गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Gautama Dharmasutra Hindi
महर्षि गौतम द्वारा
स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)
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से भरा हुआ दृष्टिकोण। वैदिक काल में धर्मसूत्रों से पूर्व ही शूद्र इच्छानुसार पीटा और मारा जाने वाला तथा केवल सेवावृत्ति में नियुक्त किया जाने वाला (यथाकामवध्यः, कामोत्थाप्यः, अन्यस्य प्रेष्यः) बताया गया है। उसके जीवन की यह नगण्य स्थिति धर्मशास्त्रों में और भी अधिक तुच्छ बन जाती है और वह अपने समूचे अधिकारों से वंचित होकर दास मात्र बन कर रह जाता है। पिछले पृष्ठों में इस बात पर प्रकाश डाला चुका है कि पाप और प्रायश्चित्त, दण्ड और अपराध, अशौच तथा यौनविषयक नैतिकता के संबन्ध में शूद्र के प्रति कितना अन्याय बरता जाता था। गौतमधर्मसूत्र २. १. ६४ में शूद्र का यही धर्म बताया गया है कि वह उच्चवर्णों के लोगों की सेवा करे, द्विजातियों का जूठा भोजन करे और उन्हीं के लिए धन का संचय करे। "तदर्थोऽस्य निचयः स्यात्।" वह कभी भी उच्चवर्ण के समकक्ष होने का साहस न करे। उनके समान मार्ग पर न चले और उनसे बात भी न करे। उनके समान आसन पर बैठने के लिए उसे कठोर दण्ड मिलने का विधान है। इसी प्रकार वह यदि ब्राह्मण का अपमान करता है तो उसकी जीभ, या प्रहार करता है तो शरीर का अंग ही काट देने का दण्ड है। जब कि इन्हीं अपराधों के लिए ब्राह्मण को कोई दण्ड नहीं। शूद्र की पत्नी के साथ उच्चवर्ण के लोग व्यभिचार करें तो उससे केवल कुछ प्रायश्चित्त करना था किन्तु शूद्र को ऐसा व्यभिचार उच्चवर्ण की स्त्री के साथ करने पर जीवन से हाथ धोना पड़ता था। इसी प्रकार वेद का अध्ययन तो दूर रहा, उसका श्रवण भी निषिद्ध था और सुन लेने पर उसका कान सीसे और जस्ते से भर दिया जाता था। शूद्र के वध के प्रायश्चित्त पर दृष्टि डाली जाय तो ज्ञात होगा कि धर्मसूत्र की दृष्टि में शूद्र का महत्व पशु से भी कम है। उच्चवर्ण के व्यक्तियों के साथ किसी भी प्रकार समानता प्राप्त करने की इच्छा करने पर वह दण्ड का ही भागी होता था : "आसनशयनवाक्पथिषु समप्रेप्सुर्दण्ड्यः।"
अस्पृश्यता का बहुत कुछ विकास धर्मग्रन्थों में मिल जाता है, यद्यपि उसका अपवाद भी यत्रतत्र मिलता है। गौतमधर्मसूत्र के अनुसार शूद्र का लाया हुआ जल दूषित हो जाता है और आचमन आदि के योग्य नहीं रह जाता। १. ९. १२। किन्तु ऊपर के कुछ उदाहरणों से वर्णविषयक सहिष्णुता का निर्देश भी किया जा चुका है। अन्य कतिपय आचार्यों ने सामान्यतः शूद्र का भोजन ग्रहण करने को बुरा नहीं माना है मनु ४।२११। प्रायः अस्पृश्यता का कारण पतित होना या महापातक कर्म करना होता था। चाण्डाल जाति के अस्पृश्य होने का उल्लेख है। इसी प्रकार शूद्रा से उत्पन्न पुत्र अस्पृश्य माना गया है। उनका दर्शन, स्पर्श और प्रतिग्रह वर्जित है। १. ४. २२-२३ इसी प्रकार प्रतिलोम विवाह से उत्पन्न निम्नवर्ण के पुरुष और उच्चवर्ण की स्त्री से उत्पन्न पुत्र धर्महीन और पतित एवं अस्पृश्य कहे गये हैं : "प्रतिलोमास्तु धर्महीनाः।"
प्रायः शूद्र के लिए धार्मिक संस्कार विहित नहीं है, और केवल एक आश्रम गृहस्थाश्रम ही विहित है। अतः कुछ आचार्यों ने उसके लिए पञ्चमहायज्ञ का विधान किया है। "पाकयज्ञैः स्वयं यजेत्" गौ० ध० सू० २. १. ६७। किन्तु शूद्र
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के लिए भी आचार का विधान है। वह भी आश्रित जनों का भरण-पोषण करे। सत्यभाषण करे और क्रोध न करे पवित्रता के नियम का पालन करे। “तस्यापि सत्यमक्रोधः शौचम्”। २. १. ५२। इसी प्रकार शूद्र श्राद्धकर्म भी करे। “श्राद्धकर्म” २. १. ५४। अपनी ही पत्नियों में अनुरक्त हो और एक पत्नीव्रत का पालन करे। “स्वदारवृत्तिः” २. १. ५६। शूद्र, की स्थिति में दासप्रथा का पूरा संकेत मिलता है। शूद्र परतन्त्र है, उसे स्वामी की हर हालत में सेवा करनी है। उसके छोटे वस्त्र आदि का ही उपयोग करना है। वैश्वदेव आदि पूजाकर्म में देवता का नाम लेकर नमोनमः कहना ही मन्त्र है। उसे अनार्य कहा गया है, जब कि उससे उच्चवर्ण को आर्य नाम से अभिहित किया गया है, इनके कार्यों में किसी प्रकार की उलटफेर नहीं होनी चाहिए। २. १. ६९।
ब्राह्मण के विशेषाधिकार—
