गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Gautama Dharmasutra Hindi
महर्षि गौतम द्वारा
स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 21, कुल 360 में से
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१, ३. ६०. ६, ५. २६. ६, ५. ६३. ७, ५. ७२. २ । अथर्ववेद में १४. १. ५१ वाजसनेयिसंहिता में १०. २९ और धर्म शब्द का प्रयोग अथर्ववेद में ११, ७. १७ और १२. ५. ७, १. ३. १ तैत्तिरीयसंहिता ३. ५. २. २ वाजसनेयिसंहिता १५. ६, २०, ९. ३०. ६ । अधिकतर वैदिक साहित्य में धर्म का अर्थ है 'धार्मिक विधि' 'धार्मिक क्रिया', 'निश्चित नियम', 'आचरण नियम' जैसा कि इन प्रयोगों से स्पष्ट है :
"पितुं न स्तोषं महो धर्माणं तविषीम्" १. १८७. १
"इममञ्जस्मामुभये अकृण्वत धर्माणमग्निं विदथस्य साधनम्"
"आ प्र रजांसि दिव्यानि पार्थिवा श्लोकं देवः कृणुते स्वाय धर्मणे ।"
"धर्मणा मित्रावरुणा विपश्चिता व्रता रक्षेथे असुरस्य मायया ।" ५. ६३. ७
"द्यावापृथिवी वरुणस्य धर्मणा विष्कभिते अनरे भूरिरेतसा ।" ६. ७०. १
"अचित्ती यत्तव धर्मा युयोपिम मा नस्तस्मादेनसो देव रीरिषः ।" ७. ८९. ५
"सनता धर्माणि" ३. ३. १
"प्रथमा धर्मा" ३. १७. १
"तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्" १०. ९०. १६
अथर्ववेद के निम्नलिखित मन्त्र में धर्म का अर्थ 'पुष्प फल' प्रतीत होता है :-
ऋतं सत्यं तपो राष्ट्रं श्रमो धर्मश्च कर्म च ।
भूतं भविष्यदुच्छिष्टे वीर्यं लक्ष्मीर्बलं जले ॥ ९. ९. १७ ।
किन्तु आगे चलकर धर्म वर्णाश्रम की विधियों के समीप आ जाता है । उपनिषद् काल में धर्म द्वारा वर्ण और आश्रमों के आचारों एवं संस्कारों का स्पष्ट बोध होता था यह तथ्य छान्दोग्योपनिषद २. २३ से सिद्ध होता है—
"त्रयो धर्मस्कन्धा यज्ञोऽध्ययनं दानमिति प्रथमस्तप एवेति द्वितीयो ब्रह्मचार्याचार्यकुलवासी तृतीयोऽत्यन्तमात्मानमाचार्यकुलेऽवसादयन् । सर्वं एते पुण्यश्लोका भवन्ति ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति ॥"
धर्म को जिस रूप में धर्मशास्त्रों में—धर्मसूत्रों और स्मृतियों में वर्णित किया गया है उसके अन्तर्गत चार प्रकार के धार्मिक नियमों का निर्देश किया जा सकता हैं : १. वर्णधर्म, २. आश्रमधर्म, ३. नैमित्तिकधर्म जैसे प्रायश्चित्त, ४. गुणधर्म, राजा के कर्त्तव्य ।
धर्म की कुछ परिभाषाएं बहुत प्रचलित हैं जिनका यहाँ उल्लेख करना उचित होगा ।
"चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः" अर्थात् वेद में बताये गये प्रेरक नियम और लक्षण धर्म हैं, उन नियमों का आचरण ही धर्म का आचरण है ।
—जैमिनि, पूर्वमीमांसासूत्र १. १. २