गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Gautama Dharmasutra Hindi
महर्षि गौतम द्वारा
स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)
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रखे, उसे पति की मृत्यु पर, उसके सन्तानोत्पत्ति के लिए अयोग्य होने पर दूसरे पुरुष से यौवनसंबन्ध से पुत्र उत्पन्न करने का विधान करता है। अपतिरपत्य-लिप्सुर्देवरात्। २. ९. ४। सन्तानोत्पत्ति एक पुण्य कर्म है, धर्म है और धर्मसूत्र की दृष्टि में नैतिकता की भावना इस धर्म के अधीन है। धर्मसूत्र की दृष्टि में स्त्री और पुरुष के संबन्धों का मुख्य प्रेरक धर्म होना चाहिए काम नहीं। इस धर्म की छाया में नारी को धर्मसूत्र ने यथोचित गौरव दिया है, परिवार और समाज में महत्त्वपूर्ण स्थान दिया है। आचार्य की पत्नी आचार्य के समान पूज्य है और उसका नाम न लेने का आदेश दिया गया है :
“आचार्यतत्पुत्रदीक्षितनामानि” १. २. २५। एवं उसका चरणस्पर्श शिष्य के लिए विहित है। विप्रोष्योपसंग्रहणं गुरुभार्याणाम्” १. २. ३९।
किन्तु हमारे धर्मसूत्र में नारी का एक और भी रूप आता है, जब वह किसी भी प्रकार के सम्मान की अधिकारिणी न होकर केवल मनुष्य की एक सम्पत्ति बना दी गयी है। विवाह के पवित्र बन्धन के अलावा उसका एक और भी रूप है, जिस रूप में वह सामान्य मानवोचित न्याय भी पाने की अधिकारिणी नहीं रह गयी है। उदाहरण के लिए सेवावृत्ति करने वाली निम्नवर्ण की दासी एक चल सम्पत्ति दिखाई देती है, उसे खरीदा और बेचा जा सकता है, बन्धक रखा जा सकता है और उत्तराधिकार में प्राप्त किया जा सकता है। इन बातों का संकेत गौतमधर्मसूत्र १. ७. १४ 'पुरुषवशाकुमारीवेहतश्च नित्यम्' तथा १. ७. १६ 'नियमस्तु' में मिलता है। दासी के विषय में विवाद का प्रश्न शीघ्र हल होना चाहिए २. ४. २९ इससे ऐसा पता चलता है कि दासी को लेकर उस समय झगड़े खड़े हो जाते थे और उसका न्यायालय द्वारा निर्णय होता था। बन्धक रखी हुई दासी के विषय में तो बड़ी रोचक बात यह है कि वह जिसके पास बन्धक रखी गयी हो उसके द्वारा भोगी जा सकती है—'पशुभूमिस्त्रीणामनतिभोगः' पृ० २. ३. ३६। इस सूत्र की टीका में हरदत्त ने इसका औचित्य यह कह कर ठहराया है कि अपने घर में रखी हुई काम आने योग्य वस्तु रोज-रोज दिखाई पड़े तो कोई कब तक परहेज और संयम करेगा :
“कथमभन्तरगृहे दृश्यमानां गां स्वयं तक्रादि क्षीवोपयुञ्जान उपेक्षेत,
कथं वा बहुफलमारामं, कथं वा दासीं यौवनस्थामन्वहं परिचारिकाम् ।”
दूसरा उदाहरण है वेश्या और व्यभिचारिणी स्त्री का, जिनका उल्लेख भी धर्मसूत्र में मिलता है। धर्मसूत्रकार की दृष्टि में ऐसी स्त्री के जीवन का कोई मूल्य नहीं। उसका वध कर देने पर भी कोई प्रायश्चित्त करने की जरूरत नहीं पड़ती, अधिक से अधिक एक नीलवृष का दान दे दिया और उसके वध के पाप से छुट्टी मिल गयी। ब्रह्मबन्ध्वां चलनायां नीलः। वैशिके न किंचित्। ३. ४. २६, २७।
धर्मसूत्र की दृष्टि में नारी को जो कुछ संमान प्राप्त है उसके दो आधार हैं—वर्ण और आचरण। निम्नवर्ण की स्त्री के साथ संबन्ध की मनमानी बरती जा सकती है किन्तु उच्चवर्ण की स्त्री के साथ संबन्ध रखने पर उसके भीषण और