राजा और विद्वान् ब्राह्मण ही व्रतों के कर्म को धारण करने वाले हैं। लोककल्याण और अनुचित कर्म का दण्ड देने के लिए सबको इनके अधीन कर दिया गया है। ब्राह्मण का स्थान राजा से भी बढ़कर है और वह सभी द्वारा पूज्य है। अन्य व्यक्तियों के समान उसे दण्ड नहीं मिलते। वही शारीरिक दण्ड से मुक्त है। राजा उसे छः प्रकार के दण्डों से मुक्त रखता है। वह पीटा नहीं जा सकता, वह हथकड़ी-बेड़ी से बाँधा नहीं जा सकता, उसे धन-दण्ड नहीं मिलना चाहिए, ग्राम या देश से निकाला नहीं जाना चाहिए, उसकी भर्त्सना नहीं होनी चाहिए और उसका त्याग नहीं किया जाना चाहिए “अवध्यश्चाबन्ध्यश्चादण्ड्यश्चाबहिष्कार्यश्चापरिवाद्यश्चापरिहार्यश्चेति।” गौतमधर्मसूत्र १. ८. १३। किंतु यह सब छूट या विशेषाधिकार क्यों ? इसे प्राप्त करने के लिए उस ब्राह्मण की योग्यतायें विचारणीय हैं। ये सारी सुविधायें और विशेषाधिकार नियमतः उस ब्राह्मण को मिलनी चाहिए जो अपने कर्म में रत हो और सभी संस्कारों से संस्कृत, हो उत्तम एवं आदर्श आचरण वाला हो, केवल धर्म का ज्ञान ही न रखता हो, उसका आचरण करता हो “तदपेक्षस्तद्वृत्तिः” १. ८. ७। जिस ब्राह्मण को राजा अपने से श्रेष्ठ आसन पर बैठाता है वह वस्तुतः अपने आचरण और विद्या आदि से उसके योग्य होना चाहिए। अपने मन्त्री या पुरोहित के रूप में वह कैसे ब्राह्मण का चयन करता है : “विद्याभिजनवाग्रूपवयः शीलसंपन्नं न्यायकृतं तपस्विनम्। विद्या में निष्णात, धर्म के ज्ञाता, शीलवान्, न्यायप्रिय और तपस्वी। यदि ऐसे ब्राह्मण को विशेषाधिकार मिलते हैं तो किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। समाज की व्यवस्था करने वाले और सबको सही मार्ग पर प्रेरित करने वाले चिन्तक और विचारक को सबसे बढ़कर सम्मान मिलना ही चाहिए, मिलता ही है। ऐसे ब्राह्मण को किसी के अधीन रखना लोककल्याण की दृष्टि से बुरा होगा और वह उसका पूरा उपयोग नहीं हो पायगा, क्यों कि उसे धर्मकार्य करने कराने की सुविधा नहीं होगी। इसी लिए ब्राह्मण, उपर्युक्त प्रकार का ब्राह्मण राजा के अधीन नहीं होता और करों
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आदि से मुक्त होता है, क्यों कि वह जो भी पुण्यकर्म करता है उसका लाभ राजा को भी मिलता है।
वास्तविक ब्राह्मण की योग्यता पर श्राद्धकालीन भोजन के प्रसंग में भी विचार किया गया है। उन योग्यताओं और अयोग्यताओं की विस्तृत सूची देखने से यह स्पष्ट हो जायगा कि ब्राह्मण वही है जो उत्तम आचरण करता है। आचरण से च्युत होने पर वह ब्राह्मण भोजन का अधिकारी भी नहीं है। सम्मानपूर्ण जीवन व्यतीत करने वाला और सदाचार का पालन करने वाला ही ब्राह्मण समझा जाना चहिए। यदि हम धर्मशास्त्रों की या भारतीय संस्कृति की ब्राह्मण की इस परिभाषा और अर्हता पर विचार करें तो ब्राह्मण से, विद्वान् और सदाचारी, संयमी और गुणवान् से कोई शिकायत नहीं होनी चाहिए। श्रोत्रिय ब्राह्मण को तो सबसे उच्च स्थान दिया गया है जो स्पष्टतः उसकी योग्यता और सामाजिक जीवन में महत्ता के कारण है।
किन्तु मौलिक रूप से ब्राह्मण को जिन कारणों से सर्वोच्च स्थान और अनेक विशेषाधिकार दिये गये थे, वे कालान्तर में वर्णव्यवस्था के रूढ़ और कठोर होने के साथ ही कम विचारणीय होते गये और ब्राह्मण केवल ब्राह्मण कुल में जन्म के आधार पर सम्मान और विशेषाधिकार के लोभी हो गये जिससे समाज में अन्याय और विषमता को स्थान मिला। बड़े से बड़े अपराध के लिए केवल देशनिष्कासन और प्रायश्चित ही उसके लिए दण्ड था, जब कि उसके विद्वान् होने के कारण अधिक दण्ड मिलना ही उचित ठहराया गया है। महापातक कर्मों के लिए केवल शरीर पर चिह्न लगाकर उसे बहिष्कृत किया जाता था। समान ही अपराध के लिए उससे निम्न वर्ण वालों को उससे अधिक दण्ड मिलता था। उसके वध का पाप सबसे बड़ा पाप था। उसे मिला हुआ धन उसकी सन्तान का हो जाता था। उसके बिना उत्तराधिकारी के मरने पर उसका धन श्रोत्रिय ब्राह्मणों को मिलता था ३, १०, ३९ और उसे कोई अब्राह्मण साक्षी के रूप में नहीं बुला सकता था। इनके अतिरिक्त भी ब्राह्मण को नैतिकता के नियमों की अवहेलना करके भी अनेक विशेषाधिकार केवल ब्राह्मण होने के नाम पर मिलने का संकेत भी धर्मसूत्र में दिखाई पड़ते हैं।
राजा और लोकव्यवस्था—
धर्मसूत्र के अनुसार राजा का कार्य है न्यायपूर्वक दण्ड देना ३. १. ८ और दण्ड देकर पथ से विचलित लोगों को पुनः पथ पर लाना। वह विपरीत आचरण वाले को संभालता है। और गुरु भी धर्म के विपरीत कार्य करे तो वह उसे मार्ग पर चलने का आदेश दे सकता है। किन्तु राजा ब्राह्मण के ऊपर शासन नहीं करता वह उसकी सहायता से शासन करता है और उससे परामर्श लेकर धर्म का विधान जानकर न्याय करता है। राजा ब्राह्मण के अतिरिक्त सबका स्वामी होता है "राजा सर्वस्येष्टे ब्राह्मणवर्जम्।" २. २. १। ब्राह्मण की प्रेरणा से कार्य करने वाला राजा समृद्धिशाली होता है।
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“ब्रह्मप्रसूतं हि क्षत्रमृध्यते न व्यथत इति च विज्ञायते ।” २. २. १४। राजा सबका रक्षक होता है और सबकी रक्षा के लिए वह युद्ध करता है। ब्राह्मण यदि धर्म का विधान करने वाला है तो राजा उसका पालन कराने वाला है। इन दोनों के समन्वय से ही लोक की रक्षा होती है और सभी अपने उचित मार्ग पर चलते हैं। यदि राजा अपने कर्म में अयोग्य है और धर्म का पालन नहीं करता तो वह पाप का भागी होता है। दण्ड न देने पर राजा ही पापी होता है। इसी प्रकार यदि व्यवहार में राजा अन्याय करता है तो धर्म की हानि होने से सभी को पाप लगता है—साक्षियों को, न्यायकर्ता को, सभासदों को और राजा को भी। साक्षिसभ्यराजकर्तृषु दोषो धर्मतन्त्रपीडायाम् । २. ४. ११। राजा को समाज में बहुत सम्मान प्राप्त है और वह मधुपर्क द्वारा पूज्य होता है। ब्राह्मण भी उसे उचित सम्मान प्रदान करता है।
