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गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Gautama Dharmasutra Hindi

महर्षि गौतम द्वारा

स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished360 पृष्ठ

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१, ३. ६०. ६, ५. २६. ६, ५. ६३. ७, ५. ७२. २ । अथर्ववेद में १४. १. ५१ वाजसनेयिसंहिता में १०. २९ और धर्म शब्द का प्रयोग अथर्ववेद में ११, ७. १७ और १२. ५. ७, १. ३. १ तैत्तिरीयसंहिता ३. ५. २. २ वाजसनेयिसंहिता १५. ६, २०, ९. ३०. ६ । अधिकतर वैदिक साहित्य में धर्म का अर्थ है 'धार्मिक विधि' 'धार्मिक क्रिया', 'निश्चित नियम', 'आचरण नियम' जैसा कि इन प्रयोगों से स्पष्ट है :

"पितुं न स्तोषं महो धर्माणं तविषीम्" १. १८७. १
"इममञ्जस्मामुभये अकृण्वत धर्माणमग्निं विदथस्य साधनम्"
"आ प्र रजांसि दिव्यानि पार्थिवा श्लोकं देवः कृणुते स्वाय धर्मणे ।"
"धर्मणा मित्रावरुणा विपश्चिता व्रता रक्षेथे असुरस्य मायया ।" ५. ६३. ७
"द्यावापृथिवी वरुणस्य धर्मणा विष्कभिते अनरे भूरिरेतसा ।" ६. ७०. १
"अचित्ती यत्तव धर्मा युयोपिम मा नस्तस्मादेनसो देव रीरिषः ।" ७. ८९. ५
"सनता धर्माणि" ३. ३. १
"प्रथमा धर्मा" ३. १७. १
"तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्" १०. ९०. १६

अथर्ववेद के निम्नलिखित मन्त्र में धर्म का अर्थ 'पुष्प फल' प्रतीत होता है :-
ऋतं सत्यं तपो राष्ट्रं श्रमो धर्मश्च कर्म च ।
भूतं भविष्यदुच्छिष्टे वीर्यं लक्ष्मीर्बलं जले ॥ ९. ९. १७ ।

किन्तु आगे चलकर धर्म वर्णाश्रम की विधियों के समीप आ जाता है । उपनिषद् काल में धर्म द्वारा वर्ण और आश्रमों के आचारों एवं संस्कारों का स्पष्ट बोध होता था यह तथ्य छान्दोग्योपनिषद २. २३ से सिद्ध होता है—

"त्रयो धर्मस्कन्धा यज्ञोऽध्ययनं दानमिति प्रथमस्तप एवेति द्वितीयो ब्रह्मचार्याचार्यकुलवासी तृतीयोऽत्यन्तमात्मानमाचार्यकुलेऽवसादयन् । सर्वं एते पुण्यश्लोका भवन्ति ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति ॥"

धर्म को जिस रूप में धर्मशास्त्रों में—धर्मसूत्रों और स्मृतियों में वर्णित किया गया है उसके अन्तर्गत चार प्रकार के धार्मिक नियमों का निर्देश किया जा सकता हैं : १. वर्णधर्म, २. आश्रमधर्म, ३. नैमित्तिकधर्म जैसे प्रायश्चित्त, ४. गुणधर्म, राजा के कर्त्तव्य ।

धर्म की कुछ परिभाषाएं बहुत प्रचलित हैं जिनका यहाँ उल्लेख करना उचित होगा ।

"चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः" अर्थात् वेद में बताये गये प्रेरक नियम और लक्षण धर्म हैं, उन नियमों का आचरण ही धर्म का आचरण है ।
—जैमिनि, पूर्वमीमांसासूत्र १. १. २

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वैशेषिकसूत्र में धर्म उसे माना गया है जिससे अभ्युदय और निःश्रेयस् की सिद्धि होती है—“यतोऽभ्युदयनिःश्रेयससिद्धि स धर्मः”।

श्रुतिप्रमाणको धर्मः हारीत, कुल्लूक, मनु० २. १ की टीका। श्रुतिस्मृतिविहितो धर्मः—श्रुति और स्मृति द्वारा विहित आचरण धर्म है।—वसिष्ठधर्मसूत्र १. ४. ६।

इन कतिपय परिभाषाओं से यही ज्ञात होता है कि भारतीय धर्म का मूल है वेद और स्मृति, और इनको प्रमाण मानकर विहित नियम या आचार ही धर्म हैं। धर्म के इन उपादानों और आधारों पर विचार करना आवश्यक है।

धर्म के उपादान—

धर्म के उपादानों या स्रोतों का उल्लेख प्रायः नियमपूर्वक प्रत्येक धर्मसूत्र और स्मृति में किया गया है। गौतमधर्मसूत्र में यह स्पष्टतः कहा गया है कि वेद धर्म का मूल है—“वेदो धर्ममूलम्। तद्विदां” च स्मृतिशीले। आपस्तम्बधर्मसूत्र—“धर्मसमयः प्रमाणं वेदाश्च” १. १. १. २। धर्म को जानने वाले वेद का मर्म समझने वाले व्यक्तियों का मत ही वेद का प्रमाण है। इसी प्रकार वसिष्ठधर्मसूत्र में भी, जिसकी धर्म की परिभाषा का ऊपर उल्लेख किया गया है, श्रुति और स्मृति द्वारा विहित आचरण-नियमों को धर्म माना गया है तथा उसके अभाव में शिष्ट जनों के आचार को प्रमाण माना गया है—

“श्रुतिस्मृतिविहितो धर्मः। तदलाभे शिष्टाचारः प्रमाणम्। शिष्टः पुनरकामात्मा।”

इसी प्रकार मनुस्मृति में वेद, स्मृति, वेदज्ञों के आचरण के अलावा अपनी आत्मा की तुष्टि को भी धर्म का मूल कहा गया है—

“वेदोऽखिलो धर्ममूलं स्मृतिशीले च तद्विदाम्।
आचारश्चैव साधूनामात्मनस्तुष्टिरेव च ॥” २. ६

याज्ञवल्क्यस्मृति में उपर्युक्त के साथ-साथ उचित संकल्प से उत्पन्न अभिलाषा या इच्छा को भी धर्म का मूल स्वीकारा गया है :—

“श्रुतिः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः।
सम्यक्संकल्पजः कामो धर्ममूलमिदं स्मृतम् ॥ १. ७

इस प्रकार धर्म के उपादान, स्रोत, मूल या प्रमाण स्वयं धर्मशास्त्रों की दृष्टि में ये हैं : १—वेद, २—वेद से भिन्न परम्परागत ज्ञान अर्थात् स्मृति, ३—श्रेष्ठ लोगों के आचार-विचार, ४—अपनी विवेकबुद्धि से स्वयं को रुचिकर लगनेवाला आचरण और उचित संकल्प से उत्पन्न इच्छा।

वेद और धर्मशास्त्रों पर दृष्टिपात करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि धर्मशास्त्रों में जो कुछ भी कहा गया है उसका आधार वेद ही है और वेद की मान्यताओं के अनुसार ही धर्मसूत्रों के नियमों की रचना हुई। वेद की संहिताओं में और ब्राह्मण-ग्रन्थों में धर्मसूत्रों के विषयों का प्रसंगतः उल्लेख प्रचुर मात्रा में मिलता है, जैसे विवाह, उत्तराधिकार, श्राद्ध, स्त्री की स्थिति आदि। संहिताओं और ब्राह्मणों में

३ गौ० भू०

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जिस समाज और सभ्यता का दर्शन होता है वह धर्मशास्त्र की व्यवस्थाओं की व्यावहारिक पृष्ठभूमि है। आख्यानों में भी नियमों का पोषण हुआ दिखायी पड़ता है, जिनका उपदेश धर्मशास्त्रों ने दिया है। ब्रह्मचर्य का महत्व, उत्तराधिकार और सम्पत्ति का विभाजन, यज्ञ और अतिथिसत्कार ऐसे ही विषय हैं, जिन पर धर्मसूत्रों से पूर्ववर्ती वैदिक साहित्य में भी अनेक स्थलों पर विचार हुआ है। जैसा कि म० म० काणे ने कहा है : "कालान्तर में धर्मशास्त्रों में जो विधियाँ बतलायी गयीं, उनका मूल वैदिक साहित्य में अक्षुण्ण रूप में पाया जाता है। धर्मशास्त्रों ने वेद को जो धर्म का मूल कहा है वह उचित ही है।"—धर्मशास्त्र का इतिहास, पृ० ७, अनु० अ० काश्यप।

भारतीय धर्म का स्वरूप

भारतीय संस्कृति और विशेषतः धर्म पर भिन्न-भिन्न विचारकों ने भिन्न-भिन्न प्रकार से दृष्टिपात किया है। कुछ ने इसके मर्म को समझा है तो कुछ ने इसके वास्तविक तत्त्व को जाने बिना अपनी आलोचनात्मक प्रतिभा का दुरुपयोग मात्र किया है। वस्तुतः भारतीय धर्म या हिन्दू धर्म को किसी एक विशेष शब्द द्वारा नहीं व्यक्त किया जा सकता। जान मेकेंजी ने यह परामर्श ठीक ही दिया है कि धर्म में 'रिलीजन', 'वर्च्यू', ला, और ड्यूटी, अंग्रेजी के इन चारों पदों का अर्थ समाहित समझना चाहिए। 'हिन्दू एथिक्स' नामक पुस्तक के पृ० ३८ पर वे कहते हैं :

“In India in those days no clear distinction was drawn between moral and religious duty, usage, customary observance and law and dharma was the term which was applied to the whole complex of forms of conduct that were settled or established.”

