गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Gautama Dharmasutra Hindi
महर्षि गौतम द्वारा
स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)
प्रारंभिक पृष्ठ व विषय-सूची
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॥ श्रीः ॥
काशी संस्कृत ग्रन्थमाला
१७२
॥ श्रीः ॥
गौतमधर्मसूत्राणि
हिन्दीव्याख्याविभूषित-
हरदत्तकृत-मिताक्षरावृत्ति-सहितानि
हिन्दी व्याख्याकार
डॉ० उमेशचन्द्र पाण्डेय
एम० ए०, पी-एच० डी०, साहित्यरत्न,
चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस, वाराणसी-१
१९६६
प्रकाशक : चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस, वाराणसी-१
मुद्रक : विद्याविलास प्रेस, वाराणसी-१
संस्करण : प्रथम, संवत् २०२३
मूल्य : १०-००
© The Chowkhamba Sanskrit Series Office.
P. O. Chowkhamba, Post Box 8,
Varanasi. ( INDIA )
1966
Phone : 3145
THE
KASHI SANSKRIT SERIES
172 ****
THE
GAUTAMA-DHARMA-SŪTRA
With the
‘Mitākṣarā’ Sanskrit Commentary of Haradatta
Edited with
The Hindi Commentary and Introduction
by
Dr. UMESH CHANDRA PANDEY,
M. A., Ph. D., Sāhityaratna,
THE
CHOWKHAMBA SANSKRIT SERIES OFFICE
Post Box 8. Varanasi-1 ( India ) Phone : 3145
First Edition
1966
Price : 10-00
45320
22-2-1967
Sa2VS3/ Gan Pan
दो शब्द
भारतीय साहित्य से परिचित सुधी पाठकों को 'गौतम-धर्म-सूत्र' का परिचय देने की आवश्यकता नहीं। धर्मग्रन्थों में इसका महत्त्वपूर्ण स्थान है। आज के युग में भारतीय धर्म के शाश्वत मूल्यों की स्थापना के बिना समाज को सही दिशा कठिनाई से मिल सकती है। आवश्यकता है अपने अतीत की सभी अच्छाइयों को ग्रहण कर वर्तमान जीवन में पिरोने की, और इसके लिए हमें उस अतीत को सही रूप में पहचानना होगा।
'गौतम-धर्म-सूत्र' का यह संस्करण उस अमूल्य निधि के एक अंश को आधुनिक पाठक के समक्ष प्रस्तुत करने का प्रयास है। केवल सूत्रों में ही हिन्दी व्याख्या दी गयी है और इस बात का प्रयत्न किया गया है कि सूत्र का पूरा अर्थ सरलता से, स्पष्ट हो जाय। भूमिका में सूत्र साहित्य, भारतीय धर्म और इस ग्रन्थ की विषयवस्तु के कुछ पक्षों पर आलोचनात्मक दृष्टि से विचार किया गया है।
मैं इस बात का दावा नहीं करता कि मेरा योगदान बहुत महत्त्वपूर्ण है। बहुधा लेखक कतिपय सीमाओं में बद्ध होता है। इस ग्रन्थ को वर्तमान कलेवर प्रदान करने का श्रेय चौखम्बा संस्कृत सीरीज़ आफिस के सुयोग्य प्रबन्धकों को है, जो संस्कृत एवं संस्कृति की सेवा और प्रतिष्ठापना में चिरकाल से अहर्निश संलग्न हैं। मैंने उन्हीं की प्रेरणा से इस पुस्तक के वर्तमान संस्करण द्वारा भारतीय वाङ्मय की जो तुच्छ सेवा की है उससे मुझे संकोच है, किन्तु सन्तोष भी है।
अपनी ओर से दो शब्द कहते हुए मैं अपने कतिपय प्रियजनों का, जो मेरे जीवन के मधुर प्रेरणा-स्रोत हैं, प्रेम और कृतज्ञता से स्मरण करता हूँ। मेरा श्रम निष्फल नहीं होगा, यही मेरी आशा है।
'विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परा सुव।
यद् भद्रं तन्न आ सुव॥'
विनीत-
उमेशचन्द्र पाण्डेय
२ गौ० भू०
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भूमिका
सूत्र साहित्य
सूत्र साहित्य भारतीय वाङ्मय का एक अनूठा वर्ग है और इसकी विशेषता है इसकी अनोखी शैली। वैदिक साहित्य में सूत्रों का काल अध्ययन और चिन्तन की एक परम्परा का प्रतिनिधि है और भारतीय साहित्य में इसका महत्त्वपूर्ण स्थान है। यह वैदिक साहित्य को परवर्ती संस्कृत साहित्य से जोड़ने वाली श्रृंखला है। जैसा कि माक्स म्यूल्लेर ने कहा है इन सूत्रों की शैली का परिचय उसी व्यक्ति को मिल सकता है जिसने इन्हें समझने का प्रयत्न किया है और इनका शाब्दिक अनुवाद तो संभव हो ही नहीं सकता। सूत्र का अर्थ है धागा और सूत्रों में छोटे, चुस्त, अर्थगर्भित वाक्यों को मानों एक धागे में पिरोकर रखा जाता है। संक्षिप्तता इनकी विशेषता है। पश्चिमी विद्वानों ने इन सूत्रों की शैली पर बहुत आलोचनात्मक ढंग से विचार किया है। प्रो० माक्स म्यूल्लेर ने प्राचीन संस्कृत साहित्य के इतिहास नामक ग्रंथ में सूत्र साहित्य के सन्दर्भ में कहा है :—
“Every doctrine thus propounded, whether Grammar, metre, law, or philosophy, is reduced to a mere skeleton. All the important points and joints of a system are laid open with the greatest precision and clearness, but there is nothing in these works like connection or development of ideas.” ( Page 37 )
कोलेब्रूक ने भी इसी प्रकार का विचार व्यक्त किया है :
“Every apparent simplicity of the design vanishes in the perplexity of the structure. The endless pursuit of exceptions and limitations so disjoins the general precepts, that the reader cannot keep in view their intended connection and mutual relation. He wonders in an intricate maze, and the clue to the labyrinth is continually slipping from his hands.”