धर्मशास्त्रों की लोकव्यवस्था जनतांत्रिक प्रतीत होती है। राजा निरंकुश नहीं है, अपितु वह धर्म के लिए ब्राह्मण पर या योग्य विधिवेत्ताओं पर निर्भर है। न्याय व्यवहार की व्यवस्था और प्रक्रिया तो बहुत ही जनतांत्रिक है और दण्ड देने के पूर्व अपराध के प्रत्येक पहलू पर विचार किया जाता है। न्याय हो, अन्याय न हो यही दण्डव्यवहार का मुख्य लक्ष्य बारबार दुहराया गया लगता है। साक्षी के सत्य भाषण पर बहुत महत्व दिया गया है और उसके असत्यभाषण का पाप और बहुत अधिक बताया गया है। इसी प्रकार परिषद् के निर्णय मान्य ठहराये गये हैं जो एक की प्रकार पंचायत थी। अपने-अपने कर्म में उस कार्य के करने वाले सदाचारी व्यक्तियों के निर्णय को मान्य ठहराया गया है :
“कर्षकवणिक्पशुपालकुसीदिकारवः स्वे स्वे वर्गे ।” २. २. २१। इसी प्रकार राजा को परामर्श दिया गया है कि पेचीदे मामलों में वह अनुभवी और जानकार लोगों की राय लेकर निर्णय करे : “विप्रतिपत्तौ त्रैविद्यवृद्धेभ्यः प्रत्यवहृत्य निष्ठां गमयेत्” २. २. २५।
इस प्रकार कुल मिलाकर धर्मसूत्र की लोकव्यवस्था बहुत ही समन्वयपूर्ण है। समाज के विभिन्न वर्गों में जिस सहयोग का विधान किया गया है वह एक उत्तम उद्देश्य की सिद्धि में सहायक है। ब्राह्मण के अतिरिक्त अन्य वर्ण के लोग क्षत्रिय और वैश्य अपने-अपने कर्म में लगकर धर्म, अर्थ, काम की साधना करें यही सबके लिए धर्मशास्त्र को अभीष्ट है। सभी अपने कर्म में रत हों और सभी अपने योग्य कार्य करें। समाज में सामंजस्य हो और सब मिलकर एक पूर्ण समाज का निर्माण, विकास करें और यही धर्म के अन्तर्गत की गयी वर्णव्यवस्था का मूल उद्देश्य है। परस्पर सहिष्णुता, समन्वय और सहयोग की तथा मानवता की भावनायें ही समाज का उद्धार कर सकती हैं। भारतीय धर्म के इन कल्याणकारी सन्देशों को ग्रहण करके बुराइयों को दूर करके उन्हें भूल जाना ही धर्म का वर्त्तमान लक्ष्य होना चाहिए।
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गौतमधर्मसूत्र में नारी
“अस्वतन्त्रा धर्मे स्त्री”। २.९.१ अर्थात् पति का अनुसरण करना ही स्त्री का धर्म है, वह धर्म में स्वतन्त्र नहीं होतीं। धर्मसूत्र में नारी के धर्म का मूलमन्त्र यह सूत्र ही है। स्त्री पति पर आश्रित रहे और उसका अनुसरण करे इस कथन में धर्मसूत्र कोई नवीनता नहीं प्रस्तुत करते। बार-बार और विशेष बल उसके पुरुषसम्बन्ध-विषयक आचरण पर दिया गया है। गृह्यकर्म में और धार्मिक क्रियाओं में गृहिणी की हैसियत से, सहधर्मिणी की हैसियत से, वह गौरवपूर्ण पद पर प्रतिष्ठित है, किन्तु उसके इस रूप के विषय में कोई उल्लेखनीय विशेषता नहीं है। जहाँ तक पारिवारिक या सामाजिक जीवन में नारी के स्थान का प्रश्न है उसके जीवन का लक्ष्य है पुत्र या सन्तान की उत्पत्ति। पुत्र और सुयोग्य पुत्र की कामना और उसकी अनिवार्यता धर्मशास्त्र की दृष्टि में केवल लौकिक या व्यावहारिक दृष्टि से ही नहीं व्यक्त की गयी है अपितु एक पारमार्थिक या पारलौकिक दृष्टि से भी पुत्रप्राप्ति गृहस्थाश्रम का लक्ष्य बतायी गयी है, क्योंकि सुयोग्यपुत्र वंश की कई पढ़ियों के पाप धो डालता है और अपने पूर्वजों को भी स्वर्ग की प्राप्ति कराता है। “पुनन्ति साधवः पुत्राः” आदि गौ० ध० सू० १. ४. २४-२७ । यह धर्मसूत्र की अपनी कथनशैली है। वस्तुतः इसे यही कहना है कि कुल की पवित्रता और मर्यादा सर्वोपरि है।
धर्मसूत्र की दृष्टि में स्त्री का महत्त्व इसलिए है कि वह मां है, सन्तान की जननी है और तभी तो धर्मसूत्र इस का स्पष्ट संकेत करता है कि सभी श्रेष्ठ जनों में माता सबसे बढ़कर है। “आचार्यश्रेष्ठो गुरूणां मातेत्येके” १. २. ५६ ।
पवित्र सन्तान के लिए स्त्री की पवित्रता अनिवार्य है और इस पवित्रता का संबन्ध कुल की शुद्धता, वैवाहिक संबन्ध की धर्मसम्मतता, और आचरण की श्रेष्ठता से है। सन्तान के जीवन विकास में माता का प्रभाव और योगदान सबसे अधिक होता है और इसी कारण धर्मसूत्र नारी की पवित्रता पर बहुतः गौरव देते हैं। गृहस्थ के लिए, धर्म की रक्षा के लिए तथा जीवन एवं समाज के सन्तुलन के लिए विवाह एक अनिवार्य और श्रेष्ठ व्यवस्था है, अतः धर्मसूत्र विवाह के प्रकार, योग्यता, और वैधता पर विस्तार से विचार करता है। गौतमधर्मसूत्र में भी पत्नी की योग्यता, उसके भिन्न प्रवर के होने, मातृ एवं पितृपक्ष से रक्तसंबंध से दूर होने का विचार करके विवाह के भिन्न भेदों पर दृष्टिपात किया गया है और ब्राह्म, प्राजापत्य, आर्ष और दैव विवाहों को धर्मसंमत्त ठहराया गया है। 'चत्वारो धर्म्याः प्रथमाः । १. ४. १२ ।' अर्थात् वेद के विद्वान्, उत्तम आचरण वाले और एकपत्नीव्रत का पालन करने वाले, अभिभावक द्वारा चुने गये या ऋत्विज वर के साथ कन्या का विवाह श्रेष्ठ है। किन्तु अन्य प्रकार के भी विवाह प्रचलित थे और उनमें या तो युवक और युवती के पारस्परिक प्रेम संबन्ध को या वर एवं कन्या पक्षों के बीच धन का आदान-प्रदान को अथवा पुरुष द्वारा कन्या प्राप्ति के लिए बलप्रयोग को निमित्त बताया गया है। धर्मसूत्र विवाह में इस प्रकार की
