गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Gautama Dharmasutra Hindi
महर्षि गौतम द्वारा
स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)
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कार भी वही कहता हुआ प्रतीत होता है जो शेक्सपियर ने कहा है- "हे नैतिक दुर्बलते, तुम्हारा ही नाम नारी है।" अथवा महाभारत की तरह वह भी यही कहना चाहता है कि नारी दोषों की खान है, उसको कोई स्वतन्त्रता नहीं मिलनी चाहिए :
न स्त्रीभ्यः किंचिदन्यत् पापीयस्तरमस्ति वै ।...
क्षुरधारा विषं सर्पों वह्निरित्येकतः स्त्रियः ॥
धर्मशास्त्रकारों से लेकर आगे के समूचे साहित्य में भी यह प्रवृत्ति हमेशा के लिए आ जाती है कि नारी झूठ बोलने वाली, अविश्वसनीय, अविवेकी, धूर्त्त, मूर्ख, लोभी, अपवित्र और निर्दय होती है, पथभ्रष्ट करने वाली होती है।
नारी के प्रति यह अन्याय की दृष्टि और नैतिकता का आडम्बरभरा आग्रह समाज के एक महत्वपूर्ण, अधिक प्रभावशाली और अधिक मानवीय अंग को चिरकाल के लिए पंगु बना देता है और वह अपनी सही दिशा भूल जाती है। धर्म के साथ काम को समन्वय और असद् के सद् की ओर प्रयाण का भारतीय सन्देश समाज की वर्तमान मोहनिद्रा के लिए सुमतिदायी सविता है, भावी जीवन की आशा है।
—उमेशचन्द्र पाण्डेय