गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Gautama Dharmasutra Hindi
महर्षि गौतम द्वारा
स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)
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पाप लगता है। किन्तु इन सब नियमों के बावजूद यदि असत्यभाषण से किसी प्राणी की रक्षा होती हो तो झूठ बोलने का दोष नहीं होता—"न तु पापीयसो जीवनम्" २. ४. २५। इसी प्रकार विवाह, मैथुन और उपहास में तथा रोगी व्यक्ति को सान्त्वना देने के लिए झूठ बोला जाय तो कोई पाप नहीं होता—"विवाह-मैथुननर्मार्तसंयोगेष्वदोषमेकेऽनृतम्" ३. ५. २९। किन्तु गुरु के विषय में तो कदापि असत्यभाषण नहीं करना चाहिए। असत्यभाषण के लिए तीन दिन-रात के व्रत का भी नियम है ३. ५. २७। इसी प्रकार क्रोधी, अत्यन्त प्रसन्न, भय से आकुल, रोगी, लोभी, बालक, अत्यन्त वृद्ध, मूढ, मत्त और उन्मत्त व्यक्ति के वचन यदि असत्य हों तो भी उनसे कोई पाप नहीं होता। १. ५. २०। संभवतः धर्मसूत्रकार मनो-वैज्ञानिक कारणों को दृष्टिगत करके ऐसी स्थिति में असत्य भाषण को अपराध नहीं मानता। सत्यभाषण की यह नैतिक भावना भी सन्तुलित दिखाई पड़ती है, भले ही उसके तुलनात्मक अपराधों के विषय में कुछ असंगति दृष्टिगोचर होती है।
सत्यभाषण के साथ-साथ शुभवचन एवं दूसरों को कष्ट न देने वाले वचन बोलना आचार का एक अनिवार्य अङ्ग है। वाणी का संयम आवश्यक है : वाक्चक्षुः कर्मसंयतः ९. ३. १६। शूद्र के लिए भी सत्यभाषण का आदेश है : "तस्यापि सत्यमक्रोधो शौचम्" २. १. ५२।
सत्यभाषण की तरह अहिंसा की धारणा भी धर्मसूत्र में कुछ नये रूप में आती है। भारतीय संस्कृति के "जिओ और दूसरों को जीने दो" या "आत्मनःप्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्" की भावना ही अहिंसा की नैतिक व्यवस्था को धर्मशास्त्रीय आचारव्यवस्था में बार-बार दुहराती है, किन्तु साथ ही साथ धर्मसूत्र में अहिंसा के विषय में भी कुछ विलक्षणता पायी जाती है। वैदिक कार्यों के लिए तथा अतिथि के लिए पशु का वध धर्मसंमत है—वध्याश्च धर्मार्थे २. ८. ३७। इसी प्रकार युद्ध में की गयी हिंसा का कोई पाप नहीं होता : "न दोषो हिंस्यामाहवे" किन्तु युद्ध में भी दुर्बल, भीरु, कमजोरी बताने वाले विपक्षी का वध न करने का आदेश है। युद्ध की हिंसा लोक की रक्षा के लिए होती है अतः वह विहित है, पाप का कारण नहीं है। गौतमधर्मसूत्र १. ९. ७३ में कहा गया है कि मनुष्य को नित्य अहिंसाशील, मृदु, अर्थात् सहिष्णु, या क्षमाशील होना चाहिये, दृढ़निश्चयी, संयमी और दानशील होना चाहिये। मनुष्य के ये प्रमुख गुण हैं और उनमें अहिंसा मुख्य है "नित्यम-हिंस्रो मृदुदृढकारी दमदानशीलः। ब्रह्मचारी के लिए हिंसा न करने का स्पष्ट आदेश है १. २. २३। अहिंसा के प्रति धर्मसूत्र के विलक्षण दृष्टिकोण का आभास पाप और प्रायश्चित्त के सन्दर्भ में मिलता है। मनुष्यों की हत्या से पाप होता है किन्तु उस पाप का अनुपात हत व्यक्ति के वर्ण के अनुसार होता है। सामान्यतः पशुओं का वध करना पाप का कारण बताया गया है किन्तु वह पाप उनकी उपयोगिता और आकार के अनुसार कहा गया है। सबके लिए प्रायश्चित्त का विधान है। धर्मसूत्र की दृष्टि में वेश्या के वध का कोई पाप या प्रायश्चित्त नहीं होता और इसी प्रकार नपुंसक की हत्या का पाप केवल एक आदमी से चलने लायक पुआल का दान कर देने पर छूट जाता है। मांसभक्षण का भी पूर्णतः निषेध नहीं किया गया है, परन्तु