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स्वच्छन्दता की अनुमति नहीं देते। हां, कुछ धर्मशास्त्रों में प्रेम या धनदान के निमित्त द्वारा कन्या प्राप्त करके किये गये विवाह को उचित ठहराया गया है इसका संकेत गौतमधर्मसूत्र में किया गया है १. ४. १३।
विवाह की अनिवार्यता पर धर्मसूत्रकार ने इतना बल दिया है कि वह अपनी सभी वर्णविषयक कठोरता को भी भूल जाता है, वह व्यवहार और सिद्धान्त के बीच उलझा सा दिखाई पड़ता है और विवाह के लिए काफी स्वतन्त्रता दे देता है। सवर्णविवाह को श्रेष्ठ बताने के साथ ही वह अनुलोम विवाहों अर्थात् वर से निम्न वर्ण की कन्या के विवाहों को धर्मसंमत करता है, जिससे स्पष्ट है कि वैवाहिक संबन्ध में वर्ण अभी उतना अवरोध नहीं बना था। ब्राह्मण का शूद्र वर्ण की कन्या को पत्नी के रूप में ग्रहण करना धर्मसूत्र को स्वीकार है। १. ४. १४। प्रतिलोम विवाह भी समाज में चलते दिखाई पड़ते हैं, धर्मसूत्र को केवल इस प्रकार के विवाहों से उत्पन्न पुत्रों के ही प्रति सहानुभूति नहीं है। वह उन्हें कोई धार्मिक स्थान समाज में नहीं देता, किन्तु इस बात का मार्ग खुला रखता है कि धर्माचरण से वे अपनी उन्नति करें, उनके वर्ण का उत्कर्ष भी हो सकता है। गौतमधर्मसूत्र प्रतिलोम विवाह पर आघात करने के विचार से ही इस प्रकार से उत्पन्न पुत्र के विषय में कहता है : “प्रतिलोमास्तु धर्महीनाः” और यह भी कहता है कि शूद्रा स्त्री से उत्पन्न पुत्र धर्महीन होता है और शूद्र से उत्पन्न पुत्र पतित होते हैं। उनका दर्शन, स्पर्श और प्रतिग्रह वर्जित है। १.४.२२-२३। किन्तु सम्पत्ति में ऐसे पुत्र को भी अंश मिलता था ३. १० ३७। तथा ब्राह्मण के चारों वर्णों की पत्नियों से उत्पन्न पुत्रों में वर्णानुसार सम्पत्ति का विभाजन होता था। ये बातें इस तथ्य की ओर स्पष्ट संकेत करती हैं कि विवाह के लिए वर्ण के अवरोध की कठोरता में भी नरमी आ सकती थी।
इस विवाह की अनिवार्यता के कारण ही हमारा धर्मसूत्र विवाह योग्य लड़की को यह सुझाव देता है कि यदि उसके माता-पिता उसका विवाह यथासमय नहीं कर देते तो वह स्वयं पिता से प्राप्त अलंकारों का परित्याग करके अपने अनुकूल युवक से विवाह कर ले।
“त्रीन्कुमार्यतूनतीत्य स्वयं युज्येतानिन्दितेनोत्सृज्य पित्र्यानलंकारान्” २. ९. २० विवाह कर्म के लिए समाज के निम्नतम वर्ण से भी, शूद्र वर्ण से व्यक्ति के भी और अपने वर्ण के अनुरूप कार्य न करने वाले से भी धन लिया जा सकता है : “द्रव्यादानं विवाहसिद्धयर्थं धर्मतन्त्रसंयोगे च शूद्रात्” २. ९. २४।
गौतमधर्मसूत्र की दृष्टि में स्त्री के लिए विवाह इतना अनिवार्य है कि सूत्रकार का तो यह मत है कि लड़की जब लज्जा का अनुभव करके वस्त्र पहनने की ओर ध्यान देने लगे तभी उसका विवाह कर देना चाहिए।
विवाह के प्रमुख लक्ष्य सन्तानप्राप्ति के लिए जिस स्त्री को धर्मसूत्र यह आदेश देता है कि वह अपने पति के अतिरिक्त किसी दूसरे के विषय में सोचे भी नहीं। “नातिचरेद्भर्त्तारम्” गौ० धर्म० सू० २. ९. २। और वाणी, नेत्र और कर्म का संयम
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रखे, उसे पति की मृत्यु पर, उसके सन्तानोत्पत्ति के लिए अयोग्य होने पर दूसरे पुरुष से यौवनसंबन्ध से पुत्र उत्पन्न करने का विधान करता है। अपतिरपत्य-लिप्सुर्देवरात्। २. ९. ४। सन्तानोत्पत्ति एक पुण्य कर्म है, धर्म है और धर्मसूत्र की दृष्टि में नैतिकता की भावना इस धर्म के अधीन है। धर्मसूत्र की दृष्टि में स्त्री और पुरुष के संबन्धों का मुख्य प्रेरक धर्म होना चाहिए काम नहीं। इस धर्म की छाया में नारी को धर्मसूत्र ने यथोचित गौरव दिया है, परिवार और समाज में महत्त्वपूर्ण स्थान दिया है। आचार्य की पत्नी आचार्य के समान पूज्य है और उसका नाम न लेने का आदेश दिया गया है :
“आचार्यतत्पुत्रदीक्षितनामानि” १. २. २५। एवं उसका चरणस्पर्श शिष्य के लिए विहित है। विप्रोष्योपसंग्रहणं गुरुभार्याणाम्” १. २. ३९।
किन्तु हमारे धर्मसूत्र में नारी का एक और भी रूप आता है, जब वह किसी भी प्रकार के सम्मान की अधिकारिणी न होकर केवल मनुष्य की एक सम्पत्ति बना दी गयी है। विवाह के पवित्र बन्धन के अलावा उसका एक और भी रूप है, जिस रूप में वह सामान्य मानवोचित न्याय भी पाने की अधिकारिणी नहीं रह गयी है। उदाहरण के लिए सेवावृत्ति करने वाली निम्नवर्ण की दासी एक चल सम्पत्ति दिखाई देती है, उसे खरीदा और बेचा जा सकता है, बन्धक रखा जा सकता है और उत्तराधिकार में प्राप्त किया जा सकता है। इन बातों का संकेत गौतमधर्मसूत्र १. ७. १४ 'पुरुषवशाकुमारीवेहतश्च नित्यम्' तथा १. ७. १६ 'नियमस्तु' में मिलता है। दासी के विषय में विवाद का प्रश्न शीघ्र हल होना चाहिए २. ४. २९ इससे ऐसा पता चलता है कि दासी को लेकर उस समय झगड़े खड़े हो जाते थे और उसका न्यायालय द्वारा निर्णय होता था। बन्धक रखी हुई दासी के विषय में तो बड़ी रोचक बात यह है कि वह जिसके पास बन्धक रखी गयी हो उसके द्वारा भोगी जा सकती है—'पशुभूमिस्त्रीणामनतिभोगः' पृ० २. ३. ३६। इस सूत्र की टीका में हरदत्त ने इसका औचित्य यह कह कर ठहराया है कि अपने घर में रखी हुई काम आने योग्य वस्तु रोज-रोज दिखाई पड़े तो कोई कब तक परहेज और संयम करेगा :
