गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Gautama Dharmasutra Hindi
महर्षि गौतम द्वारा
स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( २९ )
प्रसंगों में वर्ण के आधार पर या कुल के आधार पर सम्मान का पात्र ठहराया गया है। विद्याध्ययन करने वाले, सदाचारी एवं धार्मिक व्यक्ति का सर्वोपरि स्थान है और उसे विशेषाधिकार भी दे दिये गये हैं जो दूसरों को नहीं मिल पाते हैं। गुरु की सेवा में व्यक्ति के अपने स्वाभिमान का विचार नहीं किया गया है, उसकी पूजा देवता की तरह करने, उसका जूठा खाने, शरीर दबाने आदि का नियम भी विद्यार्थी के लिए बताया गया है (पृ० २६) किन्तु ये कार्य गुरु के अतिरिक्त अन्य के लिए विहित नहीं हैं। निम्न व्यक्ति की सेवा गर्हित है। अतिथि सत्कार एक मानवीय धर्म है तथा प्रत्येक आश्रम में मनुष्यपूजक होने का आदेश है किन्तु दूसरी ओर वर्ण का विचार इतना प्रबल है कि शूद्र को मनुष्योचित व्यवहार भी नहीं मिलता और उसे दास बनकर सब प्रकार से पददलित जीवन व्यतीत करना पड़ता है। आगे आश्रमों की व्यवस्था एवं वर्ण के विषय में विचार करते समय धर्मसूत्र के समाज में व्यक्ति का क्या स्थान था इस पर और प्रकाश पड़ेगा।
मनुष्य का अपना जीवन महत्त्वपूर्ण है। सभी प्रकार से अपनी रक्षा करना धर्म है। अतः धर्मसूत्र आदेश देता है कि जिस कार्य में हानि हो, प्राणसंकट हो वह कार्य न करो १. ९. ३२. और सभी उपायों से अपनी रक्षा करो "सर्वत एवात्मानं गोपायेत" १. ९. ३४. । जीवन रक्षा के लिए वर्णाश्रमधर्म का भी उल्लंघन करके कोई भी वृत्ति ग्रहण की जा सकती है और नैतिक नियमों का बन्धन तोड़ा जा सकता है। इस प्रकार धर्मसूत्र की व्यवस्था में धर्मप्रधान होते हुए भी व्यक्ति को भी बहुत कुछ महत्व प्राप्त है। उसे जीने का भी अधिकार दिया गया है और इसी कारण यह विचार किया गया है कि पापों के लिए प्रायश्चित्त नहीं भी किया जा सकता है। सामान्य नियम भी बताया गया है कि समर्थ व्यक्ति आश्रितों की, असहायों, दुर्बलों और शारीरिक विकार वाले मनुष्यों की रक्षा करें, उन्हें भोजन, वस्त्र और सुरक्षा प्रदान करें।
यौनविषयक नैतिकता के विषय में धर्मसूत्रकार की दृष्टि बड़ी कड़ी है, किन्तु अन्य नैतिक भावनाओं के समान ही इस विषय में भी सिद्धान्त और व्यवहार के बीच प्रचुर अन्तर दिखाई पड़ता है। धर्मसूत्र में नारी की स्थिति पर विचार करते हुए हमने इस बात को स्पष्ट करने का प्रयत्न किया है। स्त्री-पुरुष के सम्बन्ध की स्वेच्छाचारिता हमारे धर्मसूत्रकार को निश्चय ही अभीष्ट नहीं है, किन्तु उसे सबसे बड़ी चिन्ता इस बात की है कि उच्चकुलों की मर्यादा और पवित्रता सुरक्षित बनी रहे और वर्णों में उच्च और निम्न का भेद स्त्री-पुरुष के सम्बन्ध का नियमन करे। अपने से निम्न वर्ण के पुरुष के साथ सम्बन्ध रखने वाली स्त्री के लिए तो सरेआम कुत्तों से कटवाकर मार डालने का नियम बनाया गया है। "श्वभिरादयेद्राजा निहीनवर्णगमने स्त्रियं प्रकाशम् । ३. ५. १४ ।
किन्तु हमारे धर्मसूत्रकार को यह पता है कि मनुष्यों की स्वाभाविक कमजोरियाँ समय पाकर उसे अभिभूत कर लेती हैं। महापुरुष भी अपने आचरण में चूक जाते हैं।
"दृष्टो धर्मव्यतिक्रमः साहसं च महताम् ।"