गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Gautama Dharmasutra Hindi
महर्षि गौतम द्वारा
स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)
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रोमांचकारी परिणाम बताये गये हैं। और कठोर प्रायश्चित्त का विधान किया गया है। जिस बात पर धर्मसूत्र बार-बार जोर देता है वह है स्त्री का आचरण और आचरणहीन स्त्री की प्रत्येक अवसर पर निन्दा की गयी है। ऐसी स्त्री का अन्न अभक्ष्य होता है २. ८. १७ पृ० १८३। पति के अतिरिक्त अन्य पुरुष से संबन्ध रखने वाली स्त्री को एक वर्ष तक कठोर व्रत का जीवन बिताने का नियम है, जिस समय में उसे निन्दित और बहिष्कृत सी होकर अपने पाप का प्रायश्चित करना होता है। जानबूझकर गर्भपात करना भी एक ऐसा कर्म है जो स्त्री को पतित बना देता है और ऐसी स्त्री की दृष्टि यदि भोजन पर पड़े तो भोजन खाने योग्य नहीं रह जाता २. ८. ११। और भ्रूणहत्या करने वाली एवं अपने वर्ण से निम्नवर्ण के पुरुष के साथ संबन्ध वाली स्त्री घोर पातकी होती है : “भ्रूणहनि हीनवर्णसेवायां च स्त्री पतति” ३. ३. ९।
किन्तु धर्मसूत्रकरों की अभंगपूर्ण कठोर दृष्टि के बावजूद भी समाज में स्त्री पुरुष संबन्ध की स्वच्छन्दता चलती रहती है, इसे भी स्वीकारा गया है और नाजायज संबन्ध से उत्पन्न पुत्रों का उल्लेख अनेक स्थलों पर किया गया है। सम्पत्ति के उत्तराधिकार के सन्दर्भ में गूढोत्पन्न पुत्र, जो स्पष्टतः चोरी-छिपे अनुचित संबन्ध से उत्पन्न होता था तथा अविवाहिता स्त्री के पुत्र कानीन को भी सम्पत्ति में अधिकारी बताया गया है। इसी प्रकार विवाह व्यवस्था की कठोरता और पवित्रता के नियमों के बावजूद भी विवाह में स्वच्छन्दता थी, एक पति का परित्याग कर स्त्री दूसरा विवाह कर सकती थी ३. १० ३१। पृ० २८५। पर दो बार और गर्भवती के भी दूसरे पुरुष से विवाह करने का उल्लेख है। कुल मिलाकर यह स्पष्टतः प्रतीत होता है कि धर्मसूत्र एक पुरुष का एक स्त्री के साथ ही और एक स्त्री का एक ही पुरुष के साथ संबन्ध को सीमित करने पर महत्त्व देता है, हलां कि समाज में उसके मान्य विचारों के विपरीत स्थिति भी व्याप्त है।
नारी पर सर्वाधिक दृष्टिपात यौनविषयक नैतिकता के सन्दर्भ में किया गया है। स्त्री-पुरुष के यौनसम्बन्धों के विषय में नैतिक-अनैतिक का विचार तो इतना किया गया है कि कहीं-कहीं धर्म का एक यही नारा सुनाई पड़ता है “स्त्री से बचो”। धर्मसूत्रकार की मनोवैज्ञानिक दृष्टि कभी-कभी तो फ्रायड जैसी लगती है और वह पुरुष के असामान्य यौनाचारों पर भी नियम बनाने की आवश्यकता अनुभव करता है। ३. ४. ३६ पृ० २३४। यह ठीक है कि धर्माचरण के लिए कामभावना को संयमित करना आवश्यक है, परन्तु प्रत्येक अवसर पर कामुकता का भय उस प्रवृत्ति की ओर संकेत करता है जिससे समाज में दूसरी ओर धर्म की अपेक्षा काम को ही प्रश्रय मिलता है और कामसूत्र जैसे ग्रंथों की रचना की पृष्ठभूमि बनती है। धर्मसूत्र ब्रह्मचर्य को बड़ा तप मानता है पृ० २०४। और ब्रह्मचर्यं धर्माचरण का आवश्यक अंग है। विद्यार्थी जीवन में इस व्रत का बड़ी कठोरता से पालन करने का आदेश बार-बार दिया गया है। हमारे धर्मसूत्र में कहा गया है कि ब्रह्मचारी को किसी स्त्री पर दृष्टिपात नहीं करना चाहिए, इससे कामभाव ना के उत्तेजन की आशंका रहती है—