परन्तु मेकेंजी साहब का यह कथन भ्रमपूर्ण है कि हिन्दू ने धर्म को अन्य सभी व्यवस्थित नियमों से पृथक् नहीं किया, मानो ऐसा अज्ञानवश किया गया हो। वस्तुस्थिति तो यह है कि हिन्दू धर्म में धर्म बहुत व्यापक रहा है। वह जीवन के विविध पक्षों के पार्थक्य को ज्ञानपूर्वक समाप्त करता है। समन्वय उसका मूलमन्त्र है। मानवजीवन के चार पुरुषार्थ समन्वित होकर ही उपयोगी बनते हैं अलग-अलग नहीं। हिन्दू धर्म कोरा आदर्शवादी नहीं है, अपितु वह व्यावहारिक जीवन में वास्तविक और आदर्श का समन्वय करता है। यह धर्म मनुष्य से भिन्न नहीं है, अलग नहीं है। यह उसकी मौलिक अहंता है, जिसके अभाव में मनुष्य मनुष्य नहीं रह जाता। पशु में और धर्महीन मनुष्य में कोई भेद नहीं रह जाता, अतः भारतीय धर्म मनुष्य के समूचे व्यक्तित्व से सम्बद्ध है। वह उसके छोटे-छोटे कार्यों पर भी दृष्टिपात करता है और उनका नियमन करता है। मनुष्य को प्रत्येक स्थिति और अवस्था के परिप्रेक्ष्य में देखता है—सुख में, दुःख में, समृद्धि में और विपत्ति में भी। उसके सामाजिक, पारिवारिक, वैयक्तिक और पारलौकिक जीवन

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पर विचार करता है। भारतीय धर्म मनुष्य से संबद्ध सभी बातों पर इस प्रकार दृष्टिपात करता है और उन्हें इस प्रकार व्याप्त करता है कि सम्पूर्ण जीवन धर्ममय प्रतीत होता है। संस्कारों की शृङ्खला रेलगाड़ी की पटरी की तरह बनायी गयी है, जिससे जीवन की गाड़ी उतरने पर अनर्थ ही होता है। मानवजीवन की अवधि में भिन्न-भिन्न अवस्था में उस अवस्था के उपयुक्त आश्रमों का विधान संस्कारों की व्यवस्था को और भी पुष्टि प्रदान करता है।

धर्म का जीवन के साथ तादात्म्य इतना स्पष्ट है कि पाश्चात्य विद्वान् भी भारतीय धर्म के इस अनूठे स्वरूप से प्रभावित होते हैं। प्रो० माक्स म्यूलर ने इस रूप को सही ढंग से समझा है और अपना विचार व्यक्त करते हुए लिखा है : "प्राचीन भारतवासियों के लिए सबसे पहले धर्म अनेक विषयों के बीच एक रुचि का विषय नहीं था, यह सबका आत्मार्पण करने वाली रुचि थी। इसके अन्तर्गत न केवल पूजा और प्रार्थना आती थी, परन्तु वह सब भी आता था जिसे हम दर्शन, नैतिकता, कानून और शासन कहते हैं—सभी धर्म से व्याप्त थे। उनका सम्पूर्ण जीवन उनके लिए एक धर्म था और दूसरी चीजें मानो इस जीवन की भौतिक आवश्यकताओं के लिए निर्मित सुविधा मात्र थीं।" —व्हाट कैन इण्डिया टीच अस, पृ० १०७।

"धर्मो रक्षति रक्षितः" धर्म की रक्षा करने पर धर्म मनुष्य की रक्षा करता है। धर्महीन उच्छृङ्खल जीवन विनाश और विक्रिया की ओर ही ले जाता है। जीवन को एक उद्देश्य प्रदान करता है, उसे एक सुनिश्चित मार्ग प्रदान करता है, जिस पर चलकर आदमी अपना विकास कर सकता है, जीवन के कर्त्तव्यों का पालन कर सकता है। साथ ही इस जीवन से परे दूसरे जीवन की स्पृहा से प्रेरित होता है। परलोक की यह स्पृहा कल्पना की तरंग में बहते हुए कवि की कृति नहीं, वास्तविक जीवन की अनुभूति की अभिव्यक्ति है। इसी पारलौकिक स्पृहा को कवि वर्डस्वर्थ ने इन शब्दों में व्यक्त किया है—

"those obstinate questionings
Of sense and outward things,
Falling form us, vanishings,
Blank misgivings of a creature
Moving about in worlds not realised."

माक्स म्यूलर ने भारतीय चरित्र की विशेषता यह बतायी है कि वह पारलौकिक होता है : "यदि मुझसे एक शब्द में भारतीय चरित्र की विशेषता बताने को कहा जाय तो मैं यही कहूँगा कि वह पारलौकिक था।"—"भारतीय चरित्र में इस पारलौकिक मनोवृत्ति ने अन्य किसी देश की अपेक्षा अधिक प्राधान्य प्राप्त किया।"—व्हाट कैन इण्डिया टीच अस, पृ० १०४, १०५।

भारतीय धर्म और दर्शन एक दूसरे से पृथक् नहीं हैं अपितु एक ही वस्तु के दो पहलू हैं। यद्यपि इन दोनों में इतना अन्तर अवश्य होता है कि धर्म में विश्वास

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और भावना मुख्य होती है जबकि दर्शन में विचार और तर्क प्रमुख होते हैं। भारतीय धर्म का दर्शन एवं नीति से कितना अनोखा सम्बन्ध है इसे हम आचार की महत्ता पर विचार करते समय देखेंगे। धर्म के साथ अर्थ, काम, मोक्ष का समन्वय भारतीय जीवन का उद्देश्य है और इस कारण यह धर्म सन्तुलित रूप में आदर्शवादी है और यथार्थवादी भी, लौकिक है और पारलौकिक भी, आध्यात्मिक है और भौतिक भी। वह आचरण की वस्तु है। आचार उसका मूलाधार है। उसकी नींव गहरी है और उसके कुछ मौलिक तत्त्व हैं जो उसे स्थायित्व प्रदान करते हैं। एक पाश्चात्य आलोचक ने इसी बात का संकेत इन वाक्यों में किया है :—"भारत का आध्यात्मिक इतिहास उसके अत्यन्त मौलिक विचार से घनिष्ठ रूप से सम्बद्ध है और यह बात सोची भी नहीं जा सकती कि इस प्रकार की संस्कृति जो हजारों वर्षों से भारत में फूलती-फलती रही है, इतनी गहरी जड़ों पर आधारित होती और स्वयं को इतनी दृढ़ता से बनाये रखती अगर इसमें महान् एवं चिरस्थायी मूल्य वाले तत्त्व निहित न होते।”

भारतीय धर्म में मानवीय प्रतिभा के एक विकसित रूप का उपयोग दिखायी देता है, उसमें मानजीवन की अनेक समस्याओं पर भलीभाँति विचार करके व्यवस्था दी गयी है। मैक्स म्यूल्लर ने भारतीय धर्म और संस्कृति की उपलब्धियों का इन शब्दों में उल्लेख किया है :—

“If I were asked under what sky the human mind has fully developed some of its choicest gifts, has most deeply pondered on the greatest problems of life, and has found solutions of sone of them which well deserve the attention even of those who have studied Plato and Kant—I should point to India.”

—What Can India Teach Us ?—p.6

आचार इस धर्म का मूल है और धर्म के ज्ञान के साथ उसका अनुष्ठान और व्यवहार ही उसके वास्तविक प्रयोजन को सिद्ध करते हैं। गौतमधर्मसूत्र के शब्दों में—

“धर्मिणां विशेषेण स्वर्गं लोकं धर्मविदाप्नोति ज्ञानाभिनिवेशाभ्याम्”। इस धर्म का शाश्वत सन्देश है :—

“धर्मं चरत मा धर्मं सत्यं वदत मानृतम् ।
दीर्घं पश्यत मा ह्रस्वं परं पश्यत मापरम् ॥ वसिष्ठ ध० सू०

धर्म का आचरण करो, अधर्म का नहीं। सत्य बोलो, झूठ मत बोलो। दूर तक देखो, संकुचित दृष्टि मत रखो, हीन वस्तु देखकर अपना विचार हीन मत बनाओ, श्रेष्ठ वस्तु को देखो और जीवन का लक्ष्य सदा ऊँचा से ऊँचा बनाये रखो।

आचार और नैतिक भावना

भारतीय संस्कृति का मूल आधार है आचार। आचार के आधार पर ही हिन्दू समाज का निर्माण हुआ था और जब तक व्यावहारिक जीवन में इस आधार को

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प्राधान्य मिला तबतक समुन्नति तथा समृद्धि का समय बना रहा । धर्म का व्यावहारिक पहलू है आचार और इसी कारण इसे परम धर्म भी कहा गया है, धर्म की आधारशिला कहा गया है :

“आचारः परमो धर्मः सर्वेषामिति निश्चयः ।
हीनाचारपरीतात्मा प्रेत्य चेह च नश्यति ॥”—वसिष्ठधर्मसूत्र ६।१

आचार से हीन व्यक्ति के लिए लोक में कोई सुख नहीं है और उसे दूसरे लोक में भी सुख की प्राप्ति नहीं होती । कोई व्यक्ति वेद और शास्त्रों के ज्ञान में भले ही पारंगत हो यदि आचार से भ्रष्ट है तो सम्पूर्ण धर्मज्ञान उसे कोई लाभ नहीं पहुँचाते और न आनन्द ही देते हैं जैसे अन्धे के हृदय में उसकी सुन्दर प्रियतमा भी कोई सौन्दर्यानुभूति का सुख उत्पन्न नहीं करती ।

आचारहीनस्य तु ब्राह्मणस्य वेदाः षडङ्गास्त्वखिलाः सयज्ञाः ।
कां प्रीतिमुत्पादयितुं समर्था अन्धस्य दारा इव दर्शनीयाः ॥ वही, ६।४

इस प्रकार धर्मशास्त्रकारों का आग्रह आचार के प्रति बराबर रहा है और वे आचार को सम्मान, दीर्घ जीवन और सुख का कारण मानते हैं ।

