भारतकोश
गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Gautama Dharmasutra Hindi

महर्षि गौतम द्वारा

स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished360 पृष्ठ

पृष्ठ 42, कुल 360 में से

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से भरा हुआ दृष्टिकोण। वैदिक काल में धर्मसूत्रों से पूर्व ही शूद्र इच्छानुसार पीटा और मारा जाने वाला तथा केवल सेवावृत्ति में नियुक्त किया जाने वाला (यथाकामवध्यः, कामोत्थाप्यः, अन्यस्य प्रेष्यः) बताया गया है। उसके जीवन की यह नगण्य स्थिति धर्मशास्त्रों में और भी अधिक तुच्छ बन जाती है और वह अपने समूचे अधिकारों से वंचित होकर दास मात्र बन कर रह जाता है। पिछले पृष्ठों में इस बात पर प्रकाश डाला चुका है कि पाप और प्रायश्चित्त, दण्ड और अपराध, अशौच तथा यौनविषयक नैतिकता के संबन्ध में शूद्र के प्रति कितना अन्याय बरता जाता था। गौतमधर्मसूत्र २. १. ६४ में शूद्र का यही धर्म बताया गया है कि वह उच्चवर्णों के लोगों की सेवा करे, द्विजातियों का जूठा भोजन करे और उन्हीं के लिए धन का संचय करे। "तदर्थोऽस्य निचयः स्यात्।" वह कभी भी उच्चवर्ण के समकक्ष होने का साहस न करे। उनके समान मार्ग पर न चले और उनसे बात भी न करे। उनके समान आसन पर बैठने के लिए उसे कठोर दण्ड मिलने का विधान है। इसी प्रकार वह यदि ब्राह्मण का अपमान करता है तो उसकी जीभ, या प्रहार करता है तो शरीर का अंग ही काट देने का दण्ड है। जब कि इन्हीं अपराधों के लिए ब्राह्मण को कोई दण्ड नहीं। शूद्र की पत्नी के साथ उच्चवर्ण के लोग व्यभिचार करें तो उससे केवल कुछ प्रायश्चित्त करना था किन्तु शूद्र को ऐसा व्यभिचार उच्चवर्ण की स्त्री के साथ करने पर जीवन से हाथ धोना पड़ता था। इसी प्रकार वेद का अध्ययन तो दूर रहा, उसका श्रवण भी निषिद्ध था और सुन लेने पर उसका कान सीसे और जस्ते से भर दिया जाता था। शूद्र के वध के प्रायश्चित्त पर दृष्टि डाली जाय तो ज्ञात होगा कि धर्मसूत्र की दृष्टि में शूद्र का महत्व पशु से भी कम है। उच्चवर्ण के व्यक्तियों के साथ किसी भी प्रकार समानता प्राप्त करने की इच्छा करने पर वह दण्ड का ही भागी होता था : "आसनशयनवाक्पथिषु समप्रेप्सुर्दण्ड्यः।"

अस्पृश्यता का बहुत कुछ विकास धर्मग्रन्थों में मिल जाता है, यद्यपि उसका अपवाद भी यत्रतत्र मिलता है। गौतमधर्मसूत्र के अनुसार शूद्र का लाया हुआ जल दूषित हो जाता है और आचमन आदि के योग्य नहीं रह जाता। १. ९. १२। किन्तु ऊपर के कुछ उदाहरणों से वर्णविषयक सहिष्णुता का निर्देश भी किया जा चुका है। अन्य कतिपय आचार्यों ने सामान्यतः शूद्र का भोजन ग्रहण करने को बुरा नहीं माना है मनु ४।२११। प्रायः अस्पृश्यता का कारण पतित होना या महापातक कर्म करना होता था। चाण्डाल जाति के अस्पृश्य होने का उल्लेख है। इसी प्रकार शूद्रा से उत्पन्न पुत्र अस्पृश्य माना गया है। उनका दर्शन, स्पर्श और प्रतिग्रह वर्जित है। १. ४. २२-२३ इसी प्रकार प्रतिलोम विवाह से उत्पन्न निम्नवर्ण के पुरुष और उच्चवर्ण की स्त्री से उत्पन्न पुत्र धर्महीन और पतित एवं अस्पृश्य कहे गये हैं : "प्रतिलोमास्तु धर्महीनाः।"

प्रायः शूद्र के लिए धार्मिक संस्कार विहित नहीं है, और केवल एक आश्रम गृहस्थाश्रम ही विहित है। अतः कुछ आचार्यों ने उसके लिए पञ्चमहायज्ञ का विधान किया है। "पाकयज्ञैः स्वयं यजेत्" गौ० ध० सू० २. १. ६७। किन्तु शूद्र

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