गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Gautama Dharmasutra Hindi
महर्षि गौतम द्वारा
स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)
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है कि दण्ड का निर्णय अपराध के बाहरी पहलू के आधार पर किया गया है, आन्तरिक पहलू के आधार पर नहीं।
“Closely connected with all this is the fact that the offences enumerated are all overt acts. Judgement is passed not on the inner but on the outer side of the act.
—Hindu Ethics, p. 56
चोरी एक बहुत बड़ा अपराध है और उसके लिये मृत्यु भी दण्ड के रूप में मिलती है। चोर के लिए यह प्रायश्चित्त बताया गया है कि वह मूसल हाथ में लेकर राजा के समीप जाकर अपना अपराध बतावे और राजा उसी मूसल से मारे, यदि उससे उसकी मृत्यु हो जाती है तो वह पाप से छूट जाता है। २. ३. ४० और राजा चाहे तो छोड़ भी सकता है किन्तु ऐसी स्थिति में राजा स्वयं पाप का भागी होता है। अतः यह स्पष्ट कहा गया है कि अपराधी पर दया नहीं करनी चाहिए। यहाँ एक बात उल्लेखनीय है कि धर्मसूत्र में अपराध के निर्धारण में संगति और एकरूपता नहीं है जैसे चोरी के लिए दो प्रकार के दण्ड बताये गये हैं एक तो आर्थिक दण्ड है और दूसरा प्रायश्चित्त के रूप में मृत्युदण्ड। चोर को सहायता देने वाला भी चोर के समान अपराधी होता है : “चोरसमः सचिवो मतिपूर्वः” और अधर्म से धन ग्रहण करने वाला बेईमान व्यक्ति भी चोर के समान अपराधी होता है। अपराध और दण्ड के सन्दर्भ में धर्मसूत्रकार कभी तो अपराध से घृणा के सिद्धान्त से चलता है तो वह कभी अपराधी से घृणा को अपने निर्णय का आधार बनाता है। कुल मिलाकर वह नैतिकता के एक सैद्धान्ति और व्यावहारिक विचारभेद के संघर्ष में पड़ा हुआ प्रतीत होता है।
सत्यभाषण और सत्य आचरण का नैतिक नियम भी पाप और प्रायश्चित्त एवं अपराध और दण्ड के समान धर्मसूत्रकार के विवेचन का विषय है। सत्यभाषण के महत्त्व को धर्मसूत्र प्रत्येक अवसर पर जोर देता है। सत्यभाषण ब्रह्मचारी का प्राथमिक नियम है “सत्यवचनम्” १. २. १३। सामान्यतः मनुष्य को सत्यवचन वाला और सत्य स्वभाव वाला अर्थात् ईमानदार होना चाहिए। “सत्यधर्मा” १. ९. ६८। सत्यभाषण से स्वर्ग की प्राप्ति होती है और असत्य बोलने से नरक मिलता है : “स्वर्गः सत्यवचने विपर्यये नरकः” २. ४. ७। सत्यभाषण एक महान् तप है, वैसे ही जैसे ब्रह्मचर्य एक महान् तप है। ३. १. १५। असत्यभाषण से होने वाले पापों के विषय में भी धर्मसूत्र का विवेक विलक्षण है। असत्यभाषण का पाप उस व्यक्ति या वस्तु के अनुसार होता है जिसके सम्बन्ध में झूठ बोला जाता है। यहां भी वस्तु या व्यक्ति की योग्यता के आधार पर या उपयोगिता के आधार पर पाप बताये गये हैं। छोटे पशुओं के विषय में न्यायव्यवहार होने पर झूठ बोलने से पाप नहीं होता। यदि साक्षी के झूठ बोलने पर किसी व्यक्ति का वध होता हो तो साक्षी को उस जाति के एक हजार मनुष्यों के वध का पाप लगता है। २. ४. १५। भूमि के विषय में असत्य बोलने पर तो सम्पूर्ण मानव जाति के वध का पाप होता है। इसी प्रकार जल के और मैथुन के विषय में असत्य बोलने पर भी