आचारो भूतिजनन आचारः कीर्तिवर्धनः ।
आचाराद् वर्धते ह्यायुराचारो हन्त्यलक्षणम् ॥

और आचार की इसी महिमा के कारण ही सदाचार को धर्म का साधन माना गया है, जैसे वेद और स्मृति को । “वेदः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः ।” सम्पूर्ण ज्ञान का उपयोग है उस ज्ञान को आचार में परिणत करना । इसी कारण भारत का दार्शनिक कोरे चिन्तन में समय नहीं गंवाता । वह अपने जीवन को अपने दर्शन के अनुरूप ढालता है और आदर्श प्रस्तुत करता है । दर्शन और आचारशास्त्र या नीतिशास्त्र का परस्पर अन्योन्याश्रय संबन्ध रहा है और यह संबन्ध वैसा ही रहा है जैसा कि “विज्ञान और प्रयोग का, ज्ञान और योग का ।” एक ओर धर्म का मूल आधार है नीति और दूसरी ओर नीति दर्शन का व्यावहारिक पक्ष है, इस प्रकार धर्म, दर्शन और नीति एक दूसरे से अपृथक् हैं, वे एक दूसरे पर निर्भर हैं और एक दूसरे के पूरक भी हैं । इसी बात का उल्लेख जान केअर्ड ने ‘एन इण्ट्रोडक्शन टू द फिलासाफी आफ रिलीजन’ पुस्तक में किया है :—

“Indian philosophers and thinkers have even declared that the philosophy and ethics both are inter-dependent. There can be no intellectual growth without a morally elevated life. To be a good philosopher a man should be religious, moral and of good conduct.”

भारतीय धर्म या दर्शन में केवल नैतिक भावनाओं का प्रतिपादन ही नहीं किया गया है, अपितु वास्तविक जीवन में उनकी अभिव्यक्ति प्रस्तुत की गयी है और इस अभिव्यक्ति का मनोवैज्ञानिक आधार भी प्रतिस्थापित किया गया है।

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इन्हीं नैतिक भावनाओं के सन्दर्भ में मेकेंजी जैसे आलोचनात्मक दृष्टि वाले लेखक ने भी यह स्वीकारा है कि इनमें ऐसे तत्त्व निहित हैं जो स्वतः इतने मूल्य के हैं कि वे विश्व के विचार और संस्कृति को समृद्ध कर सकते हैं।

“We may claim for them that they contain elements which are of great value in themselves, and which may serve to enrich the thought and culture of the world.”

<div align="right">—Hindu Ethics, p. 241.</div>

वस्तुतः आचार वह कसौटी है जिस पर व्यक्ति की योग्यता और अर्हा का आकलन होता है। चरित्रहीन विद्वान् की विद्वत्ता फीकी होती है और शीलहीना सुन्दरी का सौन्दर्य केवल निम्नकोटि के विचारों को उत्तेजित करता है, आत्मिक सन्तोष का बोध नहीं कराता। ऊँचे पद पर आसीन और परोपदेश में कुशल व्यक्ति का छद्मव्यापार एवं अनैतिक आचरण जब प्रकाश में आता है तो दुनिया की आँखों में धूल झोंकने की उसकी सारी चालों पर पानी फिर जाता है। आचार और ज्ञान का समन्वय तथा परस्पर समायोजन ही हमारी नैतिक भावना का पहला सूत्र है, जिसने महान् दार्शनिकों एवं अलौकिक प्रतिभा और प्रभाव वाले पुरुषों को जन्म दिया है। भारतीय नीतिशास्त्री जब किसी नियम का विधान करता है तब वह उसे मानव के यथार्थ जीवन के सन्दर्भ में परख लेता है और मानव की स्वाभाविक कमजोरियों को भी ध्यान में रखता है। हरेक अवसर पर वह मनोविज्ञान के अनुसार मनुष्य के आचरण में उत्कर्ष लाने की व्यवस्था करता है। वह जानता है कि गलती मनुष्य से होती है, मनुष्य पतनोन्मुख होता है, यह सर्वथा स्वाभाविक है। किन्तु इन प्रवृत्तियों से दूर होने में ही वह मानवकल्याण की संभावना देखता है और इसी लिए धर्म की व्यवस्था करता है, जिसके अभाव में मनुष्य और पशु में कोई भेद नहीं रह जाता। मनु ने इसी का संकेत किया है :—

“न मांसभक्षणे दोषो न मद्ये न च मैथुने ।
प्रवृत्तिरेषा भूतानां निवृत्तिस्तु महाफला ।”

यही नहीं भारतीय धर्म में न केवल मनुष्यों को अपितु देवताओं तक को अनैतिक आचरण की ओर उन्मुख दिखाया गया है और उनके लिए भी आचार की पवित्रता को सर्वोपरि बताया गया है। भारतीय आख्यानों में इस बात को सर्वत्र प्रमाणित किया गया है कि सारी बातें एक ओर हैं और मनुष्य का आचार एक ओर, इसी आधार के कारण निम्नकोटि का व्यक्ति भी ईश्वर के तत्त्व का दर्शन कर सकता है, उच्चवर्ण के व्यक्ति को शिक्षा दे सकता है। इसी आचार के अभाव में महर्षि की तपस्या भी व्यर्थ हो जाती है और वह सामान्य व्यक्ति की तरह पाप का भागी होता है।

जिस वर्णव्यवस्था की सम्प्रति मुक्तकण्ठ से निन्दा करना हमारा कर्तव्य है और जो निश्चय अच्छी नहीं है, वह भी मूल रूप में आचार के आधार पर ही थी।

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जिस समय उसने आचार का विवेक छोड़कर केवल पद और कुल को आधार बनाया तब से वह अपनी अच्छाइयों से वियुक्त हो गयी। जब पद के अनुसार सम्मान प्राप्त होने लगता है, आचरण और योग्यता के अनुसार नहीं तब स्वाभाविक है कि उस पद पर पहुँचने के लिए न तो योग्यता की कोई इच्छा या प्रयत्न करेगा और न उस पद को प्राप्त कर लेने पर अयोग्य या आचारहीन व्यक्ति योग्यता की चर्चा होने देगा, उल्टे वह ऐसी व्यवस्था करेगा कि उसका पद सदैव सुरक्षित रहे। इसके लिए वह धर्म के नाम पर अपने चारों ओर कटीले तारों की दीवार खड़ी करेगा। ऐसी ही व्यवस्था का रूप वर्णव्यवस्था ने ले लिया।

धर्मशास्त्र की दृष्टि में आचार का इतना महत्त्व है कि आचारहीन पिता तक का परित्याग करने का आदेश दिया गया है :

“त्यजेत्पितरं राजघातकं शूद्रयाजकं शूद्रार्थयाजकं वेदविप्लावकं
भ्रूणहनं यश्चान्त्यावसायिभिः सह संवसेदन्त्यावसायिन्यां वा ।”
\hfill ३. २. १. पृ० २०७

ऐसे व्यक्ति के सामाजिक अपमान का विधान भी इसी बात का संकेत करता है कि आचार से च्युत व्यक्ति को समाज में सामाजिक जीवन व्यतीत करने का अधिकार नहीं है। उससे भाषण या संबन्ध करने वाले व्यक्ति को भी दुराचार में प्रोत्साहन देने के लिए दण्ड की व्यवस्था की गयी है, किन्तु उसके प्रायश्चित्त कर लेने पर तथा अपना आचरण सुधार लेने पर पुनः समाज में प्रवेश करने का द्वार खोल दिया गया है।

पाप और प्रायश्चित्त की धारणा के पीछे भी आचार के अतिरिक्त और क्या हो सकता है ? समाज में जीने और दूसरों को जीने देने का मन्त्र ही इस लोक में कल्याण का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। हमारे धर्मसूत्र में व्यक्ति को पर्याप्त महत्त्व मिला है। किन्तु इस महत्त्व की शर्त है कि वह आचार या धर्म का पालन करे। यदि वह आचार का उल्लङ्घन करता है तो उसे जीने का अधिकार नहीं, उसे पाप से तभी मुक्ति हो सकती है जब वह प्रायश्चित्त करे, अर्थात् पाप गम्भीर हो तो जीवन का अन्त कर दे, क्योंकि ऐसा व्यक्ति समाज के अन्य लोगों के लिए एक बुरा उदाहरण प्रस्तुत करेगा। हमारा धर्मसूत्र कहता है कि इस संसार में मनुष्य बुरे कर्मों से पाप से सन जाता है : “अथ खल्वयं पुरुषो याप्येन कर्मणा लिप्यते... ३. १. २.। और तब मनुष्य के ये कर्म स्थायी फल उत्पन्न करते हैं। पाप और प्रायश्चित्त का विचार धर्मसूत्र में नितान्त भौतिक या व्यावहारिक है। इनका सीधा संबन्ध शरीर की यातना से है किन्तु पाप करने वाला साधन भी तो शरीर ही है। साथ ही साथ प्रायश्चित्त की मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमि यह है कि जप और दान तो साक्षात् उत्तम विचार और परोपकार की प्रेरणा देते हैं। पाप का प्रकाशन और पश्चाताप भी हो जाता है। तप, उपवास और होम धर्म में आस्था उत्पन्न करके पुनः उत्तम आचरण की प्रेरणा देते हैं। किन्तु यह मानना पड़ेगा कि धर्म-सूत्रकार का प्रायश्चित्त का विधान करते समय साक्षात् प्रयोजन है लोक और

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परलोक की प्राप्ति। वह लोक की अपेक्षा परलोक की अधिक परवाह करता है और सभी लौकिक कर्मों को इस लिए करने का आदेश देता है कि उनसे परलोक मिलने की संभावना है। यह धर्मभीरुता और ईश्वर या परलोक का भय मनुष्य के आचरण को निरन्तर सही दिशा की ओर प्रेरित करता रहा है, किन्तु हम धर्मसूत्र में देखते हैं कि पाप-प्रायश्चित्त और अपराध-दण्ड की नैतिक भावनाओं के ऊपर भी वर्ण का विचार हावी हो जाता है। यदि कोई क्रोध में आकर ब्राह्मण के ऊपर हाथ या हथियार उठाता है तो वह सौ वर्ष तक स्वर्ग नहीं पाता, यदि उस पर प्रहार कर देता है तो वह एक हजार वर्ष तक स्वर्ग पाने से रह जाता है। उसके प्रहार से ब्राह्मण का खून बहे तो उसके खून से जितने रजकण भींगते हैं उतने वर्षों तक वह स्वर्ग नहीं पाता।