“कथमभन्तरगृहे दृश्यमानां गां स्वयं तक्रादि क्षीवोपयुञ्जान उपेक्षेत,
कथं वा बहुफलमारामं, कथं वा दासीं यौवनस्थामन्वहं परिचारिकाम् ।”
दूसरा उदाहरण है वेश्या और व्यभिचारिणी स्त्री का, जिनका उल्लेख भी धर्मसूत्र में मिलता है। धर्मसूत्रकार की दृष्टि में ऐसी स्त्री के जीवन का कोई मूल्य नहीं। उसका वध कर देने पर भी कोई प्रायश्चित्त करने की जरूरत नहीं पड़ती, अधिक से अधिक एक नीलवृष का दान दे दिया और उसके वध के पाप से छुट्टी मिल गयी। ब्रह्मबन्ध्वां चलनायां नीलः। वैशिके न किंचित्। ३. ४. २६, २७।
धर्मसूत्र की दृष्टि में नारी को जो कुछ संमान प्राप्त है उसके दो आधार हैं—वर्ण और आचरण। निम्नवर्ण की स्त्री के साथ संबन्ध की मनमानी बरती जा सकती है किन्तु उच्चवर्ण की स्त्री के साथ संबन्ध रखने पर उसके भीषण और
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रोमांचकारी परिणाम बताये गये हैं। और कठोर प्रायश्चित्त का विधान किया गया है। जिस बात पर धर्मसूत्र बार-बार जोर देता है वह है स्त्री का आचरण और आचरणहीन स्त्री की प्रत्येक अवसर पर निन्दा की गयी है। ऐसी स्त्री का अन्न अभक्ष्य होता है २. ८. १७ पृ० १८३। पति के अतिरिक्त अन्य पुरुष से संबन्ध रखने वाली स्त्री को एक वर्ष तक कठोर व्रत का जीवन बिताने का नियम है, जिस समय में उसे निन्दित और बहिष्कृत सी होकर अपने पाप का प्रायश्चित करना होता है। जानबूझकर गर्भपात करना भी एक ऐसा कर्म है जो स्त्री को पतित बना देता है और ऐसी स्त्री की दृष्टि यदि भोजन पर पड़े तो भोजन खाने योग्य नहीं रह जाता २. ८. ११। और भ्रूणहत्या करने वाली एवं अपने वर्ण से निम्नवर्ण के पुरुष के साथ संबन्ध वाली स्त्री घोर पातकी होती है : “भ्रूणहनि हीनवर्णसेवायां च स्त्री पतति” ३. ३. ९।
किन्तु धर्मसूत्रकरों की अभंगपूर्ण कठोर दृष्टि के बावजूद भी समाज में स्त्री पुरुष संबन्ध की स्वच्छन्दता चलती रहती है, इसे भी स्वीकारा गया है और नाजायज संबन्ध से उत्पन्न पुत्रों का उल्लेख अनेक स्थलों पर किया गया है। सम्पत्ति के उत्तराधिकार के सन्दर्भ में गूढोत्पन्न पुत्र, जो स्पष्टतः चोरी-छिपे अनुचित संबन्ध से उत्पन्न होता था तथा अविवाहिता स्त्री के पुत्र कानीन को भी सम्पत्ति में अधिकारी बताया गया है। इसी प्रकार विवाह व्यवस्था की कठोरता और पवित्रता के नियमों के बावजूद भी विवाह में स्वच्छन्दता थी, एक पति का परित्याग कर स्त्री दूसरा विवाह कर सकती थी ३. १० ३१। पृ० २८५। पर दो बार और गर्भवती के भी दूसरे पुरुष से विवाह करने का उल्लेख है। कुल मिलाकर यह स्पष्टतः प्रतीत होता है कि धर्मसूत्र एक पुरुष का एक स्त्री के साथ ही और एक स्त्री का एक ही पुरुष के साथ संबन्ध को सीमित करने पर महत्त्व देता है, हलां कि समाज में उसके मान्य विचारों के विपरीत स्थिति भी व्याप्त है।
नारी पर सर्वाधिक दृष्टिपात यौनविषयक नैतिकता के सन्दर्भ में किया गया है। स्त्री-पुरुष के यौनसम्बन्धों के विषय में नैतिक-अनैतिक का विचार तो इतना किया गया है कि कहीं-कहीं धर्म का एक यही नारा सुनाई पड़ता है “स्त्री से बचो”। धर्मसूत्रकार की मनोवैज्ञानिक दृष्टि कभी-कभी तो फ्रायड जैसी लगती है और वह पुरुष के असामान्य यौनाचारों पर भी नियम बनाने की आवश्यकता अनुभव करता है। ३. ४. ३६ पृ० २३४। यह ठीक है कि धर्माचरण के लिए कामभावना को संयमित करना आवश्यक है, परन्तु प्रत्येक अवसर पर कामुकता का भय उस प्रवृत्ति की ओर संकेत करता है जिससे समाज में दूसरी ओर धर्म की अपेक्षा काम को ही प्रश्रय मिलता है और कामसूत्र जैसे ग्रंथों की रचना की पृष्ठभूमि बनती है। धर्मसूत्र ब्रह्मचर्य को बड़ा तप मानता है पृ० २०४। और ब्रह्मचर्यं धर्माचरण का आवश्यक अंग है। विद्यार्थी जीवन में इस व्रत का बड़ी कठोरता से पालन करने का आदेश बार-बार दिया गया है। हमारे धर्मसूत्र में कहा गया है कि ब्रह्मचारी को किसी स्त्री पर दृष्टिपात नहीं करना चाहिए, इससे कामभाव ना के उत्तेजन की आशंका रहती है—
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“स्त्रीप्रेक्षणोलम्भने मैथुनशंकायाम्” १. २. २२ यहां तक कि यदि गुरुपत्नी भी युवती हो तो उसका चरण नहीं छूना चाहिए “नैके युवतीनां व्यवहारप्राप्तेन” १. २. ४० । ब्रह्मचर्य में स्त्रीसम्बन्ध के त्याग पर इतना बल दिया गया है कि ब्रह्मचर्य मैथुनत्याग का पर्यायवाची हो जाता है और उसके अन्य आचरण गौण हो जाते हैं। सामान्यतः कुमारी लड़की पर दृष्टिपात करना निषिद्ध बताया गया है और उनके आलिंगन का स्पष्ट निषेध किया गया है।
