गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Gautama Dharmasutra Hindi
महर्षि गौतम द्वारा
स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( २५ )
सामने सभी बराबर हैं तथा अपराध, अपराधी की शक्ति और अपराध में उसकी प्रवृत्ति का विचार करके दण्ड देना चाहिए, इस बात का उद्घोष सिद्धान्त के रूप में किया गया है : “पुरुषशक्त्यपराधानुबन्धविज्ञानदण्डविनियोगः।” २. ३. ४८ । यही नहीं यह भी कहा गया है कि उच्चवर्ण का व्यक्ति यदि अपराध करता है तो उसे अधिक दण्ड देना चाहिए, यह स्वाभाविक भी है। जैसा कि हरदत्त ने अपनी टीका में कहा है, यदि अन्धा व्यक्ति कुएँ में गिरता है तो वह दया का पात्र होता है दण्ड या ताड़ना का भागी नहीं होता । इसी प्रकार धर्म के मर्म को समझने वाला अपराध करता है तो स्वभावतः उसका दोष गुरु होता है। “निषेधदोषं ज्ञात्वाऽपि प्रवर्तमानस्य दोषाधिक्यं भवति । अजानतस्त्वन्धकूपपतनवदनुग्रहोऽस्ति।”इसी कारण धर्मसूत्रकार गौतम ने यह कहा है कि शूद्र यदि चोरी करे तो उस धन का आठ गुना दण्ड होता है और उससे उच्च वर्ण का व्यक्ति उत्तरोत्तर दुगुना दण्ड का भागी होता है “द्विगुणोत्तराणीतरेषां प्रतिवर्णम् ।” किन्तु यह विषय का केवल एक पहलू है। दूसरी ओर वर्ण की विचारणा इतनी प्रमुख हो जाती है कि एक ही अपराध के लिए ब्राह्मण को कोई दण्ड नहीं मिलता जब कि शूद्र को अंगभंग और मृत्य तक का दण्ड भोगना पड़ता है । उदाहरण के लिये यदि शूद्र वाणी से किसी उच्चवर्ण वाले अर्थात् द्विजाति का अपमान कर लेता है तो उसकी जीभ काट लेने का दण्ड बताया गया है और यदि शरीर के किसी अन्य अंग से प्रहार करता है तो उस अंग को काट लेने का दण्ड है।
“शूद्रो द्विजातीनभिसंधायाभिहत्य च वाग्दण्डपारुष्याभ्यामंगमोच्यो येनोपहन्यात्” २. ३. १.
इसी प्रकार यदि शूद्र किसी उच्चवर्ण वाली स्त्री के साथ व्यभिचार करता है तो उसकी जननेन्द्रिय कटवा लेने का दण्ड है और यदि वह उस स्त्री का रक्षक नियुक्त किया गया हो तो इस अपराध के लिए उसका वध भी हो सकता है। आगे हम देखेंगे कि इसके विपरीत इस प्रकार के दण्ड के लिए उच्चवर्ण के व्यक्ति के लिए कोई दण्ड नहीं था, कुछ मामूली प्रायश्चित्त ही थे। दण्ड के विषय में सबसे बड़ा अन्याय तो वहाँ दिखाई पड़ता है जब शूद्र के कान में वेदमन्त्र पड़ने के अपराध में उसके कान में शीशा और जस्ता भर देने का नियम है और यदि वह वेदमन्त्र का उच्चारण करता है तो उसकी जीभ काटने का दण्ड है। यदि वह मन्त्र धारण करता है तो उसके शरीर को काट लेने का दण्ड बताया गया है। “अथ हास्य वेदमुपशृण्वतस्त्रपुजतुभ्यां श्रोत्रप्रतिपूरणमुदाहरणे जिह्वाच्छेदो धारणे शरीरभेदः ।” इसके विपरीत यदि ब्राह्मण शूद्र का तिरस्कार करता है तो कोई दण्ड उसे नहीं मिलता। ब्राह्मण के बारे में तो यह घोषणा कर दी गयी है कि, “न शारीरो ब्राह्मणदण्डः” २. ३. ४३ ब्राह्मण को कोई शारीरिक दण्ड नहीं मिलना चाहिए। बड़े से बड़े अपराध, गुरुपत्नीगमन और सुरापान जैसे महा अपराध के लिए भी उसे देश से निष्कासित करने का दण्ड मात्र है । धर्मसूत्र में अपराध और दण्ड-विषयक इन मान्यताओं के सन्दर्भ में मेकेंजी का यह कथन ठीक ही प्रतीत होता