“अभिक्रुद्धावगोरणं ब्राह्मणस्य वर्षशतमस्वर्ग्यम् । निघाते सहस्रम् । लोहितदर्शने यावतस्तत्प्रस्कन्द्य पांसून्संगृह्णीयात् ॥ ३. ३. २०–२२

जानबूझकर ब्राह्मण की हत्या करने वाला मृत्यु का भागी होता है। उसे कठोर प्रायश्चित्त करना होता है। किन्तु यदि वह ब्राह्मण की प्राणरक्षा करे या उसके धन की रक्षा करे तो वह पाप से छूट जाता है : “प्राणलाभे वा तन्निमित्ते ब्राह्मणस्य” ३. ४. ७। ब्राह्मण की हत्या का असफल प्रयत्न करने पर भी वही पाप और प्रायश्चित्त होता है जो उसके वध का तथा ब्राह्मण की पत्नी के गर्भ का नाश करनेपर भी वही पाप होता है। किन्तु दूसरी ओर अन्य वर्ण के व्यक्तियों के वध पर पाप कम होता है। शूद्र की हत्या का तो यही प्रायश्चित्त है कि साल भर व्रत करके दश गाय और एक सांड़ का दान कर दे बस पाप से छुटकारा मिल जाता है। जितना पाप एक गाय के वध का होता है उससे भी कम पाप शूद्र के वध का होता है। गाय का वध वैश्य के वध के बराबर बताया गया है और इसी प्रकार मेढक, नेवला, कौआ, कृकलास, चूहा, छछून्दर के एक साथ वध का पाप भी शूद्र के वध के पाप से बढ़कर होता है। बिना अस्थिवाले एक सहस्र जीवों का वध भी शूद्र के वध से अधिक पापयुक्त होता है। ३. ४. १८-१९।

इसी प्रकार अन्य पापकर्मों और उनके प्रायश्चित्त के विषय में भी धारणाएँ कुछ असंगतिपूर्ण हैं। कुल मिलाकर पाप से विरक्ति का ध्येय बनाया गया है और निरन्तर इस बात का ध्यान दिया गया है कि प्रायश्चित्त का भय दिखाकर पाप से दूर करने का उपाय किया जाय।

अपराध और दण्ड की नैतिक भावना भी धर्मसूत्र में सर्वत्र व्याप्त है और उसके सन्दर्भ में भी बहुत कुछ वैसी मान्यतायें हैं जैसी पाप और प्रायश्चित्त के विषय में। समाज में राजा इसी लिए होता है कि वह धर्मभ्रष्ट लोगों को दण्ड देकर उन्हें सही मार्ग पर ले आवे : “चलतश्चैतान्स्वधर्मे स्थापयेत्” २. २. १० धर्मसूत्र में प्रायः विवेचित अपराधों में अधिकतर सामान्य व्यवहार, चोरी, दूसरे के साथ छल, और व्यभिचार के अपराधों का उल्लेख है। अपराध के लिए दण्डकी व्यवस्था में भी अपराधी के वर्ण का विचार सर्वोपरि आ जाता है, यद्यपि धर्म या कानून के

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सामने सभी बराबर हैं तथा अपराध, अपराधी की शक्ति और अपराध में उसकी प्रवृत्ति का विचार करके दण्ड देना चाहिए, इस बात का उद्घोष सिद्धान्त के रूप में किया गया है : “पुरुषशक्त्यपराधानुबन्धविज्ञानदण्डविनियोगः।” २. ३. ४८ । यही नहीं यह भी कहा गया है कि उच्चवर्ण का व्यक्ति यदि अपराध करता है तो उसे अधिक दण्ड देना चाहिए, यह स्वाभाविक भी है। जैसा कि हरदत्त ने अपनी टीका में कहा है, यदि अन्धा व्यक्ति कुएँ में गिरता है तो वह दया का पात्र होता है दण्ड या ताड़ना का भागी नहीं होता । इसी प्रकार धर्म के मर्म को समझने वाला अपराध करता है तो स्वभावतः उसका दोष गुरु होता है। “निषेधदोषं ज्ञात्वाऽपि प्रवर्तमानस्य दोषाधिक्यं भवति । अजानतस्त्वन्धकूपपतनवदनुग्रहोऽस्ति।”इसी कारण धर्मसूत्रकार गौतम ने यह कहा है कि शूद्र यदि चोरी करे तो उस धन का आठ गुना दण्ड होता है और उससे उच्च वर्ण का व्यक्ति उत्तरोत्तर दुगुना दण्ड का भागी होता है “द्विगुणोत्तराणीतरेषां प्रतिवर्णम् ।” किन्तु यह विषय का केवल एक पहलू है। दूसरी ओर वर्ण की विचारणा इतनी प्रमुख हो जाती है कि एक ही अपराध के लिए ब्राह्मण को कोई दण्ड नहीं मिलता जब कि शूद्र को अंगभंग और मृत्य तक का दण्ड भोगना पड़ता है । उदाहरण के लिये यदि शूद्र वाणी से किसी उच्चवर्ण वाले अर्थात् द्विजाति का अपमान कर लेता है तो उसकी जीभ काट लेने का दण्ड बताया गया है और यदि शरीर के किसी अन्य अंग से प्रहार करता है तो उस अंग को काट लेने का दण्ड है।

“शूद्रो द्विजातीनभिसंधायाभिहत्य च वाग्दण्डपारुष्याभ्यामंगमोच्यो येनोपहन्यात्” २. ३. १.

इसी प्रकार यदि शूद्र किसी उच्चवर्ण वाली स्त्री के साथ व्यभिचार करता है तो उसकी जननेन्द्रिय कटवा लेने का दण्ड है और यदि वह उस स्त्री का रक्षक नियुक्त किया गया हो तो इस अपराध के लिए उसका वध भी हो सकता है। आगे हम देखेंगे कि इसके विपरीत इस प्रकार के दण्ड के लिए उच्चवर्ण के व्यक्ति के लिए कोई दण्ड नहीं था, कुछ मामूली प्रायश्चित्त ही थे। दण्ड के विषय में सबसे बड़ा अन्याय तो वहाँ दिखाई पड़ता है जब शूद्र के कान में वेदमन्त्र पड़ने के अपराध में उसके कान में शीशा और जस्ता भर देने का नियम है और यदि वह वेदमन्त्र का उच्चारण करता है तो उसकी जीभ काटने का दण्ड है। यदि वह मन्त्र धारण करता है तो उसके शरीर को काट लेने का दण्ड बताया गया है। “अथ हास्य वेदमुपशृण्वतस्त्रपुजतुभ्यां श्रोत्रप्रतिपूरणमुदाहरणे जिह्वाच्छेदो धारणे शरीरभेदः ।” इसके विपरीत यदि ब्राह्मण शूद्र का तिरस्कार करता है तो कोई दण्ड उसे नहीं मिलता। ब्राह्मण के बारे में तो यह घोषणा कर दी गयी है कि, “न शारीरो ब्राह्मणदण्डः” २. ३. ४३ ब्राह्मण को कोई शारीरिक दण्ड नहीं मिलना चाहिए। बड़े से बड़े अपराध, गुरुपत्नीगमन और सुरापान जैसे महा अपराध के लिए भी उसे देश से निष्कासित करने का दण्ड मात्र है । धर्मसूत्र में अपराध और दण्ड-विषयक इन मान्यताओं के सन्दर्भ में मेकेंजी का यह कथन ठीक ही प्रतीत होता

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है कि दण्ड का निर्णय अपराध के बाहरी पहलू के आधार पर किया गया है, आन्तरिक पहलू के आधार पर नहीं।

“Closely connected with all this is the fact that the offences enumerated are all overt acts. Judgement is passed not on the inner but on the outer side of the act.

—Hindu Ethics, p. 56

चोरी एक बहुत बड़ा अपराध है और उसके लिये मृत्यु भी दण्ड के रूप में मिलती है। चोर के लिए यह प्रायश्चित्त बताया गया है कि वह मूसल हाथ में लेकर राजा के समीप जाकर अपना अपराध बतावे और राजा उसी मूसल से मारे, यदि उससे उसकी मृत्यु हो जाती है तो वह पाप से छूट जाता है। २. ३. ४० और राजा चाहे तो छोड़ भी सकता है किन्तु ऐसी स्थिति में राजा स्वयं पाप का भागी होता है। अतः यह स्पष्ट कहा गया है कि अपराधी पर दया नहीं करनी चाहिए। यहाँ एक बात उल्लेखनीय है कि धर्मसूत्र में अपराध के निर्धारण में संगति और एकरूपता नहीं है जैसे चोरी के लिए दो प्रकार के दण्ड बताये गये हैं एक तो आर्थिक दण्ड है और दूसरा प्रायश्चित्त के रूप में मृत्युदण्ड। चोर को सहायता देने वाला भी चोर के समान अपराधी होता है : “चोरसमः सचिवो मतिपूर्वः” और अधर्म से धन ग्रहण करने वाला बेईमान व्यक्ति भी चोर के समान अपराधी होता है। अपराध और दण्ड के सन्दर्भ में धर्मसूत्रकार कभी तो अपराध से घृणा के सिद्धान्त से चलता है तो वह कभी अपराधी से घृणा को अपने निर्णय का आधार बनाता है। कुल मिलाकर वह नैतिकता के एक सैद्धान्ति और व्यावहारिक विचारभेद के संघर्ष में पड़ा हुआ प्रतीत होता है।

