गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Gautama Dharmasutra Hindi
महर्षि गौतम द्वारा
स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)
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परलोक की प्राप्ति। वह लोक की अपेक्षा परलोक की अधिक परवाह करता है और सभी लौकिक कर्मों को इस लिए करने का आदेश देता है कि उनसे परलोक मिलने की संभावना है। यह धर्मभीरुता और ईश्वर या परलोक का भय मनुष्य के आचरण को निरन्तर सही दिशा की ओर प्रेरित करता रहा है, किन्तु हम धर्मसूत्र में देखते हैं कि पाप-प्रायश्चित्त और अपराध-दण्ड की नैतिक भावनाओं के ऊपर भी वर्ण का विचार हावी हो जाता है। यदि कोई क्रोध में आकर ब्राह्मण के ऊपर हाथ या हथियार उठाता है तो वह सौ वर्ष तक स्वर्ग नहीं पाता, यदि उस पर प्रहार कर देता है तो वह एक हजार वर्ष तक स्वर्ग पाने से रह जाता है। उसके प्रहार से ब्राह्मण का खून बहे तो उसके खून से जितने रजकण भींगते हैं उतने वर्षों तक वह स्वर्ग नहीं पाता।
“अभिक्रुद्धावगोरणं ब्राह्मणस्य वर्षशतमस्वर्ग्यम् । निघाते सहस्रम् । लोहितदर्शने यावतस्तत्प्रस्कन्द्य पांसून्संगृह्णीयात् ॥ ३. ३. २०–२२
जानबूझकर ब्राह्मण की हत्या करने वाला मृत्यु का भागी होता है। उसे कठोर प्रायश्चित्त करना होता है। किन्तु यदि वह ब्राह्मण की प्राणरक्षा करे या उसके धन की रक्षा करे तो वह पाप से छूट जाता है : “प्राणलाभे वा तन्निमित्ते ब्राह्मणस्य” ३. ४. ७। ब्राह्मण की हत्या का असफल प्रयत्न करने पर भी वही पाप और प्रायश्चित्त होता है जो उसके वध का तथा ब्राह्मण की पत्नी के गर्भ का नाश करनेपर भी वही पाप होता है। किन्तु दूसरी ओर अन्य वर्ण के व्यक्तियों के वध पर पाप कम होता है। शूद्र की हत्या का तो यही प्रायश्चित्त है कि साल भर व्रत करके दश गाय और एक सांड़ का दान कर दे बस पाप से छुटकारा मिल जाता है। जितना पाप एक गाय के वध का होता है उससे भी कम पाप शूद्र के वध का होता है। गाय का वध वैश्य के वध के बराबर बताया गया है और इसी प्रकार मेढक, नेवला, कौआ, कृकलास, चूहा, छछून्दर के एक साथ वध का पाप भी शूद्र के वध के पाप से बढ़कर होता है। बिना अस्थिवाले एक सहस्र जीवों का वध भी शूद्र के वध से अधिक पापयुक्त होता है। ३. ४. १८-१९।
इसी प्रकार अन्य पापकर्मों और उनके प्रायश्चित्त के विषय में भी धारणाएँ कुछ असंगतिपूर्ण हैं। कुल मिलाकर पाप से विरक्ति का ध्येय बनाया गया है और निरन्तर इस बात का ध्यान दिया गया है कि प्रायश्चित्त का भय दिखाकर पाप से दूर करने का उपाय किया जाय।
अपराध और दण्ड की नैतिक भावना भी धर्मसूत्र में सर्वत्र व्याप्त है और उसके सन्दर्भ में भी बहुत कुछ वैसी मान्यतायें हैं जैसी पाप और प्रायश्चित्त के विषय में। समाज में राजा इसी लिए होता है कि वह धर्मभ्रष्ट लोगों को दण्ड देकर उन्हें सही मार्ग पर ले आवे : “चलतश्चैतान्स्वधर्मे स्थापयेत्” २. २. १० धर्मसूत्र में प्रायः विवेचित अपराधों में अधिकतर सामान्य व्यवहार, चोरी, दूसरे के साथ छल, और व्यभिचार के अपराधों का उल्लेख है। अपराध के लिए दण्डकी व्यवस्था में भी अपराधी के वर्ण का विचार सर्वोपरि आ जाता है, यद्यपि धर्म या कानून के