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गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Gautama Dharmasutra Hindi

महर्षि गौतम द्वारा

स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished360 पृष्ठ

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धर्मसूत्र के रचयिता-गौतम

गौतमधर्मसूत्र के रचयिता का नाम सूत्र के नाम के अनुसार गौतम है। ऊपर यह निर्देश किया जा चुका है कि सामवेद के लाट्यायन श्रौतसूत्र और द्राह्मायण श्रौतसूत्र में गौतम का उल्लेख प्रायः आया है। इसी प्रकार गोभिल गृह्यसूत्र में भी गौतम को प्रमाण माना गया है। वस्तुतः गौतम नाम एक जातिगत नाम है और अनेक व्यक्तियों के नाम के साथ इसका प्रयोग उपलब्ध होता है, उदाहरण के लिए कठोपनिषद् २. ४. ५५ और २. ५. ६ में इसका प्रयोग नचिकेता के साथ तथा उसी उपनिषद् में १. १. १० में इस नाम का प्रयोग उसके पिता के लिए हुआ है। छान्दोग्योपनिषद् ४. ४. ३ में हारिद्रुम गौतम नाम के एक आचार्य का नाम आता है।

कुछ अन्य धर्मग्रन्थों के साथ भी गौतम नाम जुड़ा हुआ मिलता है। जैसा कि म० म० काणे ने बताया है मिताक्षरा, स्मृतिचन्द्रिका, हेमाद्रि, माधव आदि ने किसी श्लोक-गौतम के उद्धरण दिये हैं। वृद्ध-गौतम नाम के धर्मशास्त्र का उल्लेख अपरार्क, हेमाद्रि तथा माधव ने किया है। दत्तकमीमांसा में वृद्ध गौतम के अतिरिक्त बृहद् गौतम से उद्धरण दिया गया है। किन्तु गौतम नाम की ये रचनायें गौतमधर्मसूत्र से बहुत बाद के समय की हैं और गौतम धर्मसूत्र से इनमें काफी अन्तर है।

सामवेद के वंशब्राह्मण में गौतम गोत्र नाम वाले चार सामवेदी आचार्यों के नाम आये हैं:—गात् गौतम, सुमन्त्र बाभ्रव्य गौतम, संकर गौतम तथा स्थविर गौतम। श्रौतसूत्रों और गृह्यसूत्रों में गौतम तथा स्थविर गौतम के मत उद्धृत किये गये हैं।

गौतमधर्मसूत्र के संस्करण और टीकाकार

गौतमधर्मसूत्र का कई बार प्रकाशन हुआ है। डा० स्टेन्जलर ने इसका सम्पादन 'दि इंस्टीट्यूट्स आफ गौतम नाम से लन्दन से १८७६ में किया और कलकत्ता से भी १८७६ में एक संस्करण प्रकाशित हुआ। आनन्दाश्रम ग्रन्थावली के अन्तर्गत इसका संस्करण हरदत्त की 'मिताक्षरा' टीका के साथ १९१० में प्रकाशित हुआ। इसका एक संस्करण मैसूर से भी निकला है। मैसूर संस्करण में मस्करी का भाष्य है। डा० ब्यूहूलर कृत अंग्रेजी अनुवाद 'सेक्रेड बुक्स आफ दी ईस्ट' सीरीज़ की दूसरी जिल्द में प्रकाशित है।

इस धर्मसूत्र के टीकाकारों में मुख्य हैं हरदत्त और मस्करी। हरदत्त का समय ११००-१३०० के बीच माना गया है। इनके अतिरिक्त कुछ अन्य टीकाकारों का भी उल्लेख पाया जाता है। अद्भुत सागर के लेखक अनिरुद्ध ने तथा भाष्यकार विश्वरूप ने गौतमधर्मसूत्र पर असहाय नाम के आचार्य की टीका का भी निर्देश किया है।