सत्यभाषण और सत्य आचरण का नैतिक नियम भी पाप और प्रायश्चित्त एवं अपराध और दण्ड के समान धर्मसूत्रकार के विवेचन का विषय है। सत्यभाषण के महत्त्व को धर्मसूत्र प्रत्येक अवसर पर जोर देता है। सत्यभाषण ब्रह्मचारी का प्राथमिक नियम है “सत्यवचनम्” १. २. १३। सामान्यतः मनुष्य को सत्यवचन वाला और सत्य स्वभाव वाला अर्थात् ईमानदार होना चाहिए। “सत्यधर्मा” १. ९. ६८। सत्यभाषण से स्वर्ग की प्राप्ति होती है और असत्य बोलने से नरक मिलता है : “स्वर्गः सत्यवचने विपर्यये नरकः” २. ४. ७। सत्यभाषण एक महान् तप है, वैसे ही जैसे ब्रह्मचर्य एक महान् तप है। ३. १. १५। असत्यभाषण से होने वाले पापों के विषय में भी धर्मसूत्र का विवेक विलक्षण है। असत्यभाषण का पाप उस व्यक्ति या वस्तु के अनुसार होता है जिसके सम्बन्ध में झूठ बोला जाता है। यहां भी वस्तु या व्यक्ति की योग्यता के आधार पर या उपयोगिता के आधार पर पाप बताये गये हैं। छोटे पशुओं के विषय में न्यायव्यवहार होने पर झूठ बोलने से पाप नहीं होता। यदि साक्षी के झूठ बोलने पर किसी व्यक्ति का वध होता हो तो साक्षी को उस जाति के एक हजार मनुष्यों के वध का पाप लगता है। २. ४. १५। भूमि के विषय में असत्य बोलने पर तो सम्पूर्ण मानव जाति के वध का पाप होता है। इसी प्रकार जल के और मैथुन के विषय में असत्य बोलने पर भी

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पाप लगता है। किन्तु इन सब नियमों के बावजूद यदि असत्यभाषण से किसी प्राणी की रक्षा होती हो तो झूठ बोलने का दोष नहीं होता—"न तु पापीयसो जीवनम्" २. ४. २५। इसी प्रकार विवाह, मैथुन और उपहास में तथा रोगी व्यक्ति को सान्त्वना देने के लिए झूठ बोला जाय तो कोई पाप नहीं होता—"विवाह-मैथुननर्मार्तसंयोगेष्वदोषमेकेऽनृतम्" ३. ५. २९। किन्तु गुरु के विषय में तो कदापि असत्यभाषण नहीं करना चाहिए। असत्यभाषण के लिए तीन दिन-रात के व्रत का भी नियम है ३. ५. २७। इसी प्रकार क्रोधी, अत्यन्त प्रसन्न, भय से आकुल, रोगी, लोभी, बालक, अत्यन्त वृद्ध, मूढ, मत्त और उन्मत्त व्यक्ति के वचन यदि असत्य हों तो भी उनसे कोई पाप नहीं होता। १. ५. २०। संभवतः धर्मसूत्रकार मनो-वैज्ञानिक कारणों को दृष्टिगत करके ऐसी स्थिति में असत्य भाषण को अपराध नहीं मानता। सत्यभाषण की यह नैतिक भावना भी सन्तुलित दिखाई पड़ती है, भले ही उसके तुलनात्मक अपराधों के विषय में कुछ असंगति दृष्टिगोचर होती है।

सत्यभाषण के साथ-साथ शुभवचन एवं दूसरों को कष्ट न देने वाले वचन बोलना आचार का एक अनिवार्य अङ्ग है। वाणी का संयम आवश्यक है : वाक्चक्षुः कर्मसंयतः ९. ३. १६। शूद्र के लिए भी सत्यभाषण का आदेश है : "तस्यापि सत्यमक्रोधो शौचम्" २. १. ५२।

सत्यभाषण की तरह अहिंसा की धारणा भी धर्मसूत्र में कुछ नये रूप में आती है। भारतीय संस्कृति के "जिओ और दूसरों को जीने दो" या "आत्मनःप्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्" की भावना ही अहिंसा की नैतिक व्यवस्था को धर्मशास्त्रीय आचारव्यवस्था में बार-बार दुहराती है, किन्तु साथ ही साथ धर्मसूत्र में अहिंसा के विषय में भी कुछ विलक्षणता पायी जाती है। वैदिक कार्यों के लिए तथा अतिथि के लिए पशु का वध धर्मसंमत है—वध्याश्च धर्मार्थे २. ८. ३७। इसी प्रकार युद्ध में की गयी हिंसा का कोई पाप नहीं होता : "न दोषो हिंस्यामाहवे" किन्तु युद्ध में भी दुर्बल, भीरु, कमजोरी बताने वाले विपक्षी का वध न करने का आदेश है। युद्ध की हिंसा लोक की रक्षा के लिए होती है अतः वह विहित है, पाप का कारण नहीं है। गौतमधर्मसूत्र १. ९. ७३ में कहा गया है कि मनुष्य को नित्य अहिंसाशील, मृदु, अर्थात् सहिष्णु, या क्षमाशील होना चाहिये, दृढ़निश्चयी, संयमी और दानशील होना चाहिये। मनुष्य के ये प्रमुख गुण हैं और उनमें अहिंसा मुख्य है "नित्यम-हिंस्रो मृदुदृढकारी दमदानशीलः। ब्रह्मचारी के लिए हिंसा न करने का स्पष्ट आदेश है १. २. २३। अहिंसा के प्रति धर्मसूत्र के विलक्षण दृष्टिकोण का आभास पाप और प्रायश्चित्त के सन्दर्भ में मिलता है। मनुष्यों की हत्या से पाप होता है किन्तु उस पाप का अनुपात हत व्यक्ति के वर्ण के अनुसार होता है। सामान्यतः पशुओं का वध करना पाप का कारण बताया गया है किन्तु वह पाप उनकी उपयोगिता और आकार के अनुसार कहा गया है। सबके लिए प्रायश्चित्त का विधान है। धर्मसूत्र की दृष्टि में वेश्या के वध का कोई पाप या प्रायश्चित्त नहीं होता और इसी प्रकार नपुंसक की हत्या का पाप केवल एक आदमी से चलने लायक पुआल का दान कर देने पर छूट जाता है। मांसभक्षण का भी पूर्णतः निषेध नहीं किया गया है, परन्तु

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मांसभक्षण के लिए हिंसा निन्दित बतायी गयी है। अनेकानेक पक्षियों एवं मछलियों के भक्षण को विहित किया गया है ( २. ३. ३५) जिनके भक्षण के लिए हिंसा आवश्यक है इसमें सन्देह नहीं। मांसभक्षण तो संन्यासी भी कर सकता था। १. ३. ३०। इस प्रकार धर्मसूत्र में अहिंसा की नैतिक भावना मांसभक्षण के निषेध तक सीमित नहीं है। हिंसा सामान्यतः निन्दित है किन्तु व्यवहार में उसका कठोर पालन नहीं दिखाई पड़ता।

दया, परोपकार, क्षमा आदि उत्तम मानवीय गुणों की प्रशंसा धर्मसूत्र में आचार और आश्रमधर्म के सन्दर्भ में अनेकशः की गयी है। "दया सर्वभूतेषु क्षान्तिरनसूया शौचमनायासो मंगलमकार्पण्यमस्पृहेति"। १. ८. २४। ये आठ आत्मगुण बताये गये हैं : दया, क्षमाशीलता, दूसरों की समृद्धि में न जलना, जिस कार्य को करने में अपनी हानि हो वह न करना, मंगल का आचरण करना, दीनता न दिखाना और लालच न करना। इन गुणों को प्राप्त करना लौकिक तथा पारलौकिक दृष्टि से आवश्यक है। इसी प्रकार १. ९. ७३ में सहिष्णुता, क्षमाशीलता, दृढ़ निश्चय एवं संयम को आवश्यक गुण बताया गया है। समर्थ होने पर भी किसी मारे जाते हुए दुर्बल व्यक्ति की रक्षा न करने पर उतना ही दोष होता है, जितना उस व्यक्ति को मारने वाले का होता है। "दुर्बलहिंसायां च विमोचनशक्तश्चेत्" ३. ३. १९। संन्यासी के लिए तो यह अनिवार्य आचार है कि वह लोभ का त्याग कर दे, संयम रखे और कष्ट देने वाले तथा अनुग्रह करने वाले दोनों पर समान दृष्टि रखे "समो भूतेषु हिंसानुग्रहयोः"। यह समदृष्टि भारतीय दर्शन में महत्त्व रखती है और जीवन में इसका व्यवहार दार्शनिक एवं तत्वज्ञ की महान् योग्यता समझी जाती है। इन्द्रियों के प्रवाह में पड़कर उन पर विजय प्राप्त करना और उन्हें ऊँचे आदर्शों और लक्ष्यों की ओर उन्मुख करना ही ब्रह्मचर्य का और सामान्य भारतीय धर्म का मुख्य लक्ष्य है, दर्शन का मूलमन्त्र है। नैष्ठिक ब्रह्मचारी इसी लक्ष्य की प्राप्ति में रत तपस्वी है, जिसके नियम धर्मसूत्र में मिलते हैं। स्वाभाविक मलप्रवृत्तियों को नियन्त्रित करके उन्हें धर्म की सिद्धि में नियोजन ही धर्मग्रन्थ का उपदेश और आदेश है।

परोपकार के साथ-साथ दुःखी और रोगी को दान देने का भी आदेश है। दानविषयक व्यवस्था के मूल में एक उत्तम धार्मिक भावना है, सत्कर्म में अध्ययन में लगे हुए का एवं दुःखी व्यक्ति की सहायता। आगे चलकर दान केवल प्रायश्चित्त का अङ्ग हो जाता है और पाप से मुक्ति पाने का आडम्बरपूर्ण साधन बना लिया जाता है। किन्तु हमारे धर्मसूत्र में १. ५. १८ दानपात्र की योग्यता पर विचार किया गया है और गुरु के लिए, विवाह कर्म के लिये, रोगी को, हीनवृत्ति वाले को और अध्ययन में रत व्यक्ति को दान देने की व्यवस्था की गयी है। अधार्मिक कार्य के लिए कदापि दान नहीं देना चाहिए, यह भी गौतमधर्मसूत्र में स्पष्ट कहा गया है।