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पाप लगता है। किन्तु इन सब नियमों के बावजूद यदि असत्यभाषण से किसी प्राणी की रक्षा होती हो तो झूठ बोलने का दोष नहीं होता—"न तु पापीयसो जीवनम्" २. ४. २५। इसी प्रकार विवाह, मैथुन और उपहास में तथा रोगी व्यक्ति को सान्त्वना देने के लिए झूठ बोला जाय तो कोई पाप नहीं होता—"विवाह-मैथुननर्मार्तसंयोगेष्वदोषमेकेऽनृतम्" ३. ५. २९। किन्तु गुरु के विषय में तो कदापि असत्यभाषण नहीं करना चाहिए। असत्यभाषण के लिए तीन दिन-रात के व्रत का भी नियम है ३. ५. २७। इसी प्रकार क्रोधी, अत्यन्त प्रसन्न, भय से आकुल, रोगी, लोभी, बालक, अत्यन्त वृद्ध, मूढ, मत्त और उन्मत्त व्यक्ति के वचन यदि असत्य हों तो भी उनसे कोई पाप नहीं होता। १. ५. २०। संभवतः धर्मसूत्रकार मनो-वैज्ञानिक कारणों को दृष्टिगत करके ऐसी स्थिति में असत्य भाषण को अपराध नहीं मानता। सत्यभाषण की यह नैतिक भावना भी सन्तुलित दिखाई पड़ती है, भले ही उसके तुलनात्मक अपराधों के विषय में कुछ असंगति दृष्टिगोचर होती है।
सत्यभाषण के साथ-साथ शुभवचन एवं दूसरों को कष्ट न देने वाले वचन बोलना आचार का एक अनिवार्य अङ्ग है। वाणी का संयम आवश्यक है : वाक्चक्षुः कर्मसंयतः ९. ३. १६। शूद्र के लिए भी सत्यभाषण का आदेश है : "तस्यापि सत्यमक्रोधो शौचम्" २. १. ५२।
सत्यभाषण की तरह अहिंसा की धारणा भी धर्मसूत्र में कुछ नये रूप में आती है। भारतीय संस्कृति के "जिओ और दूसरों को जीने दो" या "आत्मनःप्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्" की भावना ही अहिंसा की नैतिक व्यवस्था को धर्मशास्त्रीय आचारव्यवस्था में बार-बार दुहराती है, किन्तु साथ ही साथ धर्मसूत्र में अहिंसा के विषय में भी कुछ विलक्षणता पायी जाती है। वैदिक कार्यों के लिए तथा अतिथि के लिए पशु का वध धर्मसंमत है—वध्याश्च धर्मार्थे २. ८. ३७। इसी प्रकार युद्ध में की गयी हिंसा का कोई पाप नहीं होता : "न दोषो हिंस्यामाहवे" किन्तु युद्ध में भी दुर्बल, भीरु, कमजोरी बताने वाले विपक्षी का वध न करने का आदेश है। युद्ध की हिंसा लोक की रक्षा के लिए होती है अतः वह विहित है, पाप का कारण नहीं है। गौतमधर्मसूत्र १. ९. ७३ में कहा गया है कि मनुष्य को नित्य अहिंसाशील, मृदु, अर्थात् सहिष्णु, या क्षमाशील होना चाहिये, दृढ़निश्चयी, संयमी और दानशील होना चाहिये। मनुष्य के ये प्रमुख गुण हैं और उनमें अहिंसा मुख्य है "नित्यम-हिंस्रो मृदुदृढकारी दमदानशीलः। ब्रह्मचारी के लिए हिंसा न करने का स्पष्ट आदेश है १. २. २३। अहिंसा के प्रति धर्मसूत्र के विलक्षण दृष्टिकोण का आभास पाप और प्रायश्चित्त के सन्दर्भ में मिलता है। मनुष्यों की हत्या से पाप होता है किन्तु उस पाप का अनुपात हत व्यक्ति के वर्ण के अनुसार होता है। सामान्यतः पशुओं का वध करना पाप का कारण बताया गया है किन्तु वह पाप उनकी उपयोगिता और आकार के अनुसार कहा गया है। सबके लिए प्रायश्चित्त का विधान है। धर्मसूत्र की दृष्टि में वेश्या के वध का कोई पाप या प्रायश्चित्त नहीं होता और इसी प्रकार नपुंसक की हत्या का पाप केवल एक आदमी से चलने लायक पुआल का दान कर देने पर छूट जाता है। मांसभक्षण का भी पूर्णतः निषेध नहीं किया गया है, परन्तु
