गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Gautama Dharmasutra Hindi
महर्षि गौतम द्वारा
स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ३९ )
आदि से मुक्त होता है, क्यों कि वह जो भी पुण्यकर्म करता है उसका लाभ राजा को भी मिलता है।
वास्तविक ब्राह्मण की योग्यता पर श्राद्धकालीन भोजन के प्रसंग में भी विचार किया गया है। उन योग्यताओं और अयोग्यताओं की विस्तृत सूची देखने से यह स्पष्ट हो जायगा कि ब्राह्मण वही है जो उत्तम आचरण करता है। आचरण से च्युत होने पर वह ब्राह्मण भोजन का अधिकारी भी नहीं है। सम्मानपूर्ण जीवन व्यतीत करने वाला और सदाचार का पालन करने वाला ही ब्राह्मण समझा जाना चहिए। यदि हम धर्मशास्त्रों की या भारतीय संस्कृति की ब्राह्मण की इस परिभाषा और अर्हता पर विचार करें तो ब्राह्मण से, विद्वान् और सदाचारी, संयमी और गुणवान् से कोई शिकायत नहीं होनी चाहिए। श्रोत्रिय ब्राह्मण को तो सबसे उच्च स्थान दिया गया है जो स्पष्टतः उसकी योग्यता और सामाजिक जीवन में महत्ता के कारण है।
किन्तु मौलिक रूप से ब्राह्मण को जिन कारणों से सर्वोच्च स्थान और अनेक विशेषाधिकार दिये गये थे, वे कालान्तर में वर्णव्यवस्था के रूढ़ और कठोर होने के साथ ही कम विचारणीय होते गये और ब्राह्मण केवल ब्राह्मण कुल में जन्म के आधार पर सम्मान और विशेषाधिकार के लोभी हो गये जिससे समाज में अन्याय और विषमता को स्थान मिला। बड़े से बड़े अपराध के लिए केवल देशनिष्कासन और प्रायश्चित ही उसके लिए दण्ड था, जब कि उसके विद्वान् होने के कारण अधिक दण्ड मिलना ही उचित ठहराया गया है। महापातक कर्मों के लिए केवल शरीर पर चिह्न लगाकर उसे बहिष्कृत किया जाता था। समान ही अपराध के लिए उससे निम्न वर्ण वालों को उससे अधिक दण्ड मिलता था। उसके वध का पाप सबसे बड़ा पाप था। उसे मिला हुआ धन उसकी सन्तान का हो जाता था। उसके बिना उत्तराधिकारी के मरने पर उसका धन श्रोत्रिय ब्राह्मणों को मिलता था ३, १०, ३९ और उसे कोई अब्राह्मण साक्षी के रूप में नहीं बुला सकता था। इनके अतिरिक्त भी ब्राह्मण को नैतिकता के नियमों की अवहेलना करके भी अनेक विशेषाधिकार केवल ब्राह्मण होने के नाम पर मिलने का संकेत भी धर्मसूत्र में दिखाई पड़ते हैं।
राजा और लोकव्यवस्था—
धर्मसूत्र के अनुसार राजा का कार्य है न्यायपूर्वक दण्ड देना ३. १. ८ और दण्ड देकर पथ से विचलित लोगों को पुनः पथ पर लाना। वह विपरीत आचरण वाले को संभालता है। और गुरु भी धर्म के विपरीत कार्य करे तो वह उसे मार्ग पर चलने का आदेश दे सकता है। किन्तु राजा ब्राह्मण के ऊपर शासन नहीं करता वह उसकी सहायता से शासन करता है और उससे परामर्श लेकर धर्म का विधान जानकर न्याय करता है। राजा ब्राह्मण के अतिरिक्त सबका स्वामी होता है "राजा सर्वस्येष्टे ब्राह्मणवर्जम्।" २. २. १। ब्राह्मण की प्रेरणा से कार्य करने वाला राजा समृद्धिशाली होता है।