स्वाभिमान और व्यक्ति की प्रतिष्ठा पर भी इस धर्मसूत्र में यत्रतत्र प्रकाश पड़ता है, हालां कि सामान्यतः व्यक्ति को उसके आचरण के आधार पर तथा अनेक

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प्रसंगों में वर्ण के आधार पर या कुल के आधार पर सम्मान का पात्र ठहराया गया है। विद्याध्ययन करने वाले, सदाचारी एवं धार्मिक व्यक्ति का सर्वोपरि स्थान है और उसे विशेषाधिकार भी दे दिये गये हैं जो दूसरों को नहीं मिल पाते हैं। गुरु की सेवा में व्यक्ति के अपने स्वाभिमान का विचार नहीं किया गया है, उसकी पूजा देवता की तरह करने, उसका जूठा खाने, शरीर दबाने आदि का नियम भी विद्यार्थी के लिए बताया गया है (पृ० २६) किन्तु ये कार्य गुरु के अतिरिक्त अन्य के लिए विहित नहीं हैं। निम्न व्यक्ति की सेवा गर्हित है। अतिथि सत्कार एक मानवीय धर्म है तथा प्रत्येक आश्रम में मनुष्यपूजक होने का आदेश है किन्तु दूसरी ओर वर्ण का विचार इतना प्रबल है कि शूद्र को मनुष्योचित व्यवहार भी नहीं मिलता और उसे दास बनकर सब प्रकार से पददलित जीवन व्यतीत करना पड़ता है। आगे आश्रमों की व्यवस्था एवं वर्ण के विषय में विचार करते समय धर्मसूत्र के समाज में व्यक्ति का क्या स्थान था इस पर और प्रकाश पड़ेगा।

मनुष्य का अपना जीवन महत्त्वपूर्ण है। सभी प्रकार से अपनी रक्षा करना धर्म है। अतः धर्मसूत्र आदेश देता है कि जिस कार्य में हानि हो, प्राणसंकट हो वह कार्य न करो १. ९. ३२. और सभी उपायों से अपनी रक्षा करो "सर्वत एवात्मानं गोपायेत" १. ९. ३४. । जीवन रक्षा के लिए वर्णाश्रमधर्म का भी उल्लंघन करके कोई भी वृत्ति ग्रहण की जा सकती है और नैतिक नियमों का बन्धन तोड़ा जा सकता है। इस प्रकार धर्मसूत्र की व्यवस्था में धर्मप्रधान होते हुए भी व्यक्ति को भी बहुत कुछ महत्व प्राप्त है। उसे जीने का भी अधिकार दिया गया है और इसी कारण यह विचार किया गया है कि पापों के लिए प्रायश्चित्त नहीं भी किया जा सकता है। सामान्य नियम भी बताया गया है कि समर्थ व्यक्ति आश्रितों की, असहायों, दुर्बलों और शारीरिक विकार वाले मनुष्यों की रक्षा करें, उन्हें भोजन, वस्त्र और सुरक्षा प्रदान करें।

यौनविषयक नैतिकता के विषय में धर्मसूत्रकार की दृष्टि बड़ी कड़ी है, किन्तु अन्य नैतिक भावनाओं के समान ही इस विषय में भी सिद्धान्त और व्यवहार के बीच प्रचुर अन्तर दिखाई पड़ता है। धर्मसूत्र में नारी की स्थिति पर विचार करते हुए हमने इस बात को स्पष्ट करने का प्रयत्न किया है। स्त्री-पुरुष के सम्बन्ध की स्वेच्छाचारिता हमारे धर्मसूत्रकार को निश्चय ही अभीष्ट नहीं है, किन्तु उसे सबसे बड़ी चिन्ता इस बात की है कि उच्चकुलों की मर्यादा और पवित्रता सुरक्षित बनी रहे और वर्णों में उच्च और निम्न का भेद स्त्री-पुरुष के सम्बन्ध का नियमन करे। अपने से निम्न वर्ण के पुरुष के साथ सम्बन्ध रखने वाली स्त्री के लिए तो सरेआम कुत्तों से कटवाकर मार डालने का नियम बनाया गया है। "श्वभिरादयेद्राजा निहीनवर्णगमने स्त्रियं प्रकाशम् । ३. ५. १४ ।

किन्तु हमारे धर्मसूत्रकार को यह पता है कि मनुष्यों की स्वाभाविक कमजोरियाँ समय पाकर उसे अभिभूत कर लेती हैं। महापुरुष भी अपने आचरण में चूक जाते हैं।

"दृष्टो धर्मव्यतिक्रमः साहसं च महताम् ।"

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यही नहीं एक आधुनिक मनोवैज्ञानिक की तरह धर्मसूत्रकार कामभावना के विकारों एवं असामान्य यौनाचारों का उल्लेख भी करता है और यह संकेत करता है कि अप्राकृतिक यौनाचार भी समाज में प्रचलित था। काममनोविज्ञान का वेत्ता इसे दमित भावना की विकृत अभिव्यक्ति की कहेगा। गौतमधर्मसूत्र में ऐसे स्थलों के लिए देखिए : ३. ४. ३६ पृ० २३४, ३. ५. १२ पृ० २४०, ३. ६. ५ पृ० २५५ तथा ३. ३. ७ पृ० २६० ।

ब्रह्मचर्य की महत्ता सर्वोपरि है, किन्तु उसके भंग होने पर प्रायश्चित्त द्वारा पाप से मुक्ति हो जाती है। धर्मसूत्र की दृष्टि में काम की मूलभावना का उपयोग केवल सन्तान प्राप्ति के लिये, सदाचारी पुत्र की प्राप्ति के लिए होना चाहिए। इसी लिए इसके नियमन की आवश्यकता है और विवाह की व्यवस्था को अपूर्व महत्ता दी गयी है। गौतमधर्मसूत्र का तो यही सन्देश है कि निरन्तर धर्म, अर्थ और काम को सफल बनाना चाहिए और इसमें धर्म प्रधान है, उसी के अनुकूल अर्थ और काम भी होने चाहिए।

“न पूर्वाह्नमध्यंदिनापराह्णानफलान्कुर्याद्यथाशक्ति धर्मार्थकामेभ्यः”

१. ९. ५४ ।

गौतमधर्मसूत्र में वर्णाश्रमधर्म

भारतीय धर्म में मानवजीवन सुव्यवस्थित हैं और उसके उद्देश्य निर्धारित हैं, जीवन का मार्ग स्पष्टतः अनुरेखित है। इस धर्म में जीवन जी लेने का ही नाम नहीं है, अपितु उसका आकलन तो व्यक्ति के धर्म से है, कर्म से है। केवल यथासंभव सुख के साधन जुटाकर पार्थिव जीवन को और वर्तमान को सुखी बना लेना उसका उद्देश्य नहीं। इस धर्म में जीवन कर्म का जीवन माना गया है, एक पारलौकिक जीवन की प्राप्ति के लिए दीक्षा का काल माना गया है। सम्पूर्ण भौतिक जीवन आध्यात्मिक जीवन की तैयारी है। इसी कारण तो जीवन को धर्ममय, दर्शनमय कहा गया है। आध्यात्मिक जीवन की तैयारी तो इस जीवन के आरम्भ से ही चलती है, परन्तु उसके लिए विशेष समय भी निर्धारित किया गया है।

हिन्दू धर्म में प्रत्येक व्यक्ति के, प्रत्येक अवस्था के और प्रत्येक अवसर के कर्तव्य निर्धारित हैं जिससे उनके विषय में भ्रम या स्वेच्छाचारिता की गुञ्जाइश नहीं, हालांकि साथ ही साथ मनुष्य के हित “स्वस्य च प्रियमात्मनः” को भी महत्त्व दिया गया है। अभ्युदय और निःश्रेयस् की सिद्धि के लिए हिन्दू धर्म में जीवन की जो “प्लैंनिंग” की गयी है उसी का नाम आश्रम है। उचित समय पर उचित कर्म करना और दत्तचित्त होकर कर्म करना लक्ष्य की प्राप्ति का मूलमन्त्र है। सम्पूर्ण जीवन कर्तव्यमय है, श्रममय है। आश्रम शब्द का ही अर्थ है : श्रम का जीवन। आश्राम्यन्ति अस्मिन् आश्रमः। व्यक्ति के प्रतिदिन के कार्य का मानो एक “टाइमटेबुल” ही आश्रम की व्यवस्था के अन्तर्गत बना दिया गया है जिसके अन्तर्गत एक निश्चित समय तक एक निश्चित कार्य किया और फिर दूसरे कार्य में लग गये। एक कालावधि में भौतिक जीवन का रसास्वादन किया तो दूसरे में

