गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Gautama Dharmasutra Hindi
महर्षि गौतम द्वारा
स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)
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यही नहीं एक आधुनिक मनोवैज्ञानिक की तरह धर्मसूत्रकार कामभावना के विकारों एवं असामान्य यौनाचारों का उल्लेख भी करता है और यह संकेत करता है कि अप्राकृतिक यौनाचार भी समाज में प्रचलित था। काममनोविज्ञान का वेत्ता इसे दमित भावना की विकृत अभिव्यक्ति की कहेगा। गौतमधर्मसूत्र में ऐसे स्थलों के लिए देखिए : ३. ४. ३६ पृ० २३४, ३. ५. १२ पृ० २४०, ३. ६. ५ पृ० २५५ तथा ३. ३. ७ पृ० २६० ।
ब्रह्मचर्य की महत्ता सर्वोपरि है, किन्तु उसके भंग होने पर प्रायश्चित्त द्वारा पाप से मुक्ति हो जाती है। धर्मसूत्र की दृष्टि में काम की मूलभावना का उपयोग केवल सन्तान प्राप्ति के लिये, सदाचारी पुत्र की प्राप्ति के लिए होना चाहिए। इसी लिए इसके नियमन की आवश्यकता है और विवाह की व्यवस्था को अपूर्व महत्ता दी गयी है। गौतमधर्मसूत्र का तो यही सन्देश है कि निरन्तर धर्म, अर्थ और काम को सफल बनाना चाहिए और इसमें धर्म प्रधान है, उसी के अनुकूल अर्थ और काम भी होने चाहिए।
“न पूर्वाह्नमध्यंदिनापराह्णानफलान्कुर्याद्यथाशक्ति धर्मार्थकामेभ्यः”
१. ९. ५४ ।
गौतमधर्मसूत्र में वर्णाश्रमधर्म
भारतीय धर्म में मानवजीवन सुव्यवस्थित हैं और उसके उद्देश्य निर्धारित हैं, जीवन का मार्ग स्पष्टतः अनुरेखित है। इस धर्म में जीवन जी लेने का ही नाम नहीं है, अपितु उसका आकलन तो व्यक्ति के धर्म से है, कर्म से है। केवल यथासंभव सुख के साधन जुटाकर पार्थिव जीवन को और वर्तमान को सुखी बना लेना उसका उद्देश्य नहीं। इस धर्म में जीवन कर्म का जीवन माना गया है, एक पारलौकिक जीवन की प्राप्ति के लिए दीक्षा का काल माना गया है। सम्पूर्ण भौतिक जीवन आध्यात्मिक जीवन की तैयारी है। इसी कारण तो जीवन को धर्ममय, दर्शनमय कहा गया है। आध्यात्मिक जीवन की तैयारी तो इस जीवन के आरम्भ से ही चलती है, परन्तु उसके लिए विशेष समय भी निर्धारित किया गया है।
हिन्दू धर्म में प्रत्येक व्यक्ति के, प्रत्येक अवस्था के और प्रत्येक अवसर के कर्तव्य निर्धारित हैं जिससे उनके विषय में भ्रम या स्वेच्छाचारिता की गुञ्जाइश नहीं, हालांकि साथ ही साथ मनुष्य के हित “स्वस्य च प्रियमात्मनः” को भी महत्त्व दिया गया है। अभ्युदय और निःश्रेयस् की सिद्धि के लिए हिन्दू धर्म में जीवन की जो “प्लैंनिंग” की गयी है उसी का नाम आश्रम है। उचित समय पर उचित कर्म करना और दत्तचित्त होकर कर्म करना लक्ष्य की प्राप्ति का मूलमन्त्र है। सम्पूर्ण जीवन कर्तव्यमय है, श्रममय है। आश्रम शब्द का ही अर्थ है : श्रम का जीवन। आश्राम्यन्ति अस्मिन् आश्रमः। व्यक्ति के प्रतिदिन के कार्य का मानो एक “टाइमटेबुल” ही आश्रम की व्यवस्था के अन्तर्गत बना दिया गया है जिसके अन्तर्गत एक निश्चित समय तक एक निश्चित कार्य किया और फिर दूसरे कार्य में लग गये। एक कालावधि में भौतिक जीवन का रसास्वादन किया तो दूसरे में