गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Gautama Dharmasutra Hindi
महर्षि गौतम द्वारा
स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)
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होता है। इसमें आचार के नियम बहुत व्यापक हैं। दान देना और अतिथि सत्कार करना तो गृहस्थाश्रम का मुख्य धर्म है। दुःखी, रोगी, निर्धन और विद्याध्ययन में रत व्यक्ति की सहायता करना इस आश्रम का परम मानवीय कर्तव्य है। गृहस्थ अपने आश्रितों का भरणपोषण करता है। वह अतिथि, बालक, रोगी, गर्भवती स्त्री, घर में रहने वाली पुत्रियों और बहनों तथा वृद्धों और सेवकों को भोजन देकर स्वयं भोजन करता है १.५.२३ और इस प्रकार वह एक महान् परोपकारमय जीवन जीता है। धर्मसूत्र में गृहस्थ के लिए शुद्धता के अनेक नियम दिये गये हैं। उसे स्नान और सुगन्धि के लेप से स्वयं को पवित्र रखने का आदेश दिया गया है। उसे दूसरों के वस्त्र आदि का उपयोग नहीं करना चाहिए। अभावग्रस्त होने पर वह शुद्ध करके उपयोग कर सकता है। सामान्यतः उसे संयम का जीवन बिताना चाहिए और धर्म के अनुकूल अर्थ और काम का सेवन करना चाहिए। मानसिक पवित्रता रखनी चाहिए।
आश्रमव्यवस्था के अन्तर्गत व्यक्ति का एक सामान्यधर्म है अतिथि का सत्कार और गुरु आदि श्रेष्ठ जनों का आदर। अतिथि की सेवा संन्यासी को भी करनी चाहिए १.३.२८ श्रोत्रिय अतिथि को अपने समान शय्या और आसन देना चाहिए। अपने से हीन अतिथि का भी अपने समान आदर करना सामान्य धर्म है। केवल अपने लिए पकाया हुआ भोजन धर्मसूत्र की दृष्टि में अभोज्य है। एक रात्रि रुकने वाला और मध्याह्नकाल में विश्राम के लिए आनेवाला व्यक्ति अतिथि होता है। श्रेष्ठजनों को आदर देना भी सामान्यधर्म है। माता-पिता का तो किसी भी दशा में अपमान नहीं करना चाहिए "न कर्हिचिन्माता-पित्रोर्वृत्ति" ३.३.१५। गुरुजनों के निकट किसी प्रकार की चपलता नहीं करनी चाहिए १.२.२२ इसके अतिरिक्त गुरु की सेवा का भी नियम बताया गया है। अभिवादन, संभाषण और शिष्टाचार के छोटे-छोटे दैनिक नियम भी धर्मसूत्रों ने बताये हैं। वृद्ध जनों का आदर उनके आचार के आधार पर करने का आदेश है और उनके अनुकूल आचरण करने को बताया गया है। "यच्चात्मवन्तो वृद्धाः सम्यग्विीनीता दम्भ-लोभमोहवियुक्ता वेदविद् आचक्षते तत्समाचरेत्।"
आत्मसम्मान को बनाये रखना और आत्मकल्याण के लिए उद्योग करना गृहस्थाश्रम में अनिवार्य कर्तव्य है। इसी लिए गृहस्थ की हमारे धर्मसूत्र में यह सलाह दी गयी है कि वह उत्तम और उद्यमी व्यक्तियों के साथ निवास करें, जहां जीवनोपयोगी वस्तुएं उपलब्ध हों वहां निवास करे १.९.६५। आत्मसम्मान की दृष्टि से बराबर दूसरे का अन्न न ग्रहण करे "नित्यमभोज्यम्" २.८.८ और न ही तिरस्कारपूर्वक या बिना मांगे दिया हुआ अन्न ग्रहण करे "भावदुष्टम् अयाचितम् च।" २.८.१२। अपने को पीड़ित न करे और अपनी प्रतिष्ठा का निरन्तर ध्यान रखे। यह धर्मसूत्र का गृहस्थ के लिए सामान्य आदेश है।
अन्य आश्रमों के अन्तर्गत संन्यास या भिक्षु को गौतमधर्मसूत्र में महत्त्वपूर्ण माना गया है। वानप्रस्थ या वैखानस को केवल गृहस्थ और संन्यास आश्रमों के बीच की कड़ी कहा जा सकता है। जिस प्रकार गृहस्थाश्रम के लिए ब्रह्मचर्याश्रम विशेष तैयारी का समय है उसी प्रकार संन्यास के लिए तैयारी और
४ गौ० सू०