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भौतिक सुखों का त्यागकर अक्षय शान्ति की खोज में निकल पड़े । एक पीढ़ी ने अपना एक कार्य पूरा किया, उसके आनन्दों और फलों का भोग किया और वह आगे बढ़ गयी । उसने दूसरी पीढ़ी को स्थान दिया । इस विभाजन और व्यवस्था से न तो कहीं असन्तोष उत्पन्न हुआ, न तो उनमें कोई संघर्ष हुआ। इस व्यवस्था के अभाव ने वर्तमान समाज में कितनी बुराइयाँ उत्पन्न की हैं सर्वविदित है । जीवन के अन्त तक पद का लोभ और उस पद को बनाये रखने के लिए होनहार लोगों का दमन एवं शोषण पुराने लोगों का एक खास हथकंडा बन गया है । ऐसे लोग जितने पुराने हैं, इस चाल में उतने ही कुशल हैं और वे उतने ही दीर्घकालतक पद के साथ-चिपटे रहने में सफल होते हैं। अधिकार और पद के लोभी बुजुर्ग एक लंगड़ी और असन्तुष्ट पीढ़ी का निर्माण करेंगे, जिसे योग्यता के विकास का अवसर नहीं मिल पायगा और जो उन पुराने ठेकेदारों के हाथ में खिलौना होगी, जिस पर वे मनमानी कर सकते हैं, प्रलोभन देकर अपना अधिक से अधिक काम निकाल सकते हैं। धर्मशास्त्रों की मौलिक आश्रमव्यवस्था में इन बुराइयों के लिए जगह नहीं थी । आश्रमव्यवस्था के पीछे जो उदात्त भावना है वह सार्वभौम है । भारतीय संस्कृति की यह विशेषता अद्वितीय है और धर्मशास्त्रकारों की दूरदर्शिता, व्यावहारिकता, बोध और चिन्तन की स्पष्टता का प्रमाण है ।

इस आश्रमव्यवस्था को धर्मसूत्रकारों ने स्पष्टतः गौरव प्रदान किया है। वर्णाश्रमधर्म से हीन व्यक्ति पतित होता है और ऐसे पतित के साथ बोलना भी निषिद्ध है । वर्णाश्रमधर्म से हीन व्यक्ति का समाज में कोई स्थान नहीं है, वह किसी प्रकार का सम्मान प्राप्त करने का अधिकारी भी नहीं होता। १. ९. १७ । कर्मों के विभाजन का अनुशीलन न किया जाय तो आर्य और अनार्य में कोई भेद नहीं रह जाता । सभी वर्ण समान हो जाते हैं और सबके समान होने पर लोकव्यवस्था नहीं चल पाती, अस्तव्यस्तता उत्पन्न हो जाती है । “आर्याणार्ययोर्व्यतिषेषकर्मणः साम्यम्” । गौतमधर्मसूत्र २ १. ६९ । इस आश्रम व्यवस्था के अन्तर्गत विहित कर्म को करना कर्तव्य है और जो व्यक्ति उस आचरण का पालन नहीं करता वह राजा द्वारा दण्ड का भागी होता है। उसे किसी प्रकार की सम्पत्ति का अधिकार नहीं रह जाता और वह केवल जीवन चलाने योग्य भोजन ही राजा के यहाँ से प्राप्त करता है । “शिष्टाचारणे प्रतिषिद्धसेवायां च नित्यं चैल्पिण्डादूर्ध्वं स्वहरणम्” । २. ३. २४ ।

धर्मशास्त्रों में मनुष्यजीवन चार आश्रमों में विभक्त किया गया है—ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास। गौतमधर्मसूत्र में इन आश्रमों को इस क्रम में और इन नामों से गिनाया गया है—ब्रह्मचारी, गृहस्थ, भिक्षु, वैखानस । आश्रमों का इतिहास देखकर यह ज्ञात होता है कि आश्रम के विषय में धर्मशास्त्रकारों के विचार एक से नहीं हैं। इसे अलग-अलग नाम दिया गया है और इन आश्रमों का आपेक्षिक महत्त्व भी भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण से किया गया है। उदाहरण के लिए कुछ आचार्यों ने एक ही आश्रम-गृहस्थाश्रम को वास्तविक बताया है। बौधायन की दृष्टि में भी अन्य सब आश्रम काल्पनिक हैं २. ६. १७ । हमारे धर्मसूत्रकार गौतम ने भी गृहस्थाश्रम को ही महत्त्व दिया है और उसे ही प्रथम स्थान दिया

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है। धर्मशास्त्रों के पूर्व उपनिषदों में यह बात स्पष्ट की गई है कि मोक्ष प्राप्त करने के लिए वैराग्य या निर्वेद धारण करना चाहिये। बृहदारण्यक ५।१ और मुण्डक० १।२।१२ इस प्रकार ये आश्रम स्वाभाविक रूप में थे इसमें सन्देह नहीं। इन्हें व्यवस्थित रूप धर्मशास्त्रकारों ने दिया और प्रत्येक आश्रम के दैनिक कर्मों का विस्तार से गिनाया। सारे समाज के लिए वर्णाश्रमधर्म के नाम से संविधान तैयार किया।

सभी आश्रमों में गृहस्थाश्रम को स्वाभाविक रूप में अधिक महत्त्व प्राप्त है। यह आश्रम वास्तविक लौकिक कर्म और श्रम का जीवन है और अन्य आश्रम इसी पर आश्रित होते हैं। ब्रह्मचर्य इसी जीवन की विशेष तैयारी है जिसमें ज्ञान के साथ संयम और आचार की शिक्षा दी जाती है। ब्रह्मचर्य अनुशासन और ज्ञानार्जन का जीवन है। गृहस्थाश्रम की उपक्रमणिका है। गौतमधर्मसूत्र में १. ३. १ और १. ३. ३५ में इस आश्रम की प्रधानता को स्वीकारा गया है। किन्तु साथ ही साथ यह भी कहा गया है कि जीवन की शिक्षा पाकर ब्रह्मचारी कोई भी आश्रम ग्रहण कर सकता है। ब्रह्मचर्य जीवन से वास्तविक आचार और धर्म का जीवन प्रारम्भ होता है। उसके पूर्व के जीवन में कोई आचार का नियम नहीं है और छूट है। ब्रह्मचर्य के बाद गृहस्थजीवन स्वीकारने का कारण यह है कि यह आश्रम ही सन्तानउत्पत्ति का आश्रम है और सन्तान का महत्त्व धर्मसूत्र में सर्वोपरि है। इस कारण गृहस्थाश्रम का वरण करना धर्म की दृष्टि से आवश्यक है किन्तु ब्रह्मचारी इस आश्रम का त्याग कर नैष्ठिक ब्रह्मचारी का जीवन भी व्यतीत कर सकता और सारा जीवन ज्ञानार्जन तथा तत्त्वचिन्तन में लगा सकता है। ब्रह्मचारी को भोग-विलास की वस्तुओं की और बाह्य अलंकरणों से दूर रहने का आदेश है, यहां तक कि स्वच्छता के नियमों में भी अनेक को वर्जित किया गया है। संभवतः इस कारण कि इस जीवन का मुख्य लक्ष्य है भोगविलास और भौतिक आनन्द की कल्पना न करना, केवल विद्यार्जन में ही तल्लीन रहना। मन को अपने लक्ष्य में लगाने के लिये मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमि जीवन के प्रत्येक कार्य से बनती है। इन्हीं भोगविलास और सुखदायी उपकरणों को, वस्त्रादि के अलंकरण को गृहस्थ के लिए विहित किया गया है, क्योंकि वहां यह आवश्यक मनोवैज्ञानिक वातावरण प्रस्तुत करने में सहायक है। इस प्रकार के ब्रह्मचारी को समाज में सम्मान का स्थान मिला है और वैसे ब्रह्मचारी की राजा प्रत्येक तरह से रक्षा करता है। उसकी सहायता और भरणपोषण समाज के सभी अंग करते हैं।

ऊपर कहा जा चुका है कि गौतमधर्मसूत्र में गृहस्थाश्रम को अन्य आश्रमों से अधिक महत्त्व दिया गया है। यह स्पष्टतः कहा गया है कि “ऐक्याश्रम्यं त्वाचार्याः। प्रत्यक्षविधानाद् गार्हस्थ्यस्यैव”। १. ३. ३५.। प्रायः सभी संस्कार इसी आश्रम में सम्पादित होते हैं और यही आश्रम मानवजाति के विकास के लिए उसकी प्रजनन की प्रवृत्ति को सन्तुलित और संयमित करने का आश्रम है। गृहस्थ का धर्म है : “देवपितृमनुष्यर्षिपूजकः” हो अर्थात् सभी उस पर आश्रित होते हैं। गृहस्थाश्रम समाज की पहली इकाई है और समाज का सही निर्माण इसी जीवन में

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होता है। इसमें आचार के नियम बहुत व्यापक हैं। दान देना और अतिथि सत्कार करना तो गृहस्थाश्रम का मुख्य धर्म है। दुःखी, रोगी, निर्धन और विद्याध्ययन में रत व्यक्ति की सहायता करना इस आश्रम का परम मानवीय कर्तव्य है। गृहस्थ अपने आश्रितों का भरणपोषण करता है। वह अतिथि, बालक, रोगी, गर्भवती स्त्री, घर में रहने वाली पुत्रियों और बहनों तथा वृद्धों और सेवकों को भोजन देकर स्वयं भोजन करता है १.५.२३ और इस प्रकार वह एक महान् परोपकारमय जीवन जीता है। धर्मसूत्र में गृहस्थ के लिए शुद्धता के अनेक नियम दिये गये हैं। उसे स्नान और सुगन्धि के लेप से स्वयं को पवित्र रखने का आदेश दिया गया है। उसे दूसरों के वस्त्र आदि का उपयोग नहीं करना चाहिए। अभावग्रस्त होने पर वह शुद्ध करके उपयोग कर सकता है। सामान्यतः उसे संयम का जीवन बिताना चाहिए और धर्म के अनुकूल अर्थ और काम का सेवन करना चाहिए। मानसिक पवित्रता रखनी चाहिए।

