भारतकोश
गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Gautama Dharmasutra Hindi

महर्षि गौतम द्वारा

स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished360 पृष्ठ

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स्वच्छन्दता की अनुमति नहीं देते। हां, कुछ धर्मशास्त्रों में प्रेम या धनदान के निमित्त द्वारा कन्या प्राप्त करके किये गये विवाह को उचित ठहराया गया है इसका संकेत गौतमधर्मसूत्र में किया गया है १. ४. १३।

विवाह की अनिवार्यता पर धर्मसूत्रकार ने इतना बल दिया है कि वह अपनी सभी वर्णविषयक कठोरता को भी भूल जाता है, वह व्यवहार और सिद्धान्त के बीच उलझा सा दिखाई पड़ता है और विवाह के लिए काफी स्वतन्त्रता दे देता है। सवर्णविवाह को श्रेष्ठ बताने के साथ ही वह अनुलोम विवाहों अर्थात् वर से निम्न वर्ण की कन्या के विवाहों को धर्मसंमत करता है, जिससे स्पष्ट है कि वैवाहिक संबन्ध में वर्ण अभी उतना अवरोध नहीं बना था। ब्राह्मण का शूद्र वर्ण की कन्या को पत्नी के रूप में ग्रहण करना धर्मसूत्र को स्वीकार है। १. ४. १४। प्रतिलोम विवाह भी समाज में चलते दिखाई पड़ते हैं, धर्मसूत्र को केवल इस प्रकार के विवाहों से उत्पन्न पुत्रों के ही प्रति सहानुभूति नहीं है। वह उन्हें कोई धार्मिक स्थान समाज में नहीं देता, किन्तु इस बात का मार्ग खुला रखता है कि धर्माचरण से वे अपनी उन्नति करें, उनके वर्ण का उत्कर्ष भी हो सकता है। गौतमधर्मसूत्र प्रतिलोम विवाह पर आघात करने के विचार से ही इस प्रकार से उत्पन्न पुत्र के विषय में कहता है : “प्रतिलोमास्तु धर्महीनाः” और यह भी कहता है कि शूद्रा स्त्री से उत्पन्न पुत्र धर्महीन होता है और शूद्र से उत्पन्न पुत्र पतित होते हैं। उनका दर्शन, स्पर्श और प्रतिग्रह वर्जित है। १.४.२२-२३। किन्तु सम्पत्ति में ऐसे पुत्र को भी अंश मिलता था ३. १० ३७। तथा ब्राह्मण के चारों वर्णों की पत्नियों से उत्पन्न पुत्रों में वर्णानुसार सम्पत्ति का विभाजन होता था। ये बातें इस तथ्य की ओर स्पष्ट संकेत करती हैं कि विवाह के लिए वर्ण के अवरोध की कठोरता में भी नरमी आ सकती थी।

इस विवाह की अनिवार्यता के कारण ही हमारा धर्मसूत्र विवाह योग्य लड़की को यह सुझाव देता है कि यदि उसके माता-पिता उसका विवाह यथासमय नहीं कर देते तो वह स्वयं पिता से प्राप्त अलंकारों का परित्याग करके अपने अनुकूल युवक से विवाह कर ले।

“त्रीन्कुमार्यतूनतीत्य स्वयं युज्येतानिन्दितेनोत्सृज्य पित्र्यानलंकारान्” २. ९. २० विवाह कर्म के लिए समाज के निम्नतम वर्ण से भी, शूद्र वर्ण से व्यक्ति के भी और अपने वर्ण के अनुरूप कार्य न करने वाले से भी धन लिया जा सकता है : “द्रव्यादानं विवाहसिद्धयर्थं धर्मतन्त्रसंयोगे च शूद्रात्” २. ९. २४।

गौतमधर्मसूत्र की दृष्टि में स्त्री के लिए विवाह इतना अनिवार्य है कि सूत्रकार का तो यह मत है कि लड़की जब लज्जा का अनुभव करके वस्त्र पहनने की ओर ध्यान देने लगे तभी उसका विवाह कर देना चाहिए।

विवाह के प्रमुख लक्ष्य सन्तानप्राप्ति के लिए जिस स्त्री को धर्मसूत्र यह आदेश देता है कि वह अपने पति के अतिरिक्त किसी दूसरे के विषय में सोचे भी नहीं। “नातिचरेद्भर्त्तारम्” गौ० धर्म० सू० २. ९. २। और वाणी, नेत्र और कर्म का संयम