गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Gautama Dharmasutra Hindi
महर्षि गौतम द्वारा
स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)
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गौतमधर्मसूत्र में वर्णित विषय
टीकाकार हरदत्त के अनुसार गौतमधर्मसूत्र में कुल २८ अध्याय हैं। कलकत्ता से प्रकाशित संस्करण में एक अध्याय 'कर्मविपाक' १९ वें अध्याय के बाद आता है। आनन्दाश्रम ग्रन्थावली से प्रकाशित इस ग्रन्थ में तथा वर्तमान संस्करण में भी इस धर्मसूत्र का विभाजन तीन प्रश्नों के अन्तर्गत है और प्रथम प्रश्न में ९ अध्याय, द्वितीय प्रश्न में ९ अध्याय तथा तृतीय प्रश्न में १० अध्याय हैं। इसमें वर्णित विषयों की सूची संक्षेप में इस क्रम से है।
प्रथम प्रश्न
प्रथम अध्याय—धर्म, उपनयन, शुद्धिप्रकरण, छात्र के नियम। द्वितीय अध्याय—ब्रह्मचारी के नियम, आचरण और निषेध। तृतीय अध्याय—गृहस्थाश्रम, संन्यास और वानप्रस्थ के नियम। चतुर्थ अध्याय—गृहस्थ का धर्म, विवाह और पुत्रों का प्रकार। पंचम अध्याय—पंच महायज्ञ और मधुपर्क। षष्ठ अध्याय—अभिवादन के नियम, और श्रेष्ठ व्यक्तियों के प्रति आचरण। सप्तम अध्याय—गुरु सेवा और ब्राह्मण के कर्तव्य। अष्टम अध्याय—राजा और बहुश्रुत संस्कार। नवम अध्याय—व्रत और आचरण के दैनिक नियम।
द्वितीय प्रश्न
प्रथम अध्याय—चारों वर्णों के कर्तव्य। द्वितीय अध्याय—राजा के कर्तव्य और धर्मनिर्णय की प्रक्रिया। तृतीय अध्याय—अपराध और उनके दण्ड, ब्याज, ऋण। चतुर्थ अध्याय—विवाद और उनके निर्णय, साक्षी और व्यवहार, सत्यभाषण, न्यायकर्ता। पंचम अध्याय—मृत्यु और जन्मविषयक अशौच। षष्ठ अध्याय—श्राद्धकर्म। सप्तम अध्याय—वेदाध्ययन की विधि और अनध्याय। अष्टम अध्याय—भक्ष्य और पेय पदार्थ। नवम अध्याय—स्त्री के धर्म।
तृतीय प्रश्न
प्रथम अध्याय—प्रायश्चित्त। द्वितीय अध्याय—त्याज्य व्यक्ति। तृतीय अध्याय—पातक और महापातक। चतुर्थ अध्याय से सप्तम अध्याय—प्रायश्चित्त। अष्टम अध्याय—कृच्छ्र व्रत। नवम अध्याय—चान्द्रायण व्रत और दशम अध्याय—सम्पत्ति का विभाजन।
धर्म
धर्म शब्द का वास्तविक अर्थ जानने के लिए जब हम अपने प्राचीनतम साहित्य 'ऋग्वेद' का अवलोकन करते हैं तो हम देखते हैं कि इस शब्द का प्रयोग विशेषण या संज्ञा शब्द के रूप में हुआ है। प्रायः यह शब्द 'धर्मन्' है और इसका प्रयोग नपुंसकलिंग में हुआ है। 'धर्मन्' शब्द का प्रयोग निम्नलिखित स्थलों पर हुआ है—ऋग्वेद—१. २२. १८, १. १६४. ४३, ५०, ३. ३. १, ३. १७.