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मांसभक्षण के लिए हिंसा निन्दित बतायी गयी है। अनेकानेक पक्षियों एवं मछलियों के भक्षण को विहित किया गया है ( २. ३. ३५) जिनके भक्षण के लिए हिंसा आवश्यक है इसमें सन्देह नहीं। मांसभक्षण तो संन्यासी भी कर सकता था। १. ३. ३०। इस प्रकार धर्मसूत्र में अहिंसा की नैतिक भावना मांसभक्षण के निषेध तक सीमित नहीं है। हिंसा सामान्यतः निन्दित है किन्तु व्यवहार में उसका कठोर पालन नहीं दिखाई पड़ता।
दया, परोपकार, क्षमा आदि उत्तम मानवीय गुणों की प्रशंसा धर्मसूत्र में आचार और आश्रमधर्म के सन्दर्भ में अनेकशः की गयी है। "दया सर्वभूतेषु क्षान्तिरनसूया शौचमनायासो मंगलमकार्पण्यमस्पृहेति"। १. ८. २४। ये आठ आत्मगुण बताये गये हैं : दया, क्षमाशीलता, दूसरों की समृद्धि में न जलना, जिस कार्य को करने में अपनी हानि हो वह न करना, मंगल का आचरण करना, दीनता न दिखाना और लालच न करना। इन गुणों को प्राप्त करना लौकिक तथा पारलौकिक दृष्टि से आवश्यक है। इसी प्रकार १. ९. ७३ में सहिष्णुता, क्षमाशीलता, दृढ़ निश्चय एवं संयम को आवश्यक गुण बताया गया है। समर्थ होने पर भी किसी मारे जाते हुए दुर्बल व्यक्ति की रक्षा न करने पर उतना ही दोष होता है, जितना उस व्यक्ति को मारने वाले का होता है। "दुर्बलहिंसायां च विमोचनशक्तश्चेत्" ३. ३. १९। संन्यासी के लिए तो यह अनिवार्य आचार है कि वह लोभ का त्याग कर दे, संयम रखे और कष्ट देने वाले तथा अनुग्रह करने वाले दोनों पर समान दृष्टि रखे "समो भूतेषु हिंसानुग्रहयोः"। यह समदृष्टि भारतीय दर्शन में महत्त्व रखती है और जीवन में इसका व्यवहार दार्शनिक एवं तत्वज्ञ की महान् योग्यता समझी जाती है। इन्द्रियों के प्रवाह में पड़कर उन पर विजय प्राप्त करना और उन्हें ऊँचे आदर्शों और लक्ष्यों की ओर उन्मुख करना ही ब्रह्मचर्य का और सामान्य भारतीय धर्म का मुख्य लक्ष्य है, दर्शन का मूलमन्त्र है। नैष्ठिक ब्रह्मचारी इसी लक्ष्य की प्राप्ति में रत तपस्वी है, जिसके नियम धर्मसूत्र में मिलते हैं। स्वाभाविक मलप्रवृत्तियों को नियन्त्रित करके उन्हें धर्म की सिद्धि में नियोजन ही धर्मग्रन्थ का उपदेश और आदेश है।
परोपकार के साथ-साथ दुःखी और रोगी को दान देने का भी आदेश है। दानविषयक व्यवस्था के मूल में एक उत्तम धार्मिक भावना है, सत्कर्म में अध्ययन में लगे हुए का एवं दुःखी व्यक्ति की सहायता। आगे चलकर दान केवल प्रायश्चित्त का अङ्ग हो जाता है और पाप से मुक्ति पाने का आडम्बरपूर्ण साधन बना लिया जाता है। किन्तु हमारे धर्मसूत्र में १. ५. १८ दानपात्र की योग्यता पर विचार किया गया है और गुरु के लिए, विवाह कर्म के लिये, रोगी को, हीनवृत्ति वाले को और अध्ययन में रत व्यक्ति को दान देने की व्यवस्था की गयी है। अधार्मिक कार्य के लिए कदापि दान नहीं देना चाहिए, यह भी गौतमधर्मसूत्र में स्पष्ट कहा गया है।
स्वाभिमान और व्यक्ति की प्रतिष्ठा पर भी इस धर्मसूत्र में यत्रतत्र प्रकाश पड़ता है, हालां कि सामान्यतः व्यक्ति को उसके आचरण के आधार पर तथा अनेक