सूत्र रचनाओं में अनेक शताब्दियों के ज्ञान का भण्डार एकत्र किया गया है। वे शताब्दियों के चिन्तन, मनन और अध्ययन के परिणाम हैं और उन्हें जो रूप प्राप्त हुआ है वह भी अनेक शताब्दियों की अनवरत परम्परा का परिणाम है। धर्मसूत्रों को श्रुति के अन्तर्गत नहीं माना जाता है, जैसा कि इसके पूर्ववर्ती साहित्य-संहिता और ब्राह्मण को, और इस प्रकार इसे अपौरुषेय न मानकर पौरुषेय माना जाता है। यदि ब्राह्मणों और परवर्ती काल के मन्त्रों के साथ तुलना करें तो हमें सूत्रों में ऐसी कोई बात नहीं मिलती जिसके कारण उन्हें श्रुति में सम्मिलित न किया
( ४ )
जाय। हाँ, इसका एक ठोस कारण हो सकता है उनकी बाद के समय की रचना। इनके मनुष्यों द्वारा लिखित होने का स्पष्ट ज्ञान है, यथा :
यथैव हि कल्पसूत्रग्रंथानितरांगस्मृतिनिबंधनानि चाध्येतृभ्यश्चापयितारः स्मरन्ति तथाश्वलायनबौधायनापस्तंबकात्यायनप्रभृतीन् ग्रंथकारत्वेन।
श्रुति के विपरीत स्मृति में न केवल सूत्र रचनाएं आती हैं अपितु मनु, याज्ञवल्क्य, पाराशर आदि के श्लोक में निबन्ध ग्रंथ भी आते हैं, जिन्हें स्पष्टतः स्मृति कहा जाता है।
स्मृति का आधार भी श्रुति ही है। श्रुति से स्वतन्त्र रूप में स्मृति की प्रामाणिकता नहीं होती। जैसाकि कुमारिल ने कहा है इसके नाम से ही यह तथ्य स्पष्ट है :
पूर्वविज्ञानविषयज्ञानं स्मृतिरिहोच्यते ।
पूर्वज्ञानाद्विना तस्याः प्रामाण्यं नावधार्यते ॥
इस प्रकार सूत्रों के दो विस्तृत वर्ग किये जाते हैं : श्रौतसूत्र और स्मार्तसूत्र। इनमें श्रौतसूत्र तो वे हैं जिनके स्रोत श्रुति में मिलते हैं और स्मार्त वे हैं जिनका कोई इस प्रकार का स्रोत नहीं है। यह स्मरणीय है कि जिन विषयों का विवेचन सूत्रों—श्रौत, गृह्य, और समयाचारिक—में किया गया है, उन्हीं का प्रतिपादन श्लोकबद्ध स्मृतियों में भी किया गया है। जैसा कि आगे बताया जायगा इनका अन्तर विषयवस्तु का नहीं अपितु उनके काल और उनकी शैली का है।
वैदिक-साहित्य में सूत्र-साहित्य को वेदांग के अन्तर्गत कल्प शीर्षक में रखा जाता है। चरणव्यूह के अनुसार—“शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दो ज्योतिषम्” ये वेदांग हैं। आपस्तम्ब ने भी इन्हें इस क्रम में गिनाया है—२, ४, ८ “षडंगो वेदः कल्पो व्याकरणं ज्योतिषं निरुक्तं शिक्षा”। कल्प सबसे पूर्ण वेदांग है, इसके अन्तर्गत सूत्रों का विशाल भण्डार समाहित है। ये सूत्र यज्ञ के नियमों के विषय में हैं। इनके महत्त्व के विषय में माक्स म्यूलेर ने ठीक ही कहा है—कल्पसूत्रों का वैदिक-साहित्य के इतिहास में अनेक कारणों से महत्त्व है। वे न केवल साहित्य के एक नये युग के द्योतक हैं और भारत के साहित्यिक एवं धार्मिक जीवन के एक नये प्रयोजन के सूचक हैं अपितु उन्होंने अनेक ब्राह्मणों के लोप में योग दिया, जिनका केवल नाम ही ज्ञात है। यज्ञ का सम्पादन केवल वेद द्वारा, केवल कल्पसूत्र द्वारा हो सकता था, किन्तु विना सूत्रों की सहायता के ब्राह्मण या वेद के याज्ञिक विधान का ज्ञान प्राप्त करना कठिन ही नहीं असम्भव था। कुमारिल ने कल्पसूत्र के महत्त्व के विषय में कहा है—
वेदादृतेऽपि कुर्वन्ति कल्पैः कर्माणि याज्ञिकाः ।
न तु कल्पैर्विना केचिन्मंत्रब्राह्मणमात्रकात् ॥
कल्पसूत्रों के महत्त्व के कारण ही इनके रचयिता स्वयं नयी शाखाओं के संस्थापक बन गये और उनकी शाखा में उनके सूत्र का ही प्रधान स्थान हो गया तथा ब्राह्मण और वेद का कुछ सीमा तक महत्त्व कम हो गया। सूत्र यद्यपि
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स्मृति थे, श्रुति नहीं तथापि उन्हें स्वाध्याय के अन्तर्गत सम्मिलित किया गया। विभिन्न चरणों एवं शाखाओं में सूत्र साहित्य के विकास के संबन्ध में यह उल्लेखनीय है कि कभी-कभी कल्पसूत्र शाखाओं के अन्तर्गत भिन्न होते हैं और कभी भिन्न नहीं होते। शाखाओं के भेद का एक कारण उनके स्वाध्याय के भेद हैं और कुछ कारण सूत्र की भिन्नता भी है। अतः कई स्थानों पर जहाँ शाखा का भेद है वहाँ सूत्र का भी भेद है। यही बात महादेव ने हिरण्यकेशिसूत्र की टीका में कही है :—
"तत्र कल्पसूत्रं प्रतिशाखं भिन्नमभिन्नमपि क्वचित् शाखाभेदेऽध्ययनभेदाद्वा सूत्रभेदाद्वा। आश्वलायनीयं कात्यायनीयं च सूत्रं हि भिन्नाध्ययनयोर्द्वयोर्द्वयोः शाखयोरेकैकमेव। तैत्तिरीयके च समाम्नाये समानाध्ययने नाना सूत्राणि। अनेन च सूत्रभेदे शाखाभेदः शाखाभेदे च सूत्रभेद इति परस्पराश्रय इति वाच्यम् ॥"