आश्रमव्यवस्था के अन्तर्गत व्यक्ति का एक सामान्यधर्म है अतिथि का सत्कार और गुरु आदि श्रेष्ठ जनों का आदर। अतिथि की सेवा संन्यासी को भी करनी चाहिए १.३.२८ श्रोत्रिय अतिथि को अपने समान शय्या और आसन देना चाहिए। अपने से हीन अतिथि का भी अपने समान आदर करना सामान्य धर्म है। केवल अपने लिए पकाया हुआ भोजन धर्मसूत्र की दृष्टि में अभोज्य है। एक रात्रि रुकने वाला और मध्याह्नकाल में विश्राम के लिए आनेवाला व्यक्ति अतिथि होता है। श्रेष्ठजनों को आदर देना भी सामान्यधर्म है। माता-पिता का तो किसी भी दशा में अपमान नहीं करना चाहिए "न कर्हिचिन्माता-पित्रोर्वृत्ति" ३.३.१५। गुरुजनों के निकट किसी प्रकार की चपलता नहीं करनी चाहिए १.२.२२ इसके अतिरिक्त गुरु की सेवा का भी नियम बताया गया है। अभिवादन, संभाषण और शिष्टाचार के छोटे-छोटे दैनिक नियम भी धर्मसूत्रों ने बताये हैं। वृद्ध जनों का आदर उनके आचार के आधार पर करने का आदेश है और उनके अनुकूल आचरण करने को बताया गया है। "यच्चात्मवन्तो वृद्धाः सम्यग्विीनीता दम्भ-लोभमोहवियुक्ता वेदविद् आचक्षते तत्समाचरेत्।"

आत्मसम्मान को बनाये रखना और आत्मकल्याण के लिए उद्योग करना गृहस्थाश्रम में अनिवार्य कर्तव्य है। इसी लिए गृहस्थ की हमारे धर्मसूत्र में यह सलाह दी गयी है कि वह उत्तम और उद्यमी व्यक्तियों के साथ निवास करें, जहां जीवनोपयोगी वस्तुएं उपलब्ध हों वहां निवास करे १.९.६५। आत्मसम्मान की दृष्टि से बराबर दूसरे का अन्न न ग्रहण करे "नित्यमभोज्यम्" २.८.८ और न ही तिरस्कारपूर्वक या बिना मांगे दिया हुआ अन्न ग्रहण करे "भावदुष्टम् अयाचितम् च।" २.८.१२। अपने को पीड़ित न करे और अपनी प्रतिष्ठा का निरन्तर ध्यान रखे। यह धर्मसूत्र का गृहस्थ के लिए सामान्य आदेश है।

अन्य आश्रमों के अन्तर्गत संन्यास या भिक्षु को गौतमधर्मसूत्र में महत्त्वपूर्ण माना गया है। वानप्रस्थ या वैखानस को केवल गृहस्थ और संन्यास आश्रमों के बीच की कड़ी कहा जा सकता है। जिस प्रकार गृहस्थाश्रम के लिए ब्रह्मचर्याश्रम विशेष तैयारी का समय है उसी प्रकार संन्यास के लिए तैयारी और

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दीक्षा का समय है वानप्रस्थ। संन्यास नितान्त आध्यात्मिक उद्देश्य का आश्रम है। जिसका लक्ष्य है भौतिक जगत् के ऐन्द्रिक सुखों से विमुख होकर इन्द्रियों और मन को वश में करके निर्वेद की प्राप्ति। जीवन में भौतिकता और इन्द्रियसुख की प्रधानता का कहीं तो विराम होना चाहिए कहीं सीमा होनी चाहिए क्योंकि ये चिरस्थायी सन्तोष नहीं देते और तब यथार्थ तथ्य का बोधकर परम शान्ति की प्राप्ति ही जीवन की सार्थकता है। अतः इस आश्रमव्यवस्था में संन्यासी जीवन का आध्यात्मिक महत्त्व है, दार्शनिक महत्त्व है।

इस सुन्दर व्यवस्था के होते हुए भी धर्मशास्त्रियों के समय में इनका सही रूप से पालन होता था, इसमें सन्देह है, क्योंकि इन आश्रमों के विषय में धर्मशास्त्रकारों में मतभेद है, जो निश्चय ही व्यावहारिक कारणों से है। किसी भी स्थिति में संन्यास आश्रम सामान्यतः सभी व्यक्ति अपनाते होंगे, ऐसा भी नहीं माना जा सकता। वह तो दार्शनिकों का आश्रम है, तपस्वियों का आश्रम है। संन्यास के नाम पर अकर्मण्यता का जीवन धर्मशास्त्र को अभीष्ट नहीं है।

वर्णव्यवस्था—

भारतीय धर्म या संस्कृति की एक अद्वितीय विशेषता है वर्णव्यवस्था, इसके विषय में बहुत कुछ कहा गया है। कुछ विद्वानों ने तो इसकी प्रशंसा की है और कुछ ने इसके दोषों के ऊपर दृष्टिपात किया है। यह सभी मानते हैं कि मूलतः यह व्यवस्था बुरी नहीं थी। उसके पीछे मनुष्य के आचार और कर्म का विवेक था। इस प्रकार की सामाजिक विभाजन की व्यवस्था किसी न किसी रूप में सभी संस्कृतियों और देशों में मिल सकती है। समाज में भिन्न वर्गों का होना आवश्यक है किन्तु सभी मनुष्य समान उत्पन्न नहीं होते, सभी समान प्रतिभा और समान आदतों के साथ पैदा नहीं होते और समान कार्य नहीं करते। डा० राधाकृष्णन् के शब्दों में मानव समाज भिन्न प्रकार की श्रेणियों से बना है और उनमें सबका अपना महत्त्व है। वे सभी एक सामान्य लक्ष्य को सिद्ध करने में लगे हुए हैं।

"Society is an organism of different grades, and human activities differ in kind and significance. But each of them is of value so long as it serves the common end. Every type has its own nature which should be followed. No one can be at the same time a perfect saint, a perfect artist and a perfect philosopher. Every definite type is limited by boundaries which deprives it of other possibilities." —Hindu View of Life, p. 127

किन्तु भारतीय धर्म के इतिहास में समाज के विभाजन का यह स्वाभाविक आधार शीघ्र ही लुप्त हो जाता है और यज्ञिय विधानों के विकास के साथ ही साथ एक वर्ग को जो मुख्यतः यज्ञ के सम्पादन और विद्याध्ययन में रत है बहुत अधिक प्रधानता मिल जाती है और देवों का स्थान मिल जाता है। परिणामतः

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समाज में एक असन्तुलन का जन्म होता है और यह उच्च वर्ण अपने अधिकारों तथा उच्चस्थान के प्रति लोभी हो जाता है। वर्ण का आधार जन्म हो जाता है। जिस विशाल भव्य संस्कृति के प्रासाद की नींव सुदृढ सिद्धान्तों के ऊपर पड़ी थी उसमें शीघ्र ही दरारें पड़ जाती हैं और आगे चलकर उसपर जो भवन बनता है उसमें कुल मिलाकर परस्पर विरोधी बातें सर्वत्र ही भरी पड़ी दिखाई पड़ती हैं, एकरूपता नहीं हो पाती। शायद समाज के अग्रणी बुद्धिजीवी लोगों का सबसे बड़ा अपराध यह था कि मानव के व्यक्तित्व को न पहचानकर उसके किसी एक वर्ग के व्यक्तित्व का विकास न होने देना। और अपने पद का नाजायज फायदा उठाकर किसी दूसरे के व्यक्तित्व को पंगु बनाकर अपने अधिकार को कायम रखने से बढ़कर कोई सामाजिक पाप नहीं। हिन्दू समाज की बुराइयों का कारण मानव के भाग्य के साथ मानव का यह खिलवाड़ ही है। सभी अपने अपने कर्तव्य का ही ध्यान रखते तो शायद कोई बुराई न होती परन्तु यहाँ तो अधिकारों पर ही दृष्टि जम गयी और उन अधिकारों के लिए अपनी योग्यता को बनाये रखना जरूरी नहीं रह गया। “सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः” की शुभकामना को व्यवहार में कम स्थान मिला। वर्णव्यवस्था की बुराइयाँ यहीं से आरम्भ होती हैं। यह सही है कि मनुष्य अपने वंशपरम्परा और वातावरण का गुणनफल होता है, किन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि उसे वातावरण का परिवर्तन करके अपने व्यक्तित्व का विकास करने का अधिकार ही न रहे। एक विशेष कुल में जन्म लेने के कारण उसे पशु से भी निन्दित समझा जाय। अपने कुल या वंशपरम्परा की शुद्धता के लिए अपने योग्य व्यक्तियों से संबन्ध करना अच्छी और लाभदायक बात है किन्तु व्यक्ति को एक घेरे के भीतर कैद करना, उसमें हीनता की भावना भरकर उसे आश्रित और परतन्त्र बनाकर मानवीय अधिकारों से वंचित कर देना ईश्वर की सृष्टि के प्रति अन्याय है, घोर अपराध है, सामूहिक नरसंहार जैसा पाप है। भारतीयधर्म के अन्तर्गत वर्णव्यवस्था की कुछ बुराइयाँ ऐसी हैं जिन पर पर्दा नहीं डाला जा सकता और जिनके विषय में निश्चित रूप से कतिपय सुधार और परिवर्तन वांछनीय हैं। समय के साथ-साथ ये परिवर्तन हो भी रहे हैं और सामाजिक जीवन की समानता का बोध उत्तरोत्तर बढ़ रहा है।

वैदिक काल में वर्णव्यवस्था अपनी आरम्भिक अवस्था से चलकर पूर्णावस्था पर पहुँच जाती है। यजुर्वेद के काल तक यह पूरा रूप पा लेती है और धर्मसूत्रों में इसी व्यवस्था का अन्तिम रूप दिखाई पड़ता है। कुलों की पवित्रता के ध्यान से धर्मशास्त्रीय ग्रंथों में इस वर्णव्यवस्था के कठोर पालन करने का आदेश दिया गया है और प्रत्येक वर्ण के कर्म निश्चित कर दिये गये हैं जिनसे भ्रष्ट होना सामाजिक पतन का कारण होता है और ऐसा व्यक्ति सम्पत्ति आदि के अधिकार से वंचित हो जाता है। पिछले पृष्ठों में हम देख चुके हैं कि इस वर्णव्यवस्था का कितना व्यापक प्रभाव है। छोटे-छोटे कर्मों में भी वर्णव्यवस्था के आधार पर पार्थक्य स्थापित किया गया है, जिसका कोई औचित्य नहीं दिखायी पड़ता है।