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प्रसंगों में वर्ण के आधार पर या कुल के आधार पर सम्मान का पात्र ठहराया गया है। विद्याध्ययन करने वाले, सदाचारी एवं धार्मिक व्यक्ति का सर्वोपरि स्थान है और उसे विशेषाधिकार भी दे दिये गये हैं जो दूसरों को नहीं मिल पाते हैं। गुरु की सेवा में व्यक्ति के अपने स्वाभिमान का विचार नहीं किया गया है, उसकी पूजा देवता की तरह करने, उसका जूठा खाने, शरीर दबाने आदि का नियम भी विद्यार्थी के लिए बताया गया है (पृ० २६) किन्तु ये कार्य गुरु के अतिरिक्त अन्य के लिए विहित नहीं हैं। निम्न व्यक्ति की सेवा गर्हित है। अतिथि सत्कार एक मानवीय धर्म है तथा प्रत्येक आश्रम में मनुष्यपूजक होने का आदेश है किन्तु दूसरी ओर वर्ण का विचार इतना प्रबल है कि शूद्र को मनुष्योचित व्यवहार भी नहीं मिलता और उसे दास बनकर सब प्रकार से पददलित जीवन व्यतीत करना पड़ता है। आगे आश्रमों की व्यवस्था एवं वर्ण के विषय में विचार करते समय धर्मसूत्र के समाज में व्यक्ति का क्या स्थान था इस पर और प्रकाश पड़ेगा।
मनुष्य का अपना जीवन महत्त्वपूर्ण है। सभी प्रकार से अपनी रक्षा करना धर्म है। अतः धर्मसूत्र आदेश देता है कि जिस कार्य में हानि हो, प्राणसंकट हो वह कार्य न करो १. ९. ३२. और सभी उपायों से अपनी रक्षा करो "सर्वत एवात्मानं गोपायेत" १. ९. ३४. । जीवन रक्षा के लिए वर्णाश्रमधर्म का भी उल्लंघन करके कोई भी वृत्ति ग्रहण की जा सकती है और नैतिक नियमों का बन्धन तोड़ा जा सकता है। इस प्रकार धर्मसूत्र की व्यवस्था में धर्मप्रधान होते हुए भी व्यक्ति को भी बहुत कुछ महत्व प्राप्त है। उसे जीने का भी अधिकार दिया गया है और इसी कारण यह विचार किया गया है कि पापों के लिए प्रायश्चित्त नहीं भी किया जा सकता है। सामान्य नियम भी बताया गया है कि समर्थ व्यक्ति आश्रितों की, असहायों, दुर्बलों और शारीरिक विकार वाले मनुष्यों की रक्षा करें, उन्हें भोजन, वस्त्र और सुरक्षा प्रदान करें।
यौनविषयक नैतिकता के विषय में धर्मसूत्रकार की दृष्टि बड़ी कड़ी है, किन्तु अन्य नैतिक भावनाओं के समान ही इस विषय में भी सिद्धान्त और व्यवहार के बीच प्रचुर अन्तर दिखाई पड़ता है। धर्मसूत्र में नारी की स्थिति पर विचार करते हुए हमने इस बात को स्पष्ट करने का प्रयत्न किया है। स्त्री-पुरुष के सम्बन्ध की स्वेच्छाचारिता हमारे धर्मसूत्रकार को निश्चय ही अभीष्ट नहीं है, किन्तु उसे सबसे बड़ी चिन्ता इस बात की है कि उच्चकुलों की मर्यादा और पवित्रता सुरक्षित बनी रहे और वर्णों में उच्च और निम्न का भेद स्त्री-पुरुष के सम्बन्ध का नियमन करे। अपने से निम्न वर्ण के पुरुष के साथ सम्बन्ध रखने वाली स्त्री के लिए तो सरेआम कुत्तों से कटवाकर मार डालने का नियम बनाया गया है। "श्वभिरादयेद्राजा निहीनवर्णगमने स्त्रियं प्रकाशम् । ३. ५. १४ ।
किन्तु हमारे धर्मसूत्रकार को यह पता है कि मनुष्यों की स्वाभाविक कमजोरियाँ समय पाकर उसे अभिभूत कर लेती हैं। महापुरुष भी अपने आचरण में चूक जाते हैं।
"दृष्टो धर्मव्यतिक्रमः साहसं च महताम् ।"
