गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Gautama Dharmasutra Hindi
महर्षि गौतम द्वारा
स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)
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दीक्षा का समय है वानप्रस्थ। संन्यास नितान्त आध्यात्मिक उद्देश्य का आश्रम है। जिसका लक्ष्य है भौतिक जगत् के ऐन्द्रिक सुखों से विमुख होकर इन्द्रियों और मन को वश में करके निर्वेद की प्राप्ति। जीवन में भौतिकता और इन्द्रियसुख की प्रधानता का कहीं तो विराम होना चाहिए कहीं सीमा होनी चाहिए क्योंकि ये चिरस्थायी सन्तोष नहीं देते और तब यथार्थ तथ्य का बोधकर परम शान्ति की प्राप्ति ही जीवन की सार्थकता है। अतः इस आश्रमव्यवस्था में संन्यासी जीवन का आध्यात्मिक महत्त्व है, दार्शनिक महत्त्व है।
इस सुन्दर व्यवस्था के होते हुए भी धर्मशास्त्रियों के समय में इनका सही रूप से पालन होता था, इसमें सन्देह है, क्योंकि इन आश्रमों के विषय में धर्मशास्त्रकारों में मतभेद है, जो निश्चय ही व्यावहारिक कारणों से है। किसी भी स्थिति में संन्यास आश्रम सामान्यतः सभी व्यक्ति अपनाते होंगे, ऐसा भी नहीं माना जा सकता। वह तो दार्शनिकों का आश्रम है, तपस्वियों का आश्रम है। संन्यास के नाम पर अकर्मण्यता का जीवन धर्मशास्त्र को अभीष्ट नहीं है।
वर्णव्यवस्था—
भारतीय धर्म या संस्कृति की एक अद्वितीय विशेषता है वर्णव्यवस्था, इसके विषय में बहुत कुछ कहा गया है। कुछ विद्वानों ने तो इसकी प्रशंसा की है और कुछ ने इसके दोषों के ऊपर दृष्टिपात किया है। यह सभी मानते हैं कि मूलतः यह व्यवस्था बुरी नहीं थी। उसके पीछे मनुष्य के आचार और कर्म का विवेक था। इस प्रकार की सामाजिक विभाजन की व्यवस्था किसी न किसी रूप में सभी संस्कृतियों और देशों में मिल सकती है। समाज में भिन्न वर्गों का होना आवश्यक है किन्तु सभी मनुष्य समान उत्पन्न नहीं होते, सभी समान प्रतिभा और समान आदतों के साथ पैदा नहीं होते और समान कार्य नहीं करते। डा० राधाकृष्णन् के शब्दों में मानव समाज भिन्न प्रकार की श्रेणियों से बना है और उनमें सबका अपना महत्त्व है। वे सभी एक सामान्य लक्ष्य को सिद्ध करने में लगे हुए हैं।
"Society is an organism of different grades, and human activities differ in kind and significance. But each of them is of value so long as it serves the common end. Every type has its own nature which should be followed. No one can be at the same time a perfect saint, a perfect artist and a perfect philosopher. Every definite type is limited by boundaries which deprives it of other possibilities." —Hindu View of Life, p. 127
किन्तु भारतीय धर्म के इतिहास में समाज के विभाजन का यह स्वाभाविक आधार शीघ्र ही लुप्त हो जाता है और यज्ञिय विधानों के विकास के साथ ही साथ एक वर्ग को जो मुख्यतः यज्ञ के सम्पादन और विद्याध्ययन में रत है बहुत अधिक प्रधानता मिल जाती है और देवों का स्थान मिल जाता है। परिणामतः