गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Gautama Dharmasutra Hindi
महर्षि गौतम द्वारा
स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 28, कुल 360 में से
संदर्भ में पढ़ें( २३ )
जिस समय उसने आचार का विवेक छोड़कर केवल पद और कुल को आधार बनाया तब से वह अपनी अच्छाइयों से वियुक्त हो गयी। जब पद के अनुसार सम्मान प्राप्त होने लगता है, आचरण और योग्यता के अनुसार नहीं तब स्वाभाविक है कि उस पद पर पहुँचने के लिए न तो योग्यता की कोई इच्छा या प्रयत्न करेगा और न उस पद को प्राप्त कर लेने पर अयोग्य या आचारहीन व्यक्ति योग्यता की चर्चा होने देगा, उल्टे वह ऐसी व्यवस्था करेगा कि उसका पद सदैव सुरक्षित रहे। इसके लिए वह धर्म के नाम पर अपने चारों ओर कटीले तारों की दीवार खड़ी करेगा। ऐसी ही व्यवस्था का रूप वर्णव्यवस्था ने ले लिया।
धर्मशास्त्र की दृष्टि में आचार का इतना महत्त्व है कि आचारहीन पिता तक का परित्याग करने का आदेश दिया गया है :
“त्यजेत्पितरं राजघातकं शूद्रयाजकं शूद्रार्थयाजकं वेदविप्लावकं
भ्रूणहनं यश्चान्त्यावसायिभिः सह संवसेदन्त्यावसायिन्यां वा ।”
\hfill ३. २. १. पृ० २०७
ऐसे व्यक्ति के सामाजिक अपमान का विधान भी इसी बात का संकेत करता है कि आचार से च्युत व्यक्ति को समाज में सामाजिक जीवन व्यतीत करने का अधिकार नहीं है। उससे भाषण या संबन्ध करने वाले व्यक्ति को भी दुराचार में प्रोत्साहन देने के लिए दण्ड की व्यवस्था की गयी है, किन्तु उसके प्रायश्चित्त कर लेने पर तथा अपना आचरण सुधार लेने पर पुनः समाज में प्रवेश करने का द्वार खोल दिया गया है।
पाप और प्रायश्चित्त की धारणा के पीछे भी आचार के अतिरिक्त और क्या हो सकता है ? समाज में जीने और दूसरों को जीने देने का मन्त्र ही इस लोक में कल्याण का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। हमारे धर्मसूत्र में व्यक्ति को पर्याप्त महत्त्व मिला है। किन्तु इस महत्त्व की शर्त है कि वह आचार या धर्म का पालन करे। यदि वह आचार का उल्लङ्घन करता है तो उसे जीने का अधिकार नहीं, उसे पाप से तभी मुक्ति हो सकती है जब वह प्रायश्चित्त करे, अर्थात् पाप गम्भीर हो तो जीवन का अन्त कर दे, क्योंकि ऐसा व्यक्ति समाज के अन्य लोगों के लिए एक बुरा उदाहरण प्रस्तुत करेगा। हमारा धर्मसूत्र कहता है कि इस संसार में मनुष्य बुरे कर्मों से पाप से सन जाता है : “अथ खल्वयं पुरुषो याप्येन कर्मणा लिप्यते... ३. १. २.। और तब मनुष्य के ये कर्म स्थायी फल उत्पन्न करते हैं। पाप और प्रायश्चित्त का विचार धर्मसूत्र में नितान्त भौतिक या व्यावहारिक है। इनका सीधा संबन्ध शरीर की यातना से है किन्तु पाप करने वाला साधन भी तो शरीर ही है। साथ ही साथ प्रायश्चित्त की मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमि यह है कि जप और दान तो साक्षात् उत्तम विचार और परोपकार की प्रेरणा देते हैं। पाप का प्रकाशन और पश्चाताप भी हो जाता है। तप, उपवास और होम धर्म में आस्था उत्पन्न करके पुनः उत्तम आचरण की प्रेरणा देते हैं। किन्तु यह मानना पड़ेगा कि धर्म-सूत्रकार का प्रायश्चित्त का विधान करते समय साक्षात् प्रयोजन है लोक और