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यही नहीं एक आधुनिक मनोवैज्ञानिक की तरह धर्मसूत्रकार कामभावना के विकारों एवं असामान्य यौनाचारों का उल्लेख भी करता है और यह संकेत करता है कि अप्राकृतिक यौनाचार भी समाज में प्रचलित था। काममनोविज्ञान का वेत्ता इसे दमित भावना की विकृत अभिव्यक्ति की कहेगा। गौतमधर्मसूत्र में ऐसे स्थलों के लिए देखिए : ३. ४. ३६ पृ० २३४, ३. ५. १२ पृ० २४०, ३. ६. ५ पृ० २५५ तथा ३. ३. ७ पृ० २६० ।
ब्रह्मचर्य की महत्ता सर्वोपरि है, किन्तु उसके भंग होने पर प्रायश्चित्त द्वारा पाप से मुक्ति हो जाती है। धर्मसूत्र की दृष्टि में काम की मूलभावना का उपयोग केवल सन्तान प्राप्ति के लिये, सदाचारी पुत्र की प्राप्ति के लिए होना चाहिए। इसी लिए इसके नियमन की आवश्यकता है और विवाह की व्यवस्था को अपूर्व महत्ता दी गयी है। गौतमधर्मसूत्र का तो यही सन्देश है कि निरन्तर धर्म, अर्थ और काम को सफल बनाना चाहिए और इसमें धर्म प्रधान है, उसी के अनुकूल अर्थ और काम भी होने चाहिए।
“न पूर्वाह्नमध्यंदिनापराह्णानफलान्कुर्याद्यथाशक्ति धर्मार्थकामेभ्यः”
१. ९. ५४ ।
गौतमधर्मसूत्र में वर्णाश्रमधर्म
भारतीय धर्म में मानवजीवन सुव्यवस्थित हैं और उसके उद्देश्य निर्धारित हैं, जीवन का मार्ग स्पष्टतः अनुरेखित है। इस धर्म में जीवन जी लेने का ही नाम नहीं है, अपितु उसका आकलन तो व्यक्ति के धर्म से है, कर्म से है। केवल यथासंभव सुख के साधन जुटाकर पार्थिव जीवन को और वर्तमान को सुखी बना लेना उसका उद्देश्य नहीं। इस धर्म में जीवन कर्म का जीवन माना गया है, एक पारलौकिक जीवन की प्राप्ति के लिए दीक्षा का काल माना गया है। सम्पूर्ण भौतिक जीवन आध्यात्मिक जीवन की तैयारी है। इसी कारण तो जीवन को धर्ममय, दर्शनमय कहा गया है। आध्यात्मिक जीवन की तैयारी तो इस जीवन के आरम्भ से ही चलती है, परन्तु उसके लिए विशेष समय भी निर्धारित किया गया है।
हिन्दू धर्म में प्रत्येक व्यक्ति के, प्रत्येक अवस्था के और प्रत्येक अवसर के कर्तव्य निर्धारित हैं जिससे उनके विषय में भ्रम या स्वेच्छाचारिता की गुञ्जाइश नहीं, हालांकि साथ ही साथ मनुष्य के हित “स्वस्य च प्रियमात्मनः” को भी महत्त्व दिया गया है। अभ्युदय और निःश्रेयस् की सिद्धि के लिए हिन्दू धर्म में जीवन की जो “प्लैंनिंग” की गयी है उसी का नाम आश्रम है। उचित समय पर उचित कर्म करना और दत्तचित्त होकर कर्म करना लक्ष्य की प्राप्ति का मूलमन्त्र है। सम्पूर्ण जीवन कर्तव्यमय है, श्रममय है। आश्रम शब्द का ही अर्थ है : श्रम का जीवन। आश्राम्यन्ति अस्मिन् आश्रमः। व्यक्ति के प्रतिदिन के कार्य का मानो एक “टाइमटेबुल” ही आश्रम की व्यवस्था के अन्तर्गत बना दिया गया है जिसके अन्तर्गत एक निश्चित समय तक एक निश्चित कार्य किया और फिर दूसरे कार्य में लग गये। एक कालावधि में भौतिक जीवन का रसास्वादन किया तो दूसरे में
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भौतिक सुखों का त्यागकर अक्षय शान्ति की खोज में निकल पड़े । एक पीढ़ी ने अपना एक कार्य पूरा किया, उसके आनन्दों और फलों का भोग किया और वह आगे बढ़ गयी । उसने दूसरी पीढ़ी को स्थान दिया । इस विभाजन और व्यवस्था से