भारतकोश
गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Gautama Dharmasutra Hindi

महर्षि गौतम द्वारा

स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished360 पृष्ठ

पृष्ठ 40, कुल 360 में से

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समाज में एक असन्तुलन का जन्म होता है और यह उच्च वर्ण अपने अधिकारों तथा उच्चस्थान के प्रति लोभी हो जाता है। वर्ण का आधार जन्म हो जाता है। जिस विशाल भव्य संस्कृति के प्रासाद की नींव सुदृढ सिद्धान्तों के ऊपर पड़ी थी उसमें शीघ्र ही दरारें पड़ जाती हैं और आगे चलकर उसपर जो भवन बनता है उसमें कुल मिलाकर परस्पर विरोधी बातें सर्वत्र ही भरी पड़ी दिखाई पड़ती हैं, एकरूपता नहीं हो पाती। शायद समाज के अग्रणी बुद्धिजीवी लोगों का सबसे बड़ा अपराध यह था कि मानव के व्यक्तित्व को न पहचानकर उसके किसी एक वर्ग के व्यक्तित्व का विकास न होने देना। और अपने पद का नाजायज फायदा उठाकर किसी दूसरे के व्यक्तित्व को पंगु बनाकर अपने अधिकार को कायम रखने से बढ़कर कोई सामाजिक पाप नहीं। हिन्दू समाज की बुराइयों का कारण मानव के भाग्य के साथ मानव का यह खिलवाड़ ही है। सभी अपने अपने कर्तव्य का ही ध्यान रखते तो शायद कोई बुराई न होती परन्तु यहाँ तो अधिकारों पर ही दृष्टि जम गयी और उन अधिकारों के लिए अपनी योग्यता को बनाये रखना जरूरी नहीं रह गया। “सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः” की शुभकामना को व्यवहार में कम स्थान मिला। वर्णव्यवस्था की बुराइयाँ यहीं से आरम्भ होती हैं। यह सही है कि मनुष्य अपने वंशपरम्परा और वातावरण का गुणनफल होता है, किन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि उसे वातावरण का परिवर्तन करके अपने व्यक्तित्व का विकास करने का अधिकार ही न रहे। एक विशेष कुल में जन्म लेने के कारण उसे पशु से भी निन्दित समझा जाय। अपने कुल या वंशपरम्परा की शुद्धता के लिए अपने योग्य व्यक्तियों से संबन्ध करना अच्छी और लाभदायक बात है किन्तु व्यक्ति को एक घेरे के भीतर कैद करना, उसमें हीनता की भावना भरकर उसे आश्रित और परतन्त्र बनाकर मानवीय अधिकारों से वंचित कर देना ईश्वर की सृष्टि के प्रति अन्याय है, घोर अपराध है, सामूहिक नरसंहार जैसा पाप है। भारतीयधर्म के अन्तर्गत वर्णव्यवस्था की कुछ बुराइयाँ ऐसी हैं जिन पर पर्दा नहीं डाला जा सकता और जिनके विषय में निश्चित रूप से कतिपय सुधार और परिवर्तन वांछनीय हैं। समय के साथ-साथ ये परिवर्तन हो भी रहे हैं और सामाजिक जीवन की समानता का बोध उत्तरोत्तर बढ़ रहा है।

वैदिक काल में वर्णव्यवस्था अपनी आरम्भिक अवस्था से चलकर पूर्णावस्था पर पहुँच जाती है। यजुर्वेद के काल तक यह पूरा रूप पा लेती है और धर्मसूत्रों में इसी व्यवस्था का अन्तिम रूप दिखाई पड़ता है। कुलों की पवित्रता के ध्यान से धर्मशास्त्रीय ग्रंथों में इस वर्णव्यवस्था के कठोर पालन करने का आदेश दिया गया है और प्रत्येक वर्ण के कर्म निश्चित कर दिये गये हैं जिनसे भ्रष्ट होना सामाजिक पतन का कारण होता है और ऐसा व्यक्ति सम्पत्ति आदि के अधिकार से वंचित हो जाता है। पिछले पृष्ठों में हम देख चुके हैं कि इस वर्णव्यवस्था का कितना व्यापक प्रभाव है। छोटे-छोटे कर्मों में भी वर्णव्यवस्था के आधार पर पार्थक्य स्थापित किया गया है, जिसका कोई औचित्य नहीं दिखायी पड़ता है।