भारतकोश
गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Gautama Dharmasutra Hindi

महर्षि गौतम द्वारा

स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished360 पृष्ठ

पृष्ठ 43, कुल 360 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 43

( ३८ )

के लिए भी आचार का विधान है। वह भी आश्रित जनों का भरण-पोषण करे। सत्यभाषण करे और क्रोध न करे पवित्रता के नियम का पालन करे। “तस्यापि सत्यमक्रोधः शौचम्”। २. १. ५२। इसी प्रकार शूद्र श्राद्धकर्म भी करे। “श्राद्धकर्म” २. १. ५४। अपनी ही पत्नियों में अनुरक्त हो और एक पत्नीव्रत का पालन करे। “स्वदारवृत्तिः” २. १. ५६। शूद्र, की स्थिति में दासप्रथा का पूरा संकेत मिलता है। शूद्र परतन्त्र है, उसे स्वामी की हर हालत में सेवा करनी है। उसके छोटे वस्त्र आदि का ही उपयोग करना है। वैश्वदेव आदि पूजाकर्म में देवता का नाम लेकर नमोनमः कहना ही मन्त्र है। उसे अनार्य कहा गया है, जब कि उससे उच्चवर्ण को आर्य नाम से अभिहित किया गया है, इनके कार्यों में किसी प्रकार की उलटफेर नहीं होनी चाहिए। २. १. ६९।

ब्राह्मण के विशेषाधिकार—

राजा और विद्वान् ब्राह्मण ही व्रतों के कर्म को धारण करने वाले हैं। लोककल्याण और अनुचित कर्म का दण्ड देने के लिए सबको इनके अधीन कर दिया गया है। ब्राह्मण का स्थान राजा से भी बढ़कर है और वह सभी द्वारा पूज्य है। अन्य व्यक्तियों के समान उसे दण्ड नहीं मिलते। वही शारीरिक दण्ड से मुक्त है। राजा उसे छः प्रकार के दण्डों से मुक्त रखता है। वह पीटा नहीं जा सकता, वह हथकड़ी-बेड़ी से बाँधा नहीं जा सकता, उसे धन-दण्ड नहीं मिलना चाहिए, ग्राम या देश से निकाला नहीं जाना चाहिए, उसकी भर्त्सना नहीं होनी चाहिए और उसका त्याग नहीं किया जाना चाहिए “अवध्यश्चाबन्ध्यश्चादण्ड्यश्चाबहिष्कार्यश्चापरिवाद्यश्चापरिहार्यश्चेति।” गौतमधर्मसूत्र १. ८. १३। किंतु यह सब छूट या विशेषाधिकार क्यों ? इसे प्राप्त करने के लिए उस ब्राह्मण की योग्यतायें विचारणीय हैं। ये सारी सुविधायें और विशेषाधिकार नियमतः उस ब्राह्मण को मिलनी चाहिए जो अपने कर्म में रत हो और सभी संस्कारों से संस्कृत, हो उत्तम एवं आदर्श आचरण वाला हो, केवल धर्म का ज्ञान ही न रखता हो, उसका आचरण करता हो “तदपेक्षस्तद्वृत्तिः” १. ८. ७। जिस ब्राह्मण को राजा अपने से श्रेष्ठ आसन पर बैठाता है वह वस्तुतः अपने आचरण और विद्या आदि से उसके योग्य होना चाहिए। अपने मन्त्री या पुरोहित के रूप में वह कैसे ब्राह्मण का चयन करता है : “विद्याभिजनवाग्रूपवयः शीलसंपन्नं न्यायकृतं तपस्विनम्। विद्या में निष्णात, धर्म के ज्ञाता, शीलवान्, न्यायप्रिय और तपस्वी। यदि ऐसे ब्राह्मण को विशेषाधिकार मिलते हैं तो किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। समाज की व्यवस्था करने वाले और सबको सही मार्ग पर प्रेरित करने वाले चिन्तक और विचारक को सबसे बढ़कर सम्मान मिलना ही चाहिए, मिलता ही है। ऐसे ब्राह्मण को किसी के अधीन रखना लोककल्याण की दृष्टि से बुरा होगा और वह उसका पूरा उपयोग नहीं हो पायगा, क्यों कि उसे धर्मकार्य करने कराने की सुविधा नहीं होगी। इसी लिए ब्राह्मण, उपर्युक्त प्रकार का ब्राह्मण राजा के अधीन नहीं होता और करों