स्त्री के साथ अनुचित संबन्ध के लिए प्रायश्चित्त एवं दण्ड का विधान भी उस स्त्री के उच्च वर्ण के होने के आधार पर किया गया है। शूद्र की स्त्री के साथ कोई अनुचित यौनसंबन्ध रखे तो वह कोई बड़ा पाप नहीं है, किन्तु साथ ही साथ सामान्य रूप में परस्त्रीगमन के लिए दो वर्ष के प्रायश्चित्त का विधान है तथा श्रोत्रिय ब्राह्मण की पत्नी के साथ व्यभिचार के लिए तीन वर्ष का ब्रह्मचर्य बताया गया है। ३. २. २९, ३० । समाज में सबसे ऊंचा स्थान गुरु का है और गुरुपत्नीगमन सबसे बड़ा पातक है। उसके लिए घोर प्रायश्चित्त करने का नियम बताया गया है। और ऐसे पातकी के पाप तभी दूर होते हैं जब वह लोहे की अग्नि में तपने से लाल बनी हुई स्त्रीप्रतिमा का आलिंगन करके या अपनी जननेन्द्रिय आदि का उच्छेद कर नैऋर्त्य दिशा में चलते-चलते मृत्यु प्राप्त करते हैं। निकटसम्बन्धवाली स्त्री के साथ व्यभिचार के लिए भी इसी प्रकार का प्रायश्चित्त बताया गया है। किन्तु दूसरी ओर कुछ आचार्यों के इस मत का उल्लेख भी किया गया है कि गुरुपत्नी के अतिरिक्त अन्य स्त्रियों के साथ अनुचित संबन्ध होने पर महापातक नहीं होता। न स्त्रीष्वगुरुतल्पं पततीत्येके। वर्ण के अतिरिक्त रक्तसंबन्ध स्त्री के प्रति यौनाचार के पाप का निर्णायक आधार है। ब्रह्मचर्य भंग करने वाले अवकीर्णी के लिए भी कठोर प्रायश्चित्त बताया गया है। इन सब उल्लेखों से यह स्पष्ट होता है कि स्त्री की पवित्रता, धर्मसूत्र के समाज में सर्वोपरि थी, किन्तु साथ ही साथ अनैतिकता स्वाभाविक रूप में थी। नारी मां के रूप में पूज्य भी थी, किन्तु किसी वस्तु के समान केवल भोग की सामग्री भी थी। समाज और परिवार के भीतर उसे कुछ महत्व तो प्राप्त अवश्य था, किन्तु उसके व्यक्तित्व को कोई विकास की स्वतन्त्रता नहीं थी। स्त्रीसम्बन्ध विषयक नैतिकता के विचाराधिक्य ने अवश्य ही नारी की प्रतिष्ठा को धक्का पहुंचाया और कुल मिलाकर उसका वह स्थान नहीं था, जो उसे वेदों और उपनिषदों की परम्परा में प्राप्त था। सूत्र के समय में नारी की इस हीन दशा का मुख्य कारण था उन्हें निन्दित, अपवित्र, मानने की प्रवृत्ति तथा ब्रह्मचर्य की रक्षा में उन्हें शत्रु समझने की धारणा। साथ ही साथ पुत्रप्राप्ति मात्र को मुख्य आध्यात्मिक लक्ष्य मानकर विवाह एवं पति पर आश्रित होने को ही नारी का अन्तिम प्रयोजन ठहराने से धर्मसूत्रकाल की नारी मानवीय अधिकारों से वंचित और पददलित भी दिखाई देती है, परन्तु सारा दोष धर्मसूत्रों का नहीं है। धर्मसूत्र की मौलिक व्यवस्था में अच्छाइयां भी हैं किन्तु उसकी दृष्टि न तो भविष्य पर है और न अतीत पर, एक के विषय में उसकी दृष्टि संकुचित है और दूसरे को वह बहुत-कुछ भूला सा लगता है। यौन विषयक नैतिकता के सन्दर्भ में धर्मसूत्र-
( ४६ )
कार भी वही कहता हुआ प्रतीत होता है जो शेक्सपियर ने कहा है- "हे नैतिक दुर्बलते, तुम्हारा ही नाम नारी है।" अथवा महाभारत की तरह वह भी यही कहना चाहता है कि नारी दोषों की खान है, उसको कोई स्वतन्त्रता नहीं मिलनी चाहिए :
न स्त्रीभ्यः किंचिदन्यत् पापीयस्तरमस्ति वै ।...
क्षुरधारा विषं सर्पों वह्निरित्येकतः स्त्रियः ॥
धर्मशास्त्रकारों से लेकर आगे के समूचे साहित्य में भी यह प्रवृत्ति हमेशा के लिए आ जाती है कि नारी झूठ बोलने वाली, अविश्वसनीय, अविवेकी, धूर्त्त, मूर्ख, लोभी, अपवित्र और निर्दय होती है, पथभ्रष्ट करने वाली होती है।
नारी के प्रति यह अन्याय की दृष्टि और नैतिकता का आडम्बरभरा आग्रह समाज के एक महत्वपूर्ण, अधिक प्रभावशाली और अधिक मानवीय अंग को चिरकाल के लिए पंगु बना देता है और वह अपनी सही दिशा भूल जाती है। धर्म के साथ काम को समन्वय और असद् के सद् की ओर प्रयाण का भारतीय सन्देश समाज की वर्तमान मोहनिद्रा के लिए सुमतिदायी सविता है, भावी जीवन की आशा है।
—उमेशचन्द्र पाण्डेय
विषयानुक्रम
( भूमिका )
| पृष्ठ | |
|---|---|
| सूत्रसाहित्य | १ |
| धर्मसूत्र | ५ |
| बौधायन-धर्मसूत्र | ८ |
| आपस्तम्ब- ,, | ,, |
| हिरण्यकेशि- ,, | ,, |
| वसिष्ठ- ,, | ,, |
| विष्णु- ,, | ९ |
| हारीत- ,, | ,, |
| शंखलिखित- ,, | ,, |
| अन्य सूत्रग्रन्थ | ,, |
| धर्मसूत्रों का वर्ण्य विषय | ,, |
| धर्मसूत्र और स्मृतियाँ | १० |
| गौतम धर्मसूत्र | ११ |
| गौतम धर्मसूत्र में अन्य साहित्य का उल्लेख | १२ |
| गौतम धर्मसूत्र का सामवेद से सम्बन्ध | १३ |
| धर्मसूत्र के रचयिता : गौतम | १४ |
| गौतम धर्मसूत्र के संस्करण और टीकाकार | ,, |
| गौतम धर्मसूत्र में वर्णित विषय | १५ |
| धर्म | ,, |
| धर्म के उपादान | १७ |
| भारतीय धर्म का स्वरूप | १८ |
| आचार और नैतिक भावना | २० |
| गौतम धर्मसूत्र में वर्णाश्रम धर्म | ३० |
| वर्ण-व्यवस्था | ३४ |
| शूद्र की स्थिति | ३६ |
| ब्राह्मण के विशेषाधिकार | ३८ |
| राजा और लोकव्यवस्था | ३९ |
| गौतम धर्मसूत्र में नारी | ४१ |
