भारतकोश
गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Gautama Dharmasutra Hindi

महर्षि गौतम द्वारा

स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished360 पृष्ठ

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उदाहरण के लिए यज्ञोपवीत के समय ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य को आयु, दण्ड, आदि के अलावा भिक्षाचरण के लिए संबोधन का भी अलग-अलग नियम बताया गया है। और प्रायश्चित्त, अपराध और दण्ड, मृत्यु या जन्मविषयक अशौच भी वर्णानुसार निर्धारित किया गया है। वर्ण का विचार नैतिक भावना के ऊपर भी हावी होता दिखाई पड़ता है। भोजन और संभाषण के शिष्टाचार आदि में भी वर्ण के विचार को प्राथमिकता दी गयी है। वर्णव्यवस्था की इस कठोरता के बावजूद प्राणरक्षा और जीविका निर्वाह के लिए इसके उल्लङ्घन की भी अनुमति दी गयी है, किन्तु इस बात की चेतावनी दी गयी है कि दूसरे वर्ण के कर्म करते हुए भी उस वर्ण के निन्दित आचरण न अपनाये जायँ। साथ ही वर्ण के उत्कर्ष का भी सिद्धान्त बना दिया गया है जिसके अनुसार असवर्ण यौनसम्बन्धों या विवाहों से उत्पन्न वर्णसंकर सन्तानें निरन्तर कई पीढ़ियों तक उत्कृष्ट वर्ण के कर्म करते हुए उस उत्कृष्ट वर्ण की हो जाती हैं। यह तथ्य जीवविज्ञान और प्राणिशास्त्र के सिद्धान्तों से सिद्ध किया जा चुका है कि किस प्रकार कुछ पीढ़ियों में, विशेषतः सात पीढ़ियों में रक्त में परिवर्तन आ जाता है और मनुष्यजाति नयी हो जाती है, जिसमें अपने विशिष्ट लक्षण भी होते हैं। वर्ण के उत्कर्ष के पीछे कुछ इसी प्रकार का सिद्धान्त कितना वैज्ञानिक प्रतीत होता है। इस प्रकार यह भी देखने को मिलता है कि वर्णव्यवस्था का मूल आधार अब भी विचार में रखा जाता था और कर्म या आचार के अनुसार वर्ण के उत्कर्ष या अपकर्ष का नियम भी प्रचलित था, परन्तु इसे उतना महत्त्व नहीं था, जितना वर्णविषयक रूढियों का।

इसी प्रकार वर्णविषयक सहिष्णुता जीवनोपयोगी वस्तुओं के आदान के संबन्ध में भी है। आत्मपोषण के लिए आवश्यक वस्तुएँ किसी भी वर्ण से भी ग्रहण की जा सकती थीं। संन्यासी सभी वर्णों के यहाँ से भिक्षा ग्रहण कर सकता था। इसी प्रकार ब्रह्मचारी भी भिक्षा सभी वर्ण के गृहस्थों से ले सकता था। किन्तु इससे यह भी लगता है कि ऐसे उल्लेखों में शूद्र वर्ण धर्मशास्त्रों में अभिप्रेत नहीं है। दूध, दही, फल, मधु, मृगमांस, शाक, भुना हुआ अन्न, आदि किसी भी वर्ण के व्यक्ति से लिया जा सकता है, शूद्र से भी ये वस्तुएं ली जा सकती हैं,। गौ० ध० सू० २. ८. ३ यदि किसी अन्य प्रकार से वृत्ति न चले तो शूद्र से जीवननिर्वाह की वस्तु ली जा सकती है: "वृत्तिश्चेन्नान्तरेण शूद्रम्"। में भी कुछ दैनिक जीवन में संबन्धित रहने वाले शूद्र के घर भोजन किया जा सकता है: जैसे नाई, चरवाहा, कुलपरम्परा के मित्र, हलवाहा, परिचारक, आदि: "पशुपालक्षेत्रकर्षककुलसंगतकारयितृपरिचारका भोज्यान्नाः।” २. ८. ६। यज्ञ के समय अब्राह्मण को भी अतिथि के समान सत्कार का अधिकारी माना गया है। इन उल्लेखों से धर्मसूत्र के समय में भी थोड़ी वर्ण विषयक सहिष्णुता के दर्शन होते हैं।

शूद्र की स्थिति—

धर्मशास्त्रों का अवलोकन करते समय वर्णव्यवस्था के संबन्ध में जो बात सबसे अधिक खटकने वाली है वह है शूद्र के प्रति उनका अन्याय और भर्त्सना