भारतकोश
गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Gautama Dharmasutra Hindi

महर्षि गौतम द्वारा

स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished360 पृष्ठ

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वैशेषिकसूत्र में धर्म उसे माना गया है जिससे अभ्युदय और निःश्रेयस् की सिद्धि होती है—“यतोऽभ्युदयनिःश्रेयससिद्धि स धर्मः”।

श्रुतिप्रमाणको धर्मः हारीत, कुल्लूक, मनु० २. १ की टीका। श्रुतिस्मृतिविहितो धर्मः—श्रुति और स्मृति द्वारा विहित आचरण धर्म है।—वसिष्ठधर्मसूत्र १. ४. ६।

इन कतिपय परिभाषाओं से यही ज्ञात होता है कि भारतीय धर्म का मूल है वेद और स्मृति, और इनको प्रमाण मानकर विहित नियम या आचार ही धर्म हैं। धर्म के इन उपादानों और आधारों पर विचार करना आवश्यक है।

धर्म के उपादान—

धर्म के उपादानों या स्रोतों का उल्लेख प्रायः नियमपूर्वक प्रत्येक धर्मसूत्र और स्मृति में किया गया है। गौतमधर्मसूत्र में यह स्पष्टतः कहा गया है कि वेद धर्म का मूल है—“वेदो धर्ममूलम्। तद्विदां” च स्मृतिशीले। आपस्तम्बधर्मसूत्र—“धर्मसमयः प्रमाणं वेदाश्च” १. १. १. २। धर्म को जानने वाले वेद का मर्म समझने वाले व्यक्तियों का मत ही वेद का प्रमाण है। इसी प्रकार वसिष्ठधर्मसूत्र में भी, जिसकी धर्म की परिभाषा का ऊपर उल्लेख किया गया है, श्रुति और स्मृति द्वारा विहित आचरण-नियमों को धर्म माना गया है तथा उसके अभाव में शिष्ट जनों के आचार को प्रमाण माना गया है—

“श्रुतिस्मृतिविहितो धर्मः। तदलाभे शिष्टाचारः प्रमाणम्। शिष्टः पुनरकामात्मा।”

इसी प्रकार मनुस्मृति में वेद, स्मृति, वेदज्ञों के आचरण के अलावा अपनी आत्मा की तुष्टि को भी धर्म का मूल कहा गया है—

“वेदोऽखिलो धर्ममूलं स्मृतिशीले च तद्विदाम्।
आचारश्चैव साधूनामात्मनस्तुष्टिरेव च ॥” २. ६

याज्ञवल्क्यस्मृति में उपर्युक्त के साथ-साथ उचित संकल्प से उत्पन्न अभिलाषा या इच्छा को भी धर्म का मूल स्वीकारा गया है :—

“श्रुतिः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः।
सम्यक्संकल्पजः कामो धर्ममूलमिदं स्मृतम् ॥ १. ७

इस प्रकार धर्म के उपादान, स्रोत, मूल या प्रमाण स्वयं धर्मशास्त्रों की दृष्टि में ये हैं : १—वेद, २—वेद से भिन्न परम्परागत ज्ञान अर्थात् स्मृति, ३—श्रेष्ठ लोगों के आचार-विचार, ४—अपनी विवेकबुद्धि से स्वयं को रुचिकर लगनेवाला आचरण और उचित संकल्प से उत्पन्न इच्छा।

वेद और धर्मशास्त्रों पर दृष्टिपात करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि धर्मशास्त्रों में जो कुछ भी कहा गया है उसका आधार वेद ही है और वेद की मान्यताओं के अनुसार ही धर्मसूत्रों के नियमों की रचना हुई। वेद की संहिताओं में और ब्राह्मण-ग्रन्थों में धर्मसूत्रों के विषयों का प्रसंगतः उल्लेख प्रचुर मात्रा में मिलता है, जैसे विवाह, उत्तराधिकार, श्राद्ध, स्त्री की स्थिति आदि। संहिताओं और ब्राह्मणों में

३ गौ० भू०