गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Gautama Dharmasutra Hindi
महर्षि गौतम द्वारा
स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 12, कुल 360 में से
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पर दृष्टिपात करते हैं तो देखते हैं कि निरुक्त ३, ४, ५ में रिक्थाधिकार के प्रश्न पर अनेक मतों का उल्लेख किया गया है :
“अथैतां जाभ्या रिक्थप्रतिषेध उदाहरन्ति ज्येष्ठं पुत्रिकाया इत्येके ।”
यास्क ने इस विषय में वैदिक अंशों का संकेत तो किया ही है साथ ही उन्होंने एक श्लोक का भी निर्देश किया है जिससे धर्मसम्बन्धी ग्रंथों के यास्क के समय में विद्यमान होने का पता चलता है।
“तदेतदृक्श्लोकाभ्यामभ्युक्तम् । अङ्गादङ्गात्सम्भवसि···स जीव शरदः शतम् । अविशेषेण पुत्राणां दायो भवति धर्मतः । मिथुनानां विसर्गादौ मनुः स्वायम्भुवोऽब्रवीत् ॥
इस प्रकार यदि यह स्वीकारें कि यास्क के पहले धर्मशास्त्र के ग्रन्थ विद्यमान थे तो धर्मसूत्रों की तिथि काफी पहले माननी पड़ेगी। इतना तो निश्चित है कि धर्मसूत्रों में प्राचीनतम—गौतम, बौधायन और आपस्तम्ब के धर्मसूत्र—ईसापूर्व ६०० और ३०० के बीच के समय के हैं। इन सूत्रकारों ने धर्मशास्त्रों के स्पष्ट उल्लेख किये हैं। विशेषतः गौतमधर्मसूत्र में जो प्राचीनतम धर्मसूत्र है, धर्मशास्त्र और धर्मशास्त्रकारों का निर्देश बहुशः हुआ है :
“तस्य च व्यवहारो वेदो धर्मशास्त्राण्यङ्गानि उपवेदाः पुराणम् ।” १. ९. २१
“चत्वारश्चतुर्णां पारगा वेदानां प्रागुत्तमास्त्रय आश्रमिणः पृथग्धर्मविदस्त्रय एतान्दशावरान्परिषदित्याचक्षते ।” ३. १०. ४७, यहाँ पृ० २९० ।
“त्रीणि प्रथमान्यनिर्देश्यान्मनु ।” ३. ३. ७ देखें पृ० २१४ ।
इसी प्रकार कई धर्मशास्त्रकारों के मतों के उल्लेख गौतम ने “इत्येके” कहकर किया है जैसे प्रथम प्रश्न में २. १५ में, २. ५८, ३. १, ४. २१, ७. २३ में। मनु तथा आचार्यों का भी निर्देश है :
“ऐकाश्रम्यं त्वाचार्याः प्रत्यक्षविधानाद् गार्हस्थ्यस्य”—१. ३. ३५
वर्णान्तरगमनमुत्कर्षापकर्षाभ्यां सप्तमे पञ्चमे वाऽऽचार्याः—१. ४. १८.
अन्य सूत्रकारों ने भी दूसरे धर्मशास्त्रकारों का सामान्य अभिधान से या नामतः उल्लेख किया है। पतंजलि ने भी “धर्मशास्त्रं च तथा” एवं जैमिनि ने भी “शूद्रश्च धर्मशास्त्रत्वात्”—पूर्वमीमांसा ६. ७. ६. वाक्यों द्वारा धर्मसूत्रों का निर्देश किया है और जैसा कि डा० काणे ने इन प्रमाणों से निष्कर्ष निकाला है “धर्मशास्त्र यास्क के पूर्व उपस्थित थे, कम से कम ई० पू० ६००-३०० के पूर्व तो वे थे ही और ईसा की द्वितीय शताब्दी में वे मानव आचार के लिए सबसे बड़े प्रमाण माने जाते थे ।”
—धर्मशास्त्र का इतिहास, प्रथम खण्ड, अनु० आचार्य काश्यप, पृ० ८ ।
सूत्र ग्रन्थों और श्लोकबद्ध धर्मग्रन्थों के आपेक्षिक काल के विषय में विद्वानों में मतभेद और विवाद है। प्रो० माक्स म्यूलेर एवं दूसरे विद्वान् यथा डा० भण्डारकर यह मानते हैं कि सूत्रों की रचना के बाद अनुष्टुम् छन्द वाले धर्मग्रन्थों