गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Gautama Dharmasutra Hindi
महर्षि गौतम द्वारा
स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)
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“स्त्रीप्रेक्षणोलम्भने मैथुनशंकायाम्” १. २. २२ यहां तक कि यदि गुरुपत्नी भी युवती हो तो उसका चरण नहीं छूना चाहिए “नैके युवतीनां व्यवहारप्राप्तेन” १. २. ४० । ब्रह्मचर्य में स्त्रीसम्बन्ध के त्याग पर इतना बल दिया गया है कि ब्रह्मचर्य मैथुनत्याग का पर्यायवाची हो जाता है और उसके अन्य आचरण गौण हो जाते हैं। सामान्यतः कुमारी लड़की पर दृष्टिपात करना निषिद्ध बताया गया है और उनके आलिंगन का स्पष्ट निषेध किया गया है।
स्त्री के साथ अनुचित संबन्ध के लिए प्रायश्चित्त एवं दण्ड का विधान भी उस स्त्री के उच्च वर्ण के होने के आधार पर किया गया है। शूद्र की स्त्री के साथ कोई अनुचित यौनसंबन्ध रखे तो वह कोई बड़ा पाप नहीं है, किन्तु साथ ही साथ सामान्य रूप में परस्त्रीगमन के लिए दो वर्ष के प्रायश्चित्त का विधान है तथा श्रोत्रिय ब्राह्मण की पत्नी के साथ व्यभिचार के लिए तीन वर्ष का ब्रह्मचर्य बताया गया है। ३. २. २९, ३० । समाज में सबसे ऊंचा स्थान गुरु का है और गुरुपत्नीगमन सबसे बड़ा पातक है। उसके लिए घोर प्रायश्चित्त करने का नियम बताया गया है। और ऐसे पातकी के पाप तभी दूर होते हैं जब वह लोहे की अग्नि में तपने से लाल बनी हुई स्त्रीप्रतिमा का आलिंगन करके या अपनी जननेन्द्रिय आदि का उच्छेद कर नैऋर्त्य दिशा में चलते-चलते मृत्यु प्राप्त करते हैं। निकटसम्बन्धवाली स्त्री के साथ व्यभिचार के लिए भी इसी प्रकार का प्रायश्चित्त बताया गया है। किन्तु दूसरी ओर कुछ आचार्यों के इस मत का उल्लेख भी किया गया है कि गुरुपत्नी के अतिरिक्त अन्य स्त्रियों के साथ अनुचित संबन्ध होने पर महापातक नहीं होता। न स्त्रीष्वगुरुतल्पं पततीत्येके। वर्ण के अतिरिक्त रक्तसंबन्ध स्त्री के प्रति यौनाचार के पाप का निर्णायक आधार है। ब्रह्मचर्य भंग करने वाले अवकीर्णी के लिए भी कठोर प्रायश्चित्त बताया गया है। इन सब उल्लेखों से यह स्पष्ट होता है कि स्त्री की पवित्रता, धर्मसूत्र के समाज में सर्वोपरि थी, किन्तु साथ ही साथ अनैतिकता स्वाभाविक रूप में थी। नारी मां के रूप में पूज्य भी थी, किन्तु किसी वस्तु के समान केवल भोग की सामग्री भी थी। समाज और परिवार के भीतर उसे कुछ महत्व तो प्राप्त अवश्य था, किन्तु उसके व्यक्तित्व को कोई विकास की स्वतन्त्रता नहीं थी। स्त्रीसम्बन्ध विषयक नैतिकता के विचाराधिक्य ने अवश्य ही नारी की प्रतिष्ठा को धक्का पहुंचाया और कुल मिलाकर उसका वह स्थान नहीं था, जो उसे वेदों और उपनिषदों की परम्परा में प्राप्त था। सूत्र के समय में नारी की इस हीन दशा का मुख्य कारण था उन्हें निन्दित, अपवित्र, मानने की प्रवृत्ति तथा ब्रह्मचर्य की रक्षा में उन्हें शत्रु समझने की धारणा। साथ ही साथ पुत्रप्राप्ति मात्र को मुख्य आध्यात्मिक लक्ष्य मानकर विवाह एवं पति पर आश्रित होने को ही नारी का अन्तिम प्रयोजन ठहराने से धर्मसूत्रकाल की नारी मानवीय अधिकारों से वंचित और पददलित भी दिखाई देती है, परन्तु सारा दोष धर्मसूत्रों का नहीं है। धर्मसूत्र की मौलिक व्यवस्था में अच्छाइयां भी हैं किन्तु उसकी दृष्टि न तो भविष्य पर है और न अतीत पर, एक के विषय में उसकी दृष्टि संकुचित है और दूसरे को वह बहुत-कुछ भूला सा लगता है। यौन विषयक नैतिकता के सन्दर्भ में धर्मसूत्र-