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विषयानुक्रम
प्रथम प्रश्न
प्रथम अध्याय
| विषय | पृष्ठ | |
|---|---|---|
| धर्म का प्रमाण | ... | १ |
| श्रुति और स्मृति के विरोध की स्थिति में निर्णय | ... | २ |
| ब्राह्मण के उपनयन का समय | ... | ३ |
| क्षत्रिय और वैश्य के उपनयन का काल | ... | ४ |
| आपद्युपनयन का समय | ... | ४ |
| उपनीत ब्रह्मचारी की मेखला | ... | ५ |
| उपनीत ब्रह्मचारी का दण्ड | ... | ६ |
| द्रव्यशुद्धि | ... | ७ |
| रस्सी आदि की शुद्धि | ... | ९ |
| शौच का नियम | ... | ९ |
| आचमन की विधि | ... | १० |
| दो बार आचमन का निमित्त | ... | १० |
| दांत में लगे उच्छिष्ट के विषय में विचार | ... | ११ |
| दूषित पदार्थों के लेप की शुद्धि | ... | ११ |
| गुरूपसदन की विधि | ... | १२ |
| प्राणायाम | ... | १२ |
| गुरु के चरण छूने का नियम | ... | १३ |
| गुरु और शिष्य के बीच किसी प्राणी के आने पर नियम | ... | १४ |
द्वितीय अध्याय
| विषय | पृष्ठ | |
|---|---|---|
| ब्रह्मचारी के नियम | ... | १६ |
| अनुपनीत के लिये आचमन का विधान नहीं है | ... | १७ |
| अनुपनीत के विषय में शौचनियम का अभाव | ... | १८ |
| अनुपनीत के लिये पित्र्य कर्म और वेदोच्चारण का निषेध | ... | १८ |
| उपनीत व्यक्ति के लिये ब्रह्मचर्य का विधान | ... | १८ |
५ गौ० ध० सू०
( २ )
| उपनीत के लिये होम और भिक्षाचरण का विधान | १९ |
| सत्यभाषण का आदेश ... | १९ |
| स्नान का आचार ... | १९ |
| संध्योपासन की विधि ... | १९ |
| सूर्य को देखने का निषेध ... | २० |
| त्याज्य वस्तुयें तथा सुख ... | २१ |
| गुरु के निकट बैठने का आचार ... | २१ |
| जुआ, निम्नकोटि की सेवावृत्ति और हिंसा का त्याग | २२ |
| आचार्य आदि का नाम लेने का निषेध ... | २२ |
| अश्लील तथा कष्टकारी वचन एवं मादक द्रव्य का त्याग | २२ |
| गुरु के निकट सोने का नियम ... | २२ |
| गुरुकुल में निवास के नियम ... | २३ |
| गुरु के पारिवारिक जनों के साथ व्यवहार ... | २५ |
| यात्रा से वापस आने पर गुरु के चरण छूने का विधान | २५ |
| भिक्षा के विषय में नियम ... | २६ |
| भोजन करने का ढंग ... | २७ |
| शिष्य को दण्ड देने का नियम ... | २७ |
| गुरुकुल में निवास की अवधि ... | २८ |
| आचार्य की श्रेष्ठता ... | २९ |
तृतीय अध्याय
| आश्रम का विधान ... | ३० |
| गृहस्थाश्रम का महत्त्व ... | ३१ |
| नैष्ठिक ब्रह्मचारी ... | ३१ |
| संन्यासी के द्रव्य-संग्रह का निषेध ... | ३२ |
| संन्यासी के नियम ... | ३२ |
| संन्यासी के लिये भिक्षा का नियम ... | ३३ |
| वाणी, नेत्र और कर्म का संयम ... | ३३ |
| कौपीनधारण का आदेश ... | ३३ |
| स्वतः गिरे हुए फल आदि का भोजन ... | ३४ |
| ग्राम में निवास का नियम ... | ३४ |
| प्राणियों के प्रति दया ... | ३५ |
( ३ )
वानप्रस्थ के नियम ... ३५ वानप्रस्थ में भोजन का नियम ... ३६
चतुर्थ अध्याय
गृहस्थका धर्म ... ३८ विवाह में प्रवर का विचार ... ३८ ब्राह्म विवाह ... ३९ आर्ष विवाह ... ३९ दैव विवाह ... ४० गान्धर्व विवाह ... ४० आसुर विवाह ... ४० राक्षस विवाह ... ४० पैशाच विवाह ... ४१ धर्मसंगत विवाह ... ४१ अनुलोम विवाह का नियम ... ४१ प्रतिलोम विवाह से उत्पन्न पुत्र ... ४२ वर्ण का उत्कर्ष और अपकर्ष ... ४३ प्रतिलोम विवाह से उत्पन्न पुत्र के धर्म का अभाव ... ४४ सदाचारी पुत्र ... ४५
पंचम अध्याय
गर्भाधान का समय ... ४६ पंच महायज्ञ ... ४७ स्वाध्याय का नियम ... ४७ पितृयज्ञ ... ४८ अग्निकर्म की अवधि ... ४८ देवयज्ञ ... ४९ भिक्षा देने का नियम ... ५१ दान देने की ' विधि ... ५१ गृहस्थाश्रम में भोजन करने का नियम ... ५३ मधुपर्क का समय ... ५३ मधुपर्क के अधिकारी ... ५४
( ४ )
अतिथि का सत्कार का नियम ... ५५
कुशल पूछने का ढंग ... ५६
षष्ठ अध्याय
माता-पिता की पूजा ... ५७
अभिवादन का ढंग ... ५८
यात्रा से लौटने पर अभिवादन का नियम ... ५९
विभिन्न व्यक्तियों के प्रति अभिवादन का नियम ... ६०
वेद के ज्ञाता की श्रेष्ठता ... ६२
सप्तम अध्याय
विद्याग्रहण करने में आपत्कालीन नियम ... ६४
गुरुसेवा ... ६४
गुरु ब्राह्मण ही हो सकता है ... ६४
वर्णानुसार कर्म के नियम में छूट ... ६५
ब्राह्मण द्वारा अविक्रेय वस्तुयें ... ६५
ब्राह्मण द्वारा वस्तुओं के विनिमय का निषेध ... ६७
आपत्काल में शूद्रवृत्ति ... ६८
अष्टम अध्याय
समाज में राजा और ब्राह्मण का स्थान ... ७०
बहुश्रुत व्यक्ति ... ७१
बहुश्रुत ब्राह्मण के विशेषाधिकार ... ७२
संस्कारों की गणना ... ७३
आठ आत्मगुण ... ७५
नवम अध्याय
व्रतों के पालन का आदेश ... ७७
पवित्रता का नियम ... ७८
वस्त्र-धारण के विषय में नियम ... ७८
जल पीने और आचमन करने के विषय में नियम ... ७९
बैठने और संभाषण में पवित्रता का विचार ... ८०
( ५ )
