भारतकोश
गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Gautama Dharmasutra Hindi

महर्षि गौतम द्वारा

स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished360 पृष्ठ

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( २६ )

है कि दण्ड का निर्णय अपराध के बाहरी पहलू के आधार पर किया गया है, आन्तरिक पहलू के आधार पर नहीं।

“Closely connected with all this is the fact that the offences enumerated are all overt acts. Judgement is passed not on the inner but on the outer side of the act.

—Hindu Ethics, p. 56

चोरी एक बहुत बड़ा अपराध है और उसके लिये मृत्यु भी दण्ड के रूप में मिलती है। चोर के लिए यह प्रायश्चित्त बताया गया है कि वह मूसल हाथ में लेकर राजा के समीप जाकर अपना अपराध बतावे और राजा उसी मूसल से मारे, यदि उससे उसकी मृत्यु हो जाती है तो वह पाप से छूट जाता है। २. ३. ४० और राजा चाहे तो छोड़ भी सकता है किन्तु ऐसी स्थिति में राजा स्वयं पाप का भागी होता है। अतः यह स्पष्ट कहा गया है कि अपराधी पर दया नहीं करनी चाहिए। यहाँ एक बात उल्लेखनीय है कि धर्मसूत्र में अपराध के निर्धारण में संगति और एकरूपता नहीं है जैसे चोरी के लिए दो प्रकार के दण्ड बताये गये हैं एक तो आर्थिक दण्ड है और दूसरा प्रायश्चित्त के रूप में मृत्युदण्ड। चोर को सहायता देने वाला भी चोर के समान अपराधी होता है : “चोरसमः सचिवो मतिपूर्वः” और अधर्म से धन ग्रहण करने वाला बेईमान व्यक्ति भी चोर के समान अपराधी होता है। अपराध और दण्ड के सन्दर्भ में धर्मसूत्रकार कभी तो अपराध से घृणा के सिद्धान्त से चलता है तो वह कभी अपराधी से घृणा को अपने निर्णय का आधार बनाता है। कुल मिलाकर वह नैतिकता के एक सैद्धान्ति और व्यावहारिक विचारभेद के संघर्ष में पड़ा हुआ प्रतीत होता है।

सत्यभाषण और सत्य आचरण का नैतिक नियम भी पाप और प्रायश्चित्त एवं अपराध और दण्ड के समान धर्मसूत्रकार के विवेचन का विषय है। सत्यभाषण के महत्त्व को धर्मसूत्र प्रत्येक अवसर पर जोर देता है। सत्यभाषण ब्रह्मचारी का प्राथमिक नियम है “सत्यवचनम्” १. २. १३। सामान्यतः मनुष्य को सत्यवचन वाला और सत्य स्वभाव वाला अर्थात् ईमानदार होना चाहिए। “सत्यधर्मा” १. ९. ६८। सत्यभाषण से स्वर्ग की प्राप्ति होती है और असत्य बोलने से नरक मिलता है : “स्वर्गः सत्यवचने विपर्यये नरकः” २. ४. ७। सत्यभाषण एक महान् तप है, वैसे ही जैसे ब्रह्मचर्य एक महान् तप है। ३. १. १५। असत्यभाषण से होने वाले पापों के विषय में भी धर्मसूत्र का विवेक विलक्षण है। असत्यभाषण का पाप उस व्यक्ति या वस्तु के अनुसार होता है जिसके सम्बन्ध में झूठ बोला जाता है। यहां भी वस्तु या व्यक्ति की योग्यता के आधार पर या उपयोगिता के आधार पर पाप बताये गये हैं। छोटे पशुओं के विषय में न्यायव्यवहार होने पर झूठ बोलने से पाप नहीं होता। यदि साक्षी के झूठ बोलने पर किसी व्यक्ति का वध होता हो तो साक्षी को उस जाति के एक हजार मनुष्यों के वध का पाप लगता है। २. ४. १५। भूमि के विषय में असत्य बोलने पर तो सम्पूर्ण मानव जाति के वध का पाप होता है। इसी प्रकार जल के और मैथुन के विषय में असत्य बोलने पर भी