गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Gautama Dharmasutra Hindi
महर्षि गौतम द्वारा
स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)
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गौतमधर्मसूत्र में नारी
“अस्वतन्त्रा धर्मे स्त्री”। २.९.१ अर्थात् पति का अनुसरण करना ही स्त्री का धर्म है, वह धर्म में स्वतन्त्र नहीं होतीं। धर्मसूत्र में नारी के धर्म का मूलमन्त्र यह सूत्र ही है। स्त्री पति पर आश्रित रहे और उसका अनुसरण करे इस कथन में धर्मसूत्र कोई नवीनता नहीं प्रस्तुत करते। बार-बार और विशेष बल उसके पुरुषसम्बन्ध-विषयक आचरण पर दिया गया है। गृह्यकर्म में और धार्मिक क्रियाओं में गृहिणी की हैसियत से, सहधर्मिणी की हैसियत से, वह गौरवपूर्ण पद पर प्रतिष्ठित है, किन्तु उसके इस रूप के विषय में कोई उल्लेखनीय विशेषता नहीं है। जहाँ तक पारिवारिक या सामाजिक जीवन में नारी के स्थान का प्रश्न है उसके जीवन का लक्ष्य है पुत्र या सन्तान की उत्पत्ति। पुत्र और सुयोग्य पुत्र की कामना और उसकी अनिवार्यता धर्मशास्त्र की दृष्टि में केवल लौकिक या व्यावहारिक दृष्टि से ही नहीं व्यक्त की गयी है अपितु एक पारमार्थिक या पारलौकिक दृष्टि से भी पुत्रप्राप्ति गृहस्थाश्रम का लक्ष्य बतायी गयी है, क्योंकि सुयोग्यपुत्र वंश की कई पढ़ियों के पाप धो डालता है और अपने पूर्वजों को भी स्वर्ग की प्राप्ति कराता है। “पुनन्ति साधवः पुत्राः” आदि गौ० ध० सू० १. ४. २४-२७ । यह धर्मसूत्र की अपनी कथनशैली है। वस्तुतः इसे यही कहना है कि कुल की पवित्रता और मर्यादा सर्वोपरि है।
धर्मसूत्र की दृष्टि में स्त्री का महत्त्व इसलिए है कि वह मां है, सन्तान की जननी है और तभी तो धर्मसूत्र इस का स्पष्ट संकेत करता है कि सभी श्रेष्ठ जनों में माता सबसे बढ़कर है। “आचार्यश्रेष्ठो गुरूणां मातेत्येके” १. २. ५६ ।
पवित्र सन्तान के लिए स्त्री की पवित्रता अनिवार्य है और इस पवित्रता का संबन्ध कुल की शुद्धता, वैवाहिक संबन्ध की धर्मसम्मतता, और आचरण की श्रेष्ठता से है। सन्तान के जीवन विकास में माता का प्रभाव और योगदान सबसे अधिक होता है और इसी कारण धर्मसूत्र नारी की पवित्रता पर बहुतः गौरव देते हैं। गृहस्थ के लिए, धर्म की रक्षा के लिए तथा जीवन एवं समाज के सन्तुलन के लिए विवाह एक अनिवार्य और श्रेष्ठ व्यवस्था है, अतः धर्मसूत्र विवाह के प्रकार, योग्यता, और वैधता पर विस्तार से विचार करता है। गौतमधर्मसूत्र में भी पत्नी की योग्यता, उसके भिन्न प्रवर के होने, मातृ एवं पितृपक्ष से रक्तसंबंध से दूर होने का विचार करके विवाह के भिन्न भेदों पर दृष्टिपात किया गया है और ब्राह्म, प्राजापत्य, आर्ष और दैव विवाहों को धर्मसंमत्त ठहराया गया है। 'चत्वारो धर्म्याः प्रथमाः । १. ४. १२ ।' अर्थात् वेद के विद्वान्, उत्तम आचरण वाले और एकपत्नीव्रत का पालन करने वाले, अभिभावक द्वारा चुने गये या ऋत्विज वर के साथ कन्या का विवाह श्रेष्ठ है। किन्तु अन्य प्रकार के भी विवाह प्रचलित थे और उनमें या तो युवक और युवती के पारस्परिक प्रेम संबन्ध को या वर एवं कन्या पक्षों के बीच धन का आदान-प्रदान को अथवा पुरुष द्वारा कन्या प्राप्ति के लिए बलप्रयोग को निमित्त बताया गया है। धर्मसूत्र विवाह में इस प्रकार की