Dharmasutra Hindi
महर्षि गौतम द्वारा
स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)
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है जहाँ उसे व्यावहारिक जगत् में दूसरों के साथ रहते हुए अपने आचार-व्यवहार को नियमित और संयमित करना है, उसे कुछ कर्तव्यों एवं दायित्वों का पालन करना होता है, कुछ अधिकार प्राप्त करने होते हैं और अपने अपराधों के लिए दण्ड भोगने होते हैं। इस प्रकार धर्मसूत्रों का वातावरण अधिक सामाजिक और नैतिक है। जैसा हम कह आये हैं धर्मसूत्रों में गृह्यसूत्रों के कुछ विषयों पर भी विचार किया गया है जैसे विवाह, संस्कार, मधुपर्क, स्नातक का जीवन, श्राद्धकर्म आदि। संक्षेप में धर्मसूत्रों के वर्ण्यविषय की सूची इस प्रकार दी जा सकती है :—धर्म और उसके उपादान, चारों वर्णों के आचार और कर्तव्य एवं जीवन-वृत्तियाँ, ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास आश्रमों के आचार, उपजातियाँ और मिश्रित जातियाँ, सपिण्ड और सगोत्र, पाप और उनके प्रायश्चित्त एवं व्रत, अशौच और उससे शुद्धि, ऋण, ब्याज, साक्षी और न्यायव्यवहार, अपराध और उनके दण्ड, राजा और राजा के कर्तव्य, स्त्री के कर्तव्य, पुत्र और दत्तक पुत्र, उत्तराधिकार, स्त्रीधन और सम्पत्ति का विभाजन।
धर्मसूत्र और स्मृतियाँ
‘स्मृति’ शब्द का प्रयोग श्रुति अर्थात् वेद के ईश्वरप्रकाशित एवं ऋषिदृष्ट वाङ्मय से भिन्न साहित्य के लिए हुआ है। श्रुति और स्मृति के विषय में आगे धर्म के स्वरूप का विवेचन करते समय विचार किया गया है। उपर्युक्त अर्थ के अनुसार धर्मसूत्र भी स्मृति ग्रन्थ है :
“श्रुतिस्तु वेदो विज्ञेयो धर्मशास्त्रं तु वै स्मृतिः।” मनु० २. १०
किन्तु संकुचित अर्थ में स्मृति से धर्मशास्त्र की उन रचनाओं का तात्पर्य है जो प्रायः श्लोकों में हैं और उन्हीं विषयों का विवेचन करती हैं जिनका प्रतिपादन धर्मसूत्रों में किया गया है। इन स्मृतियों में अग्रणी हैं—मनु और याज्ञवल्क्य की स्मृतियाँ। “मनुस्मृति” सबसे प्राचीन है और ईसा से कई सौ वर्ष पहले रची गयी थी। अन्य स्मृतियाँ ४०० से १००० ई० के बीच की हैं। स्मृतिकारों की संख्या विस्तृत है, मुख्य स्मृतिकार १८ हैं, इनके अतिरिक्त २१ अन्य स्मृतिकार हैं जिनके नाम वीरमित्रोदय ने गिनाये हैं।
डॉ० काणे ने अपने धर्मशास्त्र के इतिहास में धर्मसूत्रों एवं स्मृतियों के प्रमुख लक्षण स्पष्टतः निर्दिष्ट किये हैं, जिन्हें यहाँ साभार उल्लिखित करना असंगत नहीं होगा।
१. अनेक धर्मसूत्र किसी चरण के कल्प के अंग हैं, अथवा उनका गहरा संबन्ध गृह्यसूत्रों से है।
२. धर्मसूत्रों में कभी-कभी अपने चरण तथा अपने वेद के उद्धरण विशेषतः दिये गये हैं।
३. प्राचीन धर्मसूत्रों के रचयिताओं को ऋषियों का ओहदा प्राप्त नहीं है और न वे अपने को मानवीय धरातल से ऊपर उठे हुए अलौकिक बताते हैं, इसके