इसी आचार्य ने अर्वाचीन कहे जाने वाले सूत्रों की प्राचीनता के विषय में भी एक नवीन बात कही है कि वे सूत्र भी जिनके रचयिता अर्वाचीन मालूम पड़ते हैं वस्तुतः शाश्वत हैं और प्राचीन ऋषियों से निःसृत हैं।
"न हि सूत्राणां कर्तृसंबंधिसंज्ञाघटनी किन्तु नानाकल्पगतासु तत्तन्नामक-र्षिव्यक्तिषु नित्या तन्प्रणीतसूत्रेषु च नित्यां जातिमवलम्ब्य तिष्ठति यथा पुरुषना-मांकितशाखासु संज्ञा ।"
कल्पसूत्र मुख्यतः चार प्रकार के हैं :— १. श्रौतसूत्र—श्रौत अग्नि से होने वाले बड़े यज्ञों का विवेचन करने वाले सूत्र। २. गृह्यसूत्र—गृह्याग्नि में होने वाले घरेलू यज्ञ का तथा उपनयन, विवाह आदि संस्कारों का विवेचन करने वाले सूत्र। ३. धर्मसूत्र—चारों आश्रमों, चारों वर्णों तथा उनके धार्मिक आचारों का तथा राजा के कर्त्तव्यों का वर्णन करने वाले सूत्र। ४. शुल्वसूत्र—यज्ञ में वेदि आदि के निर्माण की विधि का वर्णन करने वाले सूत्र।
धर्मसूत्र
वैदिक साहित्य के एक महत्वपूर्ण अंग हैं—धर्मसूत्र। सामान्यतः वैदिक साहित्य के अन्य ग्रन्थों के समान धर्मसूत्र भी प्रत्येक शाखा में अलग-अलग होते हैं किन्तु अनेक शाखाओं के विशिष्ट धर्मसूत्र उपलब्ध नहीं हैं। धर्मसूत्र कल्प की परम्परा में आते हैं और कल्प का अर्थ है "वेद में विहित कर्मों का क्रमपूर्वक व्यवस्थित कल्पना करने वाला शास्त्र"। "कल्पो वेदविहितानां कर्मणामानुपूर्व्येण कल्पनाशास्त्रम्"—विष्णुमित्र, ऋग्वेदप्रातिशाख्य की वर्गद्वयवृत्ति, पृ० १२। इस प्रकार धर्मसूत्रों का अटूट संबन्ध यज्ञ-यागादि बड़े कर्मों, विवाह इत्यादि गृह्य कर्मों का प्रतिपादन करने वाले साहित्य के साथ है और इस कल्प साहित्य के
( ६ )
सन्दर्भ में हमें श्रौतसूत्रों, गृह्यसूत्रों और धर्मसूत्रों का पारस्परिक संबन्ध ध्यान में रखना चाहिए। अनेक शाखाओं के विशिष्ट सूत्र साथ-साथ मिलते हैं। आश्वलायन, शांखायन तथा मानव शाखा के श्रौतसूत्र उपलब्ध हैं किन्तु इनके धर्मसूत्र का अभाव है। जिन शाखाओं के सभी कल्पसूत्र उपलब्ध हैं उनमें प्रमुख हैं—बौधायन, आपस्तम्ब और हिरण्यकेशी। सभी शाखाओं के धर्मसूत्र उपलब्ध न होने का मुख्य कारण यह है कि कई शाखाओं ने पृथक् धर्मसूत्र रचने की आवश्यकता नहीं समझी और उन्होंने अन्य प्रमुख शाखा के धर्मसूत्र को ही अपना लिया। इसी बात का स्पष्ट निर्देश "पूर्वमीमांसासूत्र" १, ३, ११ की तन्त्रवार्तिक व्याख्या में किया गया है, जिसके अनुसार सभी धर्मसूत्र और सभी गृह्यसूत्र सभी आर्यों के लिए प्रामाणिक और मान्य हैं। कल्पसूत्रों के रचयिता अपनी शाखा के नियमों का विधान करते हैं किन्तु दूसरी शाखाओं के विकल्प नियमों का भी अनुसरण करते हैं :
"स्वशाखाविहितैश्चापि शाखान्तरगतान्र्विधीन्।
कल्पकारा निबध्नन्ति सर्व एव विकल्पितान्॥
सर्वशाखोपसंहारो जैमिनेश्चापि संमतः॥" कुमारिल, १. ३।
किन्तु यह बात भी कही गयी है कि कोई भी सूत्रकार अपनी ही शाखा से सन्तुष्ट न था :
"न च सूत्रकाराणामपि कश्चित् स्वशाखोपसंहारमात्रेणावस्थितः।"
धर्मसूत्रों के निर्माण का काल
धर्मसूत्रों का विशेष महत्व इसलिए भी है कि वे सामाजिक जीवन की रोचक झाँकी प्रस्तुत करते हैं। इन ग्रन्थों के टीकाकारों के उल्लेखों से परिलक्षित होता है कि धर्मसूत्र श्रौत और गृह्यसूत्रों के पहले विद्यमान थे। उदाहरण के लिए श्रौतसूत्र में कहा गया है कि यज्ञोपवीत धारण करने के उपरान्त ही विशिष्ट यज्ञों का सम्पादन किया जा सकता है, किन्तु यज्ञोपवीत धारण या उपनयन की विधि नहीं बतायी गयी है और संकेत दिया गया है कि इसकी विधि धर्मसूत्रों से ज्ञात है। इसी प्रकार मुखशुद्धि (आचान्त) और सन्ध्यावन्दन के नियमों के ज्ञात होने का संकेत है, किन्तु इस तर्क को निर्णयात्मक नहीं माना जा सकता। इसके विपरीत धर्मसूत्रों को बाद के समय का सिद्ध करने वाले प्रमाण अधिक पुष्ट हैं जिनके अनुसार धर्मसूत्र, श्रौतसूत्र और गृह्यसूत्र के बाद के रचित ठहरते हैं। धर्मसूत्र के अतिरिक्त किसी अन्य सूत्र में शूद्र की स्थिति का स्पष्ट निर्देश नहीं है, धर्मसूत्रों में शूद्र की सामाजिक स्थिति पतित होकर उस अवस्था में पहुँची हुई है जिस अवस्था में वह स्मृतियों में दिखाई पड़ती है।
अनेक स्थलों पर धर्मसूत्र गृह्यसूत्रों के विषय का ही प्रतिपादन करते हैं किन्तु वे स्वतन्त्र रचनाओं के वर्ग में हैं और प्रामाणिकता में गृह्यसूत्रों के समकक्ष हैं। धर्मसूत्रों का रचनाकाल निश्चित करने के लिये जब हम इनके पूर्ववर्ती साहित्य
( ७ )
