भारतकोश
गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Gautama Dharmasutra Hindi

महर्षि गौतम द्वारा

स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished360 पृष्ठ

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मांसभक्षण के लिए हिंसा निन्दित बतायी गयी है। अनेकानेक पक्षियों एवं मछलियों के भक्षण को विहित किया गया है ( २. ३. ३५) जिनके भक्षण के लिए हिंसा आवश्यक है इसमें सन्देह नहीं। मांसभक्षण तो संन्यासी भी कर सकता था। १. ३. ३०। इस प्रकार धर्मसूत्र में अहिंसा की नैतिक भावना मांसभक्षण के निषेध तक सीमित नहीं है। हिंसा सामान्यतः निन्दित है किन्तु व्यवहार में उसका कठोर पालन नहीं दिखाई पड़ता।

दया, परोपकार, क्षमा आदि उत्तम मानवीय गुणों की प्रशंसा धर्मसूत्र में आचार और आश्रमधर्म के सन्दर्भ में अनेकशः की गयी है। "दया सर्वभूतेषु क्षान्तिरनसूया शौचमनायासो मंगलमकार्पण्यमस्पृहेति"। १. ८. २४। ये आठ आत्मगुण बताये गये हैं : दया, क्षमाशीलता, दूसरों की समृद्धि में न जलना, जिस कार्य को करने में अपनी हानि हो वह न करना, मंगल का आचरण करना, दीनता न दिखाना और लालच न करना। इन गुणों को प्राप्त करना लौकिक तथा पारलौकिक दृष्टि से आवश्यक है। इसी प्रकार १. ९. ७३ में सहिष्णुता, क्षमाशीलता, दृढ़ निश्चय एवं संयम को आवश्यक गुण बताया गया है। समर्थ होने पर भी किसी मारे जाते हुए दुर्बल व्यक्ति की रक्षा न करने पर उतना ही दोष होता है, जितना उस व्यक्ति को मारने वाले का होता है। "दुर्बलहिंसायां च विमोचनशक्तश्चेत्" ३. ३. १९। संन्यासी के लिए तो यह अनिवार्य आचार है कि वह लोभ का त्याग कर दे, संयम रखे और कष्ट देने वाले तथा अनुग्रह करने वाले दोनों पर समान दृष्टि रखे "समो भूतेषु हिंसानुग्रहयोः"। यह समदृष्टि भारतीय दर्शन में महत्त्व रखती है और जीवन में इसका व्यवहार दार्शनिक एवं तत्वज्ञ की महान् योग्यता समझी जाती है। इन्द्रियों के प्रवाह में पड़कर उन पर विजय प्राप्त करना और उन्हें ऊँचे आदर्शों और लक्ष्यों की ओर उन्मुख करना ही ब्रह्मचर्य का और सामान्य भारतीय धर्म का मुख्य लक्ष्य है, दर्शन का मूलमन्त्र है। नैष्ठिक ब्रह्मचारी इसी लक्ष्य की प्राप्ति में रत तपस्वी है, जिसके नियम धर्मसूत्र में मिलते हैं। स्वाभाविक मलप्रवृत्तियों को नियन्त्रित करके उन्हें धर्म की सिद्धि में नियोजन ही धर्मग्रन्थ का उपदेश और आदेश है।

परोपकार के साथ-साथ दुःखी और रोगी को दान देने का भी आदेश है। दानविषयक व्यवस्था के मूल में एक उत्तम धार्मिक भावना है, सत्कर्म में अध्ययन में लगे हुए का एवं दुःखी व्यक्ति की सहायता। आगे चलकर दान केवल प्रायश्चित्त का अङ्ग हो जाता है और पाप से मुक्ति पाने का आडम्बरपूर्ण साधन बना लिया जाता है। किन्तु हमारे धर्मसूत्र में १. ५. १८ दानपात्र की योग्यता पर विचार किया गया है और गुरु के लिए, विवाह कर्म के लिये, रोगी को, हीनवृत्ति वाले को और अध्ययन में रत व्यक्ति को दान देने की व्यवस्था की गयी है। अधार्मिक कार्य के लिए कदापि दान नहीं देना चाहिए, यह भी गौतमधर्मसूत्र में स्पष्ट कहा गया है।

स्वाभिमान और व्यक्ति की प्रतिष्ठा पर भी इस धर्मसूत्र में यत्रतत्र प्रकाश पड़ता है, हालां कि सामान्यतः व्यक्ति को उसके आचरण के आधार पर तथा अनेक