अशुभ शब्दों के प्रयोग का निषेध ... ८१ संभोगोपरान्त शुद्धि ... ८२ संभोग के लिये वर्जित स्त्री ... ८२ निषिद्ध आचार ... ८३ आत्मरक्षा का आदेश ... ८४ मूत्र और मल त्याग के शौचाचार ... ८५ धर्म, अर्थ और काम के सेवन का काल ... ८६ शारीरिक चपलता का त्याग ... ८७ भोजन के विषय में आचार ... ८८ सोने का नियम ... ८९ स्नान का नियम ... ८९ योगक्षेम का प्रयत्न ... ८९ प्रदक्षिण के योग्य वस्तु तथा स्थान ... ९० वचन और स्वभाव की सत्यता ... ९० वेदाध्ययन और सद्गुण ... ९१
द्वितीय प्रश्न
प्रथम अध्याय
आश्रम धर्म, ब्राह्मण के कर्म ... ९३ राजा या क्षत्रिय का कर्म ... ९५ युद्ध में जीती गयी सम्पत्ति का स्वामित्व ... ९७ राजा को दिया जाने वाला कर ... ९८ राजा की वृत्ति की व्यवस्था ... ९९ राजा के लिये कार्य करने वाले श्रमिक ... ९९ खोई हुई वस्तु के मिलने पर स्वामित्व ... १०० चोरी गये हुये धन के राजा द्वारा दिये जाने का नियम ... १०३ नाबालिग की राजा द्वारा रक्षा ... १०३ वैश्य का अधिक धन ... १०३ शूद्र, चतुर्थ वर्ण ... १०४ शूद्र के लिये भी सदाचार का विधान ... १०४ शूद्र के लिये आचमन और श्राद्धकर्म ... १०४ शूद्र के लिये उच्च वर्णों की सेवा का नियम ... १०५
( ६ )
शूद्र की वृत्ति ... १०६
शूद्र के लिये यजन की व्यवस्था पर विचार ... १०७
द्वितीय अध्याय
राजा का स्वामित्व ... १०८
राजा के गुण ... १०८
ब्राह्मण द्वारा राजा का आदर ... १०९
वर्णों एवं आश्रमों की राजा द्वारा रक्षा ... ११०
पुरोहित की योग्यतायें ... ११०
राजा के लिये ब्राह्मण का महत्त्व ... १११
ज्योतिषी का महत्त्व ... १११
अभिचार कर्म ... ११२
गृह्य और श्रौत कर्म ... ११३
राजा के व्यवहार के साधन ... ११३
धर्म का निर्णय करने की प्रक्रिया ... ११४
दण्ड का विधान ... ११५
तृतीय अध्याय
शूद्र के लिये वाणी आदि के अपराध में अंग कटवाने का दण्ड ... ११७
शूद्र के लिये वध का दण्ड ... ११८
क्षत्रिय को कठोर वचन के लिये दण्ड ... ११८
वैश्य को उसी अपराध के लिये दण्ड ... ११९
उसी अपराध के लिये ब्राह्मण को दण्ड ... १५९
शूद्र के लिये धन चुराने पर दण्ड ... १२०
वैश्य, क्षत्रिय और ब्राह्मण के लिये चोरी का दण्ड ... १२०
पशु द्वारा खेत का नुकसान होने पर दण्ड ... १२१
धर्मानुसार ब्याज का नियम ... १२३
बन्धक रखी गयी वस्तु के विषय में नियम ... १२४
ब्याज की वृद्धि के प्रकार ... १२५
बन्धक रखी गयी वस्तु का उपभोग ... १२६
उत्तराधिकारी द्वारा ऋण का भुगतान ... १२७
( ७ )
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| उत्तराधिकारी द्वारा न दिये जाने वाले ऋण | १२८ |
| धरोहर के नष्ट होने पर अपराधी न होना | १२८ |
| चोर द्वारा अपने अपराध की घोषणा | १२९ |
| इस प्रकार के चोर के लिये राजा द्वारा दण्ड | १२९ |
| ब्राह्मण के लिये शारीरिक दण्ड का निषेध | १२९ |
| ब्राह्मण के लिये विशेष प्रकार के दण्ड | १२९ |
| चोर को सहायता देने वाले का अपराध | १३० |
| पुरुष की शक्ति और अपराध के अनुरूप दण्ड | १३१ |
चतुर्थ अध्याय
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| जटिल विवाद में साक्षियों की सहायता से निर्णय | १३२ |
| साक्षी के गुण | १३२ |
| साक्षी के लिये दोष या दण्ड का विचार | १३४ |
| धर्म की हानि का परिणाम | १३५ |
| साक्षी को असत्य भाषण से लगने वाला पाप | १३५ |
| असत्यभाषण से प्राणरक्षा होने पर दोष का अभाव | १३८ |
| न्यायकर्ता | १३८ |
| विवाद के निर्णय की अवधिसीमा | १३९ |
पंचम अध्याय
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| मृत्युविषयक आशौच | १४१ |
| क्षत्रिय के लिये आशौच की अवधि | १४२ |
| वैश्य के लिये आशौच की अवधि | १४२ |
| शूद्र के लिये आशौच की अवधि | १४२ |
| दो आशौच लगने पर शुद्धि की अवधि | १४३ |
| अल्पकालीन आशौच | १४४ |
| जन्म का आशौच | १४६ |
| गर्भपात का आशौच | १४७ |
| मृत्युविषयक आशौच की कुछ अन्य दशायें | १४८ |
| पक्षिणी आशौच | १४९ |
| विभिन्न आशौच | १४९ |
| ब्रह्महत्याके दोषी आदि के छूने पर शुद्धि का नियम | १५१ |
( ८ )
शवयात्रा में जाने पर शुद्धि का नियम ... १५२
कुत्ते को छूने पर शुद्धि का नियम ... १५३
उदकदान ... १५४
राजा सदैव पवित्र होता है ... १५६
षष्ठ अध्याय
श्राद्ध का विवेचन ... १५७
श्राद्ध की तिथि ... १५८
ब्राह्मणभोजन का नियम ... १५९
निमंत्रित ब्राह्मण की योग्यता ... १६०
श्राद्ध करने का अधिकारी ... १६०
किन ब्राह्मणों को भोजन न करावे ... १६२
श्राद्ध के दिन-रात में संभोग का निषेध ... १६४
दूषित भोजन ... १६५
भोजन कराने योग्य स्थान ... १६५
पंक्ति को पवित्र करने वाले ब्राह्मण ... १६६
सप्तम अध्याय
वेदाध्ययन आरम्भ करने की वार्षिक तिथि ... १६८
अध्ययन का सत्र ... १६८
अध्ययनकाल में किये जाने वाले आचार ... १६९
अनध्याय के अवसर ... १७०
वेदाध्ययन के लिये अनुपयुक्त स्थान ... १७१
अनध्याय की अवधि ... १७२
नगर में वेदाध्ययन का निषेध ... १७७
अष्टम अध्याय
ब्राह्मण द्वारा द्विजाति के घर में ही भोजन का नियम १७९.
दान के विषय में नियम और अपवाद ... १७९
अन्न ग्रहण करने और भोजन के नियम के अपवाद १८१
अभोज्य अन्न ... १८१
अपेय दुग्ध ... १८४
अभक्ष्य पशु और पक्षी ... १८६