पर दृष्टिपात करते हैं तो देखते हैं कि निरुक्त ३, ४, ५ में रिक्थाधिकार के प्रश्न पर अनेक मतों का उल्लेख किया गया है :
“अथैतां जाभ्या रिक्थप्रतिषेध उदाहरन्ति ज्येष्ठं पुत्रिकाया इत्येके ।”
यास्क ने इस विषय में वैदिक अंशों का संकेत तो किया ही है साथ ही उन्होंने एक श्लोक का भी निर्देश किया है जिससे धर्मसम्बन्धी ग्रंथों के यास्क के समय में विद्यमान होने का पता चलता है।
“तदेतदृक्श्लोकाभ्यामभ्युक्तम् । अङ्गादङ्गात्सम्भवसि···स जीव शरदः शतम् । अविशेषेण पुत्राणां दायो भवति धर्मतः । मिथुनानां विसर्गादौ मनुः स्वायम्भुवोऽब्रवीत् ॥
इस प्रकार यदि यह स्वीकारें कि यास्क के पहले धर्मशास्त्र के ग्रन्थ विद्यमान थे तो धर्मसूत्रों की तिथि काफी पहले माननी पड़ेगी। इतना तो निश्चित है कि धर्मसूत्रों में प्राचीनतम—गौतम, बौधायन और आपस्तम्ब के धर्मसूत्र—ईसापूर्व ६०० और ३०० के बीच के समय के हैं। इन सूत्रकारों ने धर्मशास्त्रों के स्पष्ट उल्लेख किये हैं। विशेषतः गौतमधर्मसूत्र में जो प्राचीनतम धर्मसूत्र है, धर्मशास्त्र और धर्मशास्त्रकारों का निर्देश बहुशः हुआ है :
“तस्य च व्यवहारो वेदो धर्मशास्त्राण्यङ्गानि उपवेदाः पुराणम् ।” १. ९. २१
“चत्वारश्चतुर्णां पारगा वेदानां प्रागुत्तमास्त्रय आश्रमिणः पृथग्धर्मविदस्त्रय एतान्दशावरान्परिषदित्याचक्षते ।” ३. १०. ४७, यहाँ पृ० २९० ।
“त्रीणि प्रथमान्यनिर्देश्यान्मनु ।” ३. ३. ७ देखें पृ० २१४ ।
इसी प्रकार कई धर्मशास्त्रकारों के मतों के उल्लेख गौतम ने “इत्येके” कहकर किया है जैसे प्रथम प्रश्न में २. १५ में, २. ५८, ३. १, ४. २१, ७. २३ में। मनु तथा आचार्यों का भी निर्देश है :
“ऐकाश्रम्यं त्वाचार्याः प्रत्यक्षविधानाद् गार्हस्थ्यस्य”—१. ३. ३५
वर्णान्तरगमनमुत्कर्षापकर्षाभ्यां सप्तमे पञ्चमे वाऽऽचार्याः—१. ४. १८.
अन्य सूत्रकारों ने भी दूसरे धर्मशास्त्रकारों का सामान्य अभिधान से या नामतः उल्लेख किया है। पतंजलि ने भी “धर्मशास्त्रं च तथा” एवं जैमिनि ने भी “शूद्रश्च धर्मशास्त्रत्वात्”—पूर्वमीमांसा ६. ७. ६. वाक्यों द्वारा धर्मसूत्रों का निर्देश किया है और जैसा कि डा० काणे ने इन प्रमाणों से निष्कर्ष निकाला है “धर्मशास्त्र यास्क के पूर्व उपस्थित थे, कम से कम ई० पू० ६००-३०० के पूर्व तो वे थे ही और ईसा की द्वितीय शताब्दी में वे मानव आचार के लिए सबसे बड़े प्रमाण माने जाते थे ।”
—धर्मशास्त्र का इतिहास, प्रथम खण्ड, अनु० आचार्य काश्यप, पृ० ८ ।
सूत्र ग्रन्थों और श्लोकबद्ध धर्मग्रन्थों के आपेक्षिक काल के विषय में विद्वानों में मतभेद और विवाद है। प्रो० माक्स म्यूलेर एवं दूसरे विद्वान् यथा डा० भण्डारकर यह मानते हैं कि सूत्रों की रचना के बाद अनुष्टुम् छन्द वाले धर्मग्रन्थों
( ८ )
की रचना हुई। डा० काणे को यह मत स्वीकार नहीं है, क्योंकि प्राचीन ग्रन्थों के विषय में हमारा ज्ञान अल्प है तथा श्लोक छन्द वाले कुछ ग्रन्थ जैसे मनुस्मृति कुछ धर्मसूत्रों यथा विष्णु-धर्मसूत्र से प्राचीन है और वशिष्ठधर्मसूत्र के समय का है। इसी प्रकार कुछ बहुत पुराने सूत्रों यथा बौधायनधर्मसूत्र में भी श्लोक उद्धृत हैं। "इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि श्लोकबद्ध ग्रन्थ धर्मसूत्रों से पूर्व भी विद्यमान थे"—काणे, वही, पृ० ९।
धर्मसूत्रों में प्राचीनतम गौतमधर्मसूत्र है। इसके विषय में आगे विस्तारपूर्वक कहा जायगा। इसका रचनाकाल ६०० वि० पू० और ४०० वि० पू० के बीच माना जाता है।
बौधायन धर्मसूत्र
बौधायन का धर्मसूत्र चार प्रश्नों में विभक्त है, इनमें अन्तिम प्रश्न परिशिष्ट माना जाता है और उसे बाद के समय की रचना मानते हैं। यह आपस्तम्ब धर्मसूत्र से पहले के समय का है। इसमें दो बार गौतम के नाम का तथा एक बार उनके धर्मसूत्र का उल्लेख आता है। बौधायन ने अनेक आचार्यों के नाम गिनाये हैं तथा उपनिषदों के उद्धरण दिये हैं। कुमारिल ने बौधायन को आपस्तम्ब से बाद के समय का माना है। बौधायन का काल ई० पू० २००-५०० के बीच माना जाता है।
आपस्तम्ब धर्मसूत्र
इस धर्मसूत्र में दो प्रश्न हैं जिनमें प्रत्येक में ग्यारह पटल हैं। सभी सूत्रों में यह सूत्र छोटा है और इसकी शैली बड़ी चुस्त है, भाषा भी पाणिनि से बहुत पहले की है। अधिकांश सूत्र गद्य में हैं किन्तु यत्र-तत्र श्लोक भी हैं। इसका संबन्ध पूर्वमीमांसा से दिखाई पड़ता है। यह बहुत प्रामाणिक माना जाता रहा है। इसका समय ६००-३०० ई० पू० स्वीकार किया गया है।
हिरण्यकेशि धर्मसूत्र
