भारतकोश
गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Gautama Dharmasutra Hindi

महर्षि गौतम द्वारा

स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished360 पृष्ठ

पृष्ठ 45, कुल 360 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 45

( ४० )

“ब्रह्मप्रसूतं हि क्षत्रमृध्यते न व्यथत इति च विज्ञायते ।” २. २. १४। राजा सबका रक्षक होता है और सबकी रक्षा के लिए वह युद्ध करता है। ब्राह्मण यदि धर्म का विधान करने वाला है तो राजा उसका पालन कराने वाला है। इन दोनों के समन्वय से ही लोक की रक्षा होती है और सभी अपने उचित मार्ग पर चलते हैं। यदि राजा अपने कर्म में अयोग्य है और धर्म का पालन नहीं करता तो वह पाप का भागी होता है। दण्ड न देने पर राजा ही पापी होता है। इसी प्रकार यदि व्यवहार में राजा अन्याय करता है तो धर्म की हानि होने से सभी को पाप लगता है—साक्षियों को, न्यायकर्ता को, सभासदों को और राजा को भी। साक्षिसभ्यराजकर्तृषु दोषो धर्मतन्त्रपीडायाम् । २. ४. ११। राजा को समाज में बहुत सम्मान प्राप्त है और वह मधुपर्क द्वारा पूज्य होता है। ब्राह्मण भी उसे उचित सम्मान प्रदान करता है।

धर्मशास्त्रों की लोकव्यवस्था जनतांत्रिक प्रतीत होती है। राजा निरंकुश नहीं है, अपितु वह धर्म के लिए ब्राह्मण पर या योग्य विधिवेत्ताओं पर निर्भर है। न्याय व्यवहार की व्यवस्था और प्रक्रिया तो बहुत ही जनतांत्रिक है और दण्ड देने के पूर्व अपराध के प्रत्येक पहलू पर विचार किया जाता है। न्याय हो, अन्याय न हो यही दण्डव्यवहार का मुख्य लक्ष्य बारबार दुहराया गया लगता है। साक्षी के सत्य भाषण पर बहुत महत्व दिया गया है और उसके असत्यभाषण का पाप और बहुत अधिक बताया गया है। इसी प्रकार परिषद् के निर्णय मान्य ठहराये गये हैं जो एक की प्रकार पंचायत थी। अपने-अपने कर्म में उस कार्य के करने वाले सदाचारी व्यक्तियों के निर्णय को मान्य ठहराया गया है :

“कर्षकवणिक्पशुपालकुसीदिकारवः स्वे स्वे वर्गे ।” २. २. २१। इसी प्रकार राजा को परामर्श दिया गया है कि पेचीदे मामलों में वह अनुभवी और जानकार लोगों की राय लेकर निर्णय करे : “विप्रतिपत्तौ त्रैविद्यवृद्धेभ्यः प्रत्यवहृत्य निष्ठां गमयेत्” २. २. २५।

इस प्रकार कुल मिलाकर धर्मसूत्र की लोकव्यवस्था बहुत ही समन्वयपूर्ण है। समाज के विभिन्न वर्गों में जिस सहयोग का विधान किया गया है वह एक उत्तम उद्देश्य की सिद्धि में सहायक है। ब्राह्मण के अतिरिक्त अन्य वर्ण के लोग क्षत्रिय और वैश्य अपने-अपने कर्म में लगकर धर्म, अर्थ, काम की साधना करें यही सबके लिए धर्मशास्त्र को अभीष्ट है। सभी अपने कर्म में रत हों और सभी अपने योग्य कार्य करें। समाज में सामंजस्य हो और सब मिलकर एक पूर्ण समाज का निर्माण, विकास करें और यही धर्म के अन्तर्गत की गयी वर्णव्यवस्था का मूल उद्देश्य है। परस्पर सहिष्णुता, समन्वय और सहयोग की तथा मानवता की भावनायें ही समाज का उद्धार कर सकती हैं। भारतीय धर्म के इन कल्याणकारी सन्देशों को ग्रहण करके बुराइयों को दूर करके उन्हें भूल जाना ही धर्म का वर्त्तमान लक्ष्य होना चाहिए।

गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित) · पृष्ठ 45, कुल 360 में से · BharatKosha