हिरण्यकेशीकल्प का २६ वां और २७ वां प्रश्न है। प्रायः इसे स्वतन्त्र धर्मसूत्र नहीं माना जाता, क्योंकि इसमें आपस्तम्ब धर्मसूत्र से सैकड़ों सूत्र लिये गये हैं।
वसिष्ठ धर्मसूत्र
इसके कई संस्करण हैं। जीवानन्द के संस्करण में २० अध्याय हैं तथा ३१ वें अध्याय का कुछ अंश है। इसके अतिरिक्त इसके ३० अध्यायों, ६ अध्यायों एवं २१ अध्यायों के अलग-अलग संस्करण भी हैं। इससे पता चलता है कि यह कालान्तर में परिबृंहित, परिवर्धित और परिवर्तित होता रहा है। इसका समय ३००-२०० ई० पू० है।
( ९ )
विष्णु धर्मसूत्र
इस सूत्र में १०० अध्याय हैं, किन्तु सूत्र छोटे हैं। पहला अध्याय और अन्त के दो अध्याय पद्य में हैं। शेष में गद्य है या गद्य और पद्य का मिश्रण। इसका संबन्ध यजुर्वेद की कठ शाखा से बताया गया है। इसमें भिन्न-भिन्न कालों के अंश दृष्टिगोचर होते हैं, जिससे इसका काल निश्चित करना कठिन होता है। इसके आरम्भ के अंशों का समय ३००-१०० ई० पू० के बीच माना जा सकता है। इसमें भगवद्गीता, मनुस्मृति तथा याज्ञवल्क्यस्मृति से बहुत सी बातें ली गयी हैं।
हारीत धर्मसूत्र
इस सूत्र का ज्ञान उद्धरणों से मिलता है। अनेक धर्मशास्त्रकारों ने इनका उल्लेख किया है। इसमें गद्य के साथ अनुष्टुप् एवं त्रिष्टुप् छन्द का प्रयोग है। हारीत का संबन्ध कृष्णयजुर्वेद से है, किन्तु उन्होंने सभी वेदों से उद्धरण लिये हैं। इससे यह भी ज्ञात होता है कि वे किसी एक वेद से संबद्ध नहीं थे।
शंखलिखित धर्मसूत्र
यह शुक्लयजुर्वेद की वाजसनेयि शाखा का धर्मसूत्र था। 'तन्त्रवार्तिक' में इस सूत्र के अनुष्टुप् श्लोकों का उद्धरण है। याज्ञवल्क्य और पराशर ने इनका उल्लेख किया है। "जीवानन्द के स्मृतिसंग्रह में इस धर्मसूत्र के १८ अध्याय एवं शंखस्मृति के ३३० तथा लिखितस्मृति के ९३ श्लोक पाये जाते हैं। यह धर्मसूत्र गौतम एवं आपस्तम्ब के बाद के काल का है और इसकी रचना का समय ई० पू० ३०० से ई० सन् १०० के बीच है।
अन्य सूत्र ग्रन्थ
अनेक धर्मसूत्र धर्मविषयक ग्रन्थों में विकीर्ण हैं। उनमें इन आचार्यों के सूत्र ग्रन्थ गिनाये जाते हैं—अत्रि, उशना, कण्व एवं काण्व, कश्यप एवं काश्यप, गार्ग्य, च्यवन, जातूकर्ण्य, देवल, पैठीनसि, बुध, बृहस्पति, भरद्वाज एवं भारद्वाज, शातातप, सुमन्तु आदि।
धर्मसूत्रों का वर्ण्यविषय
धर्मसूत्रों का मुख्य वर्ण्यविषय है "आचार, विधि-नियम, एवं क्रियासंस्कार"। ये इन्हीं का विधिवत् विवेचन करते हैं। निश्चय ही, धर्मसूत्र कभी-कभी गृह्यसूत्रों के प्रतिपाद्य विषयों के भी क्षेत्र में पहुँच जाते हैं, किन्तु ऐसा कम स्थलों पर हुआ है। गृह्यसूत्रों का ध्येय गृह्ययज्ञ, प्रातः सायंपूजन, पके हुए भोजन की बलि, वार्षिक यज्ञ, विवाह, पुंसवन, जातकर्म, उपनयन एवं दूसरे संस्कार, छात्रों एवं स्नातकों के नियम, मधुपर्क और श्राद्धकर्म का वर्णन करना तथा इनकी विधियों को स्पष्ट करना है। इस प्रकार गृह्यसूत्रों का स्पष्ट संबन्ध घरेलू जीवन तथा व्यक्तिगत जीवन से है। ये कर्त्तव्यों ( duties ) और कानून ( laws ) को अपना विषय नहीं बनाते। इनके विपरीत धर्मसूत्र मनुष्य को समाज में लाकर खड़ा कर देता
( १० )
है जहाँ उसे व्यावहारिक जगत् में दूसरों के साथ रहते हुए अपने आचार-व्यवहार को नियमित और संयमित करना है, उसे कुछ कर्तव्यों एवं दायित्वों का पालन करना होता है, कुछ अधिकार प्राप्त करने होते हैं और अपने अपराधों के लिए दण्ड भोगने होते हैं। इस प्रकार धर्मसूत्रों का वातावरण अधिक सामाजिक और नैतिक है। जैसा हम कह आये हैं धर्मसूत्रों में गृह्यसूत्रों के कुछ विषयों पर भी विचार किया गया है जैसे विवाह, संस्कार, मधुपर्क, स्नातक का जीवन, श्राद्धकर्म आदि। संक्षेप में धर्मसूत्रों के वर्ण्यविषय की सूची इस प्रकार दी जा सकती है :—धर्म और उसके उपादान, चारों वर्णों के आचार और कर्तव्य एवं जीवन-वृत्तियाँ, ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास आश्रमों के आचार, उपजातियाँ और मिश्रित जातियाँ, सपिण्ड और सगोत्र, पाप और उनके प्रायश्चित्त एवं व्रत, अशौच और उससे शुद्धि, ऋण, ब्याज, साक्षी और न्यायव्यवहार, अपराध और उनके दण्ड, राजा और राजा के कर्तव्य, स्त्री के कर्तव्य, पुत्र और दत्तक पुत्र, उत्तराधिकार, स्त्रीधन और सम्पत्ति का विभाजन।
धर्मसूत्र और स्मृतियाँ
‘स्मृति’ शब्द का प्रयोग श्रुति अर्थात् वेद के ईश्वरप्रकाशित एवं ऋषिदृष्ट वाङ्मय से भिन्न साहित्य के लिए हुआ है। श्रुति और स्मृति के विषय में आगे धर्म के स्वरूप का विवेचन करते समय विचार किया गया है। उपर्युक्त अर्थ के अनुसार धर्मसूत्र भी स्मृति ग्रन्थ है :
“श्रुतिस्तु वेदो विज्ञेयो धर्मशास्त्रं तु वै स्मृतिः।” मनु० २. १०
किन्तु संकुचित अर्थ में स्मृति से धर्मशास्त्र की उन रचनाओं का तात्पर्य है जो प्रायः श्लोकों में हैं और उन्हीं विषयों का विवेचन करती हैं जिनका प्रतिपादन धर्मसूत्रों में किया गया है। इन स्मृतियों में अग्रणी हैं—मनु और याज्ञवल्क्य की स्मृतियाँ। “मनुस्मृति” सबसे प्राचीन है और ईसा से कई सौ वर्ष पहले रची गयी थी। अन्य स्मृतियाँ ४०० से १००० ई० के बीच की हैं। स्मृतिकारों की संख्या विस्तृत है, मुख्य स्मृतिकार १८ हैं, इनके अतिरिक्त २१ अन्य स्मृतिकार हैं जिनके नाम वीरमित्रोदय ने गिनाये हैं।
डॉ० काणे ने अपने धर्मशास्त्र के इतिहास में धर्मसूत्रों एवं स्मृतियों के प्रमुख लक्षण स्पष्टतः निर्दिष्ट किये हैं, जिन्हें यहाँ साभार उल्लिखित करना असंगत नहीं होगा।
१. अनेक धर्मसूत्र किसी चरण के कल्प के अंग हैं, अथवा उनका गहरा संबन्ध गृह्यसूत्रों से है।
२. धर्मसूत्रों में कभी-कभी अपने चरण तथा अपने वेद के उद्धरण विशेषतः दिये गये हैं।
३. प्राचीन धर्मसूत्रों के रचयिताओं को ऋषियों का ओहदा प्राप्त नहीं है और न वे अपने को मानवीय धरातल से ऊपर उठे हुए अलौकिक बताते हैं, इसके
( ११ )
विपरीत मनु और याज्ञवल्क्य जैसे स्मृतिकारों को मानव से ऊपर दैवी शक्ति से संपन्न दर्शाया गया है।
४. धर्मसूत्र प्रायः गद्य में हैं या कहीं-कहीं मिश्रित गद्य और पद्य में हैं, किन्तु स्मृतियाँ श्लोकों में या पद्यबद्ध हैं।
५. भाषा की दृष्टि से धर्मसूत्र स्मृतियों के पहले के हैं और स्मृतियों की भाषा अपेक्षाकृत अर्वाचीन है।
६. विषयवस्तु के विन्यास की दृष्टि से भी उनमें भेद है। धर्मसूत्रों में विषय की व्यवस्था क्रम या तारतम्य का अनुसरण नहीं करती, किन्तु स्मृतियाँ अधिक व्यवस्थित और सुगठित हैं, उनमें विषयवस्तु मुख्यतः तीन शीर्षकों में विभक्त है—आचार, व्यवहार और प्रायश्चित्त ।
७. बहुत बड़ी संख्या में धर्मसूत्र अधिकतम स्मृतियों से प्राचीन हैं।
गौतम धर्मसूत्र
सभी धर्मसूत्रों में गौतम धर्मसूत्र सबसे प्राचीन है। यह केवल गद्य में है तथा इसमें श्लोक का कोई उद्धरण नहीं दिया गया है, जबकि दूसरे धर्मसूत्रों में श्लोक का उद्धरण आ जाता है। इसकी प्राचीनता के कई प्रमाण हैं :
१. सर्वप्रथम इसका उल्लेख बौधायनधर्मसूत्र में कई जगह किया गया है। यहाँ तक कि गौतमधर्मसूत्र का उन्नीसवां अध्याय अल्प परिवर्तित रूप में बौधायन-धर्मसूत्र में मिलता है और इन दोनों में बहुत से सूत्र एक दूसरे से मिलते-जुलते हैं। अनेक प्रमाणों से यह बात सिद्ध है कि बौधायन ने ही गौतमधर्मसूत्र से सामग्री ग्रहण की है।
२. इसी प्रकार वसिष्ठधर्मसूत्र में भी गौतमधर्मसूत्र से सामग्री ली गयी है। इसमें दो स्थानों ४. ३४ एवं ४. ३६ में गौतमधर्मसूत्र का उद्धरण है। इसके अतिरिक्त गौतमधर्मसूत्र का उन्नीसवां अध्याय वसिष्ठधर्मसूत्र में बाइसवें अध्याय के रूप में आता है। वसिष्ठधर्मसूत्र में कई सूत्र ठीक गौतमधर्मसूत्र में आये हुए सूत्रों के समान हैं जिनसे यह सिद्ध होता है कि गौतमधर्मसूत्र वसिष्ठधर्मसूत्र से पहले का है।
३. मनुस्मृति ३. १६ में गौतम का उल्लेख किया गया है और उन्हें उतथ्य का पुत्र बताया गया है।
४. याज्ञवल्क्यस्मृति १. ५ में उन्हें धर्मशास्त्रकारों में गिनाया गया है : “पराशरव्यासशंखलिखिता दक्षगौतमौ”।
५. अपरार्क ने 'भविष्यपुराण' से यह श्लोक उद्धृत किया है : “प्रतिषेधः सुरापाने मद्यस्य च नराधिप। द्विजोत्तमानामेवोक्तः सततं गौतमादिभिः॥” और यह सुरापान के विषय में ठीक गौतम के सूत्र के अनुरूप है।
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६. मनुस्मृति के टीकाकार कुल्लूक ने गौतम के ३. ६. २ सूत्र को भी भविष्य-पुराण का बताया है।
७. 'तन्त्रवार्तिक' के लेखक कुमारिल ने गौतम के अनेक सूत्र उद्धृत किये हैं।
८. शंकराचार्य ने अपने वेदान्तसूत्रभाष्य ३. १. ८ में गौतम के २. २. २९ को तथा १. ३. ३८ में २. ३. ४ को उद्धृत किया है।
९. याज्ञवल्क्यस्मृति के टीकाकार विश्वरूप ने गौतम के कई सूत्रों का निर्देश किया है।
१०. मनुस्मृति के भाष्यकार मेधातिथि ने गौतम का उद्धरण अनेक स्थलों पर दिया है।
११. गौतमधर्मसूत्र में हिन्दूधर्म पर बौद्धों द्वारा किये गये आक्षेपों की ओर संकेत नहीं है।
इन सब उल्लेखों से गौतमधर्मसूत्र के काल के विषय में यह निष्कर्ष निकलता है कि यह सूत्र निश्चित रूप से उपर्युक्त सभी रचनाओं से पहले का है। गौतमधर्मसूत्र का समय यास्क के 'निरुक्त' के बाद आता है और जैसा कि म० म० काणे ने कहा है गौतम धर्मसूत्र की रचना के समय “पाणिनि का व्याकरण या तो था ही नहीं और यदि था तो वह तब तक अपनी महत्ता नहीं स्थापित कर सका था।” इस प्रकार यह निश्चित होता है कि गौतमधर्मसूत्र ईसापूर्व ४००-६०० के पहले रचा जा चुका था।
गौतम धर्मसूत्र में अन्य साहित्य का उल्लेख
गौतम धर्मसूत्र सभी धर्मसूत्रों में प्राचीनतम है इसका एक प्रमाण यह भी है कि इसमें किसी अन्य धर्मसूत्र का या धर्मसूत्रकार का निर्देश नामतः नहीं है किन्तु इसके पहले धर्मशास्त्र और उसके रचयिता विद्यमान थे इस बात की ओर बहुशः उल्लेख इसमें मिलता है। राजा के व्यवहार के साधन बताते समय २. २. १९ में कहा गया है—
“तस्य च व्यवहारो वेदो धर्मशास्त्राण्यङ्गान्यपवेदाः पुराणम्”।
इसी प्रकार त्रयी के साथ आन्वीक्षिकी का भी उल्लेख है :—
“त्रय्यामान्वीक्षिक्यां वाऽभिविनीतः” २. २. ३
अन्य धर्माचार्यों में केवल मनु के मत का महापातकों का वर्णन करते समय उल्लेख किया गया है। 'एके' 'इत्येके' 'एकेषाम्' शब्दों द्वारा उस समय के तथा पूर्ववर्ती धर्मशास्त्रकारों के मतों का उल्लेख किया गया है।
वैदिक संहिता एवं ब्राह्मण साहित्य का उल्लेख तो किया ही गया है, उपनिषद्, वेदान्त आदि का भी हवाला गौतमधर्मसूत्र में कई जगह मिलता है। यथा, ३. १. १२।
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"उपनिषदो वेदान्तः सर्वच्छन्दःसु संहिता मधून्यघमर्षणमथर्वशिरो रुद्राः पुरुषसूक्तं राजतरौहिणे सामनी बृहद्रथन्तरे पुरुषगतिमहानाम्न्यो महावैराजं महादिवाकीर्त्यं ज्येष्ठसाम्नामन्यतमद् बहिष्पवमानं कूष्माण्डानि पावमान्यः सावित्री चेति पावमाननानि।"
इसी प्रकार वेदवेदांग और इतिहास पुराण का उल्लेख बहुश्रुत व्यक्ति का लक्षण बताते समय किया गया है :
"लोकवेदवेदाङ्गवित्" १. ८. ५। "वाकोवाक्येतिहासपुराणकुशलः" १. ८. ६।
गौतमधर्मसूत्र ३. २. २८ में "दण्डो दमनादित्याहुः" कहकर निरुक्त ११. ३ की ओर भी संकेत किया गया है। इस प्रकार गौतमधर्मसूत्र में इतर साहित्य की भी पर्याप्त चर्चा है।
गौतमधर्मसूत्र का सामवेद से संबन्ध
गौतमधर्मसूत्र का सामवेद से घनिष्ठ संबन्ध है इस विषय में कोई विवाद नहीं है। इस सूत्र का अध्ययन विशेषतः सामवेद के अनुयायी करते थे। चरणव्यूह की टीका के अनुसार गौतम सामवेद की राणायनीशाखा के एक विभाग के आचार्य या शाखा के संस्थापक थे। सामवेद के श्रौतसूत्रों (लाट्यायन श्रौतसूत्र १. ३. ३, १. ४. १७ तथा द्राह्यायण श्रौतसूत्र १. ४. १७, ९. ३. १५) में गौतम का उल्लेख है। सामवेद के गृह्यसूत्र गोभिलगृह्यसूत्र ३. १०. ६ में भी गौतमधर्मसूत्र के नियम को प्रामाणिक माना गया है।
इन उल्लेखों के अतिरिक्त गौतमधर्मसूत्र का सामवेद से गहरा संबन्ध इस बात से भी प्रमाणित होता है कि इस सूत्र में सामवेद के अनेक विषय ग्रहण किये गये हैं। उदाहरण के लिए गौतमधर्मसूत्र के अध्याय २६ में कुछ सूत्र ऐसे हैं जो शब्दशः सामवेद के सामविधान ब्राह्मण से उद्धृत किये गये हैं। इसी प्रकार गौतमधर्मसूत्र के तृतीय प्रश्न, प्रथम अध्याय के १२ वें सूत्र में सामवेद के ९ मन्त्रों का निर्देश किया गया है। ये मन्त्र किसी अन्य शाखा के धर्मसूत्र में नहीं उल्लिखित हैं जिससे गौतमधर्मसूत्र का सामवेद के प्रति पक्षपात स्पष्टतः दिखाई पड़ता है। गौतमधर्मसूत्र में प्रथम अध्याय के सूत्र ५२ में पाँच व्याहृतियाँ गिनायी गयी हैं और ये व्याहृति साम से उद्धृत हैं, गौतमधर्मसूत्र के अतिरिक्त अन्य शाखा के सूत्रों में पाँच के स्थान पर तीन या सात व्याहृतियों का ही उल्लेख है। गौतमधर्मसूत्र की यह विशेषता भी सामवेद के साथ इसका घनिष्ठ संबन्ध प्रकट करती है।
अतः यह प्रतीत होता है कि गौतम की शाखा का संबन्ध सामवेद से था, यद्यपि वैदिक काल की इस प्राचीन शाखा के विषय में कुछ निश्चित नहीं कहा जा सकता, क्योंकि प्राचीन साहित्य में क्षेपकों के लिए पर्याप्त अवसर था और किसी ग्रन्थ का विशुद्ध रूप निर्धारित करना असंभव सा ही है।
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धर्मसूत्र के रचयिता-गौतम
गौतमधर्मसूत्र के रचयिता का नाम सूत्र के नाम के अनुसार गौतम है। ऊपर यह निर्देश किया जा चुका है कि सामवेद के लाट्यायन श्रौतसूत्र और द्राह्मायण श्रौतसूत्र में गौतम का उल्लेख प्रायः आया है। इसी प्रकार गोभिल गृह्यसूत्र में भी गौतम को प्रमाण माना गया है। वस्तुतः गौतम नाम एक जातिगत नाम है और अनेक व्यक्तियों के नाम के साथ इसका प्रयोग उपलब्ध होता है, उदाहरण के लिए कठोपनिषद् २. ४. ५५ और २. ५. ६ में इसका प्रयोग नचिकेता के साथ तथा उसी उपनिषद् में १. १. १० में इस नाम का प्रयोग उसके पिता के लिए हुआ है। छान्दोग्योपनिषद् ४. ४. ३ में हारिद्रुम गौतम नाम के एक आचार्य का नाम आता है।
कुछ अन्य धर्मग्रन्थों के साथ भी गौतम नाम जुड़ा हुआ मिलता है। जैसा कि म० म० काणे ने बताया है मिताक्षरा, स्मृतिचन्द्रिका, हेमाद्रि, माधव आदि ने किसी श्लोक-गौतम के उद्धरण दिये हैं। वृद्ध-गौतम नाम के धर्मशास्त्र का उल्लेख अपरार्क, हेमाद्रि तथा माधव ने किया है। दत्तकमीमांसा में वृद्ध गौतम के अतिरिक्त बृहद् गौतम से उद्धरण दिया गया है। किन्तु गौतम नाम की ये रचनायें गौतमधर्मसूत्र से बहुत बाद के समय की हैं और गौतम धर्मसूत्र से इनमें काफी अन्तर है।
सामवेद के वंशब्राह्मण में गौतम गोत्र नाम वाले चार सामवेदी आचार्यों के नाम आये हैं:—गात् गौतम, सुमन्त्र बाभ्रव्य गौतम, संकर गौतम तथा स्थविर गौतम। श्रौतसूत्रों और गृह्यसूत्रों में गौतम तथा स्थविर गौतम के मत उद्धृत किये गये हैं।
गौतमधर्मसूत्र के संस्करण और टीकाकार
गौतमधर्मसूत्र का कई बार प्रकाशन हुआ है। डा० स्टेन्जलर ने इसका सम्पादन 'दि इंस्टीट्यूट्स आफ गौतम नाम से लन्दन से १८७६ में किया और कलकत्ता से भी १८७६ में एक संस्करण प्रकाशित हुआ। आनन्दाश्रम ग्रन्थावली के अन्तर्गत इसका संस्करण हरदत्त की 'मिताक्षरा' टीका के साथ १९१० में प्रकाशित हुआ। इसका एक संस्करण मैसूर से भी निकला है। मैसूर संस्करण में मस्करी का भाष्य है। डा० ब्यूहूलर कृत अंग्रेजी अनुवाद 'सेक्रेड बुक्स आफ दी ईस्ट' सीरीज़ की दूसरी जिल्द में प्रकाशित है।
इस धर्मसूत्र के टीकाकारों में मुख्य हैं हरदत्त और मस्करी। हरदत्त का समय ११००-१३०० के बीच माना गया है। इनके अतिरिक्त कुछ अन्य टीकाकारों का भी उल्लेख पाया जाता है। अद्भुत सागर के लेखक अनिरुद्ध ने तथा भाष्यकार विश्वरूप ने गौतमधर्मसूत्र पर असहाय नाम के आचार्य की टीका का भी निर्देश किया है।
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गौतमधर्मसूत्र में वर्णित विषय
टीकाकार हरदत्त के अनुसार गौतमधर्मसूत्र में कुल २८ अध्याय हैं। कलकत्ता से प्रकाशित संस्करण में एक अध्याय 'कर्मविपाक' १९ वें अध्याय के बाद आता है। आनन्दाश्रम ग्रन्थावली से प्रकाशित इस ग्रन्थ में तथा वर्तमान संस्करण में भी इस धर्मसूत्र का विभाजन तीन प्रश्नों के अन्तर्गत है और प्रथम प्रश्न में ९ अध्याय, द्वितीय प्रश्न में ९ अध्याय तथा तृतीय प्रश्न में १० अध्याय हैं। इसमें वर्णित विषयों की सूची संक्षेप में इस क्रम से है।
प्रथम प्रश्न
प्रथम अध्याय—धर्म, उपनयन, शुद्धिप्रकरण, छात्र के नियम। द्वितीय अध्याय—ब्रह्मचारी के नियम, आचरण और निषेध। तृतीय अध्याय—गृहस्थाश्रम, संन्यास और वानप्रस्थ के नियम। चतुर्थ अध्याय—गृहस्थ का धर्म, विवाह और पुत्रों का प्रकार। पंचम अध्याय—पंच महायज्ञ और मधुपर्क। षष्ठ अध्याय—अभिवादन के नियम, और श्रेष्ठ व्यक्तियों के प्रति आचरण। सप्तम अध्याय—गुरु सेवा और ब्राह्मण के कर्तव्य। अष्टम अध्याय—राजा और बहुश्रुत संस्कार। नवम अध्याय—व्रत और आचरण के दैनिक नियम।
द्वितीय प्रश्न
प्रथम अध्याय—चारों वर्णों के कर्तव्य। द्वितीय अध्याय—राजा के कर्तव्य और धर्मनिर्णय की प्रक्रिया। तृतीय अध्याय—अपराध और उनके दण्ड, ब्याज, ऋण। चतुर्थ अध्याय—विवाद और उनके निर्णय, साक्षी और व्यवहार, सत्यभाषण, न्यायकर्ता। पंचम अध्याय—मृत्यु और जन्मविषयक अशौच। षष्ठ अध्याय—श्राद्धकर्म। सप्तम अध्याय—वेदाध्ययन की विधि और अनध्याय। अष्टम अध्याय—भक्ष्य और पेय पदार्थ। नवम अध्याय—स्त्री के धर्म।
तृतीय प्रश्न
प्रथम अध्याय—प्रायश्चित्त। द्वितीय अध्याय—त्याज्य व्यक्ति। तृतीय अध्याय—पातक और महापातक। चतुर्थ अध्याय से सप्तम अध्याय—प्रायश्चित्त। अष्टम अध्याय—कृच्छ्र व्रत। नवम अध्याय—चान्द्रायण व्रत और दशम अध्याय—सम्पत्ति का विभाजन।
धर्म
धर्म शब्द का वास्तविक अर्थ जानने के लिए जब हम अपने प्राचीनतम साहित्य 'ऋग्वेद' का अवलोकन करते हैं तो हम देखते हैं कि इस शब्द का प्रयोग विशेषण या संज्ञा शब्द के रूप में हुआ है। प्रायः यह शब्द 'धर्मन्' है और इसका प्रयोग नपुंसकलिंग में हुआ है। 'धर्मन्' शब्द का प्रयोग निम्नलिखित स्थलों पर हुआ है—ऋग्वेद—१. २२. १८, १. १६४. ४३, ५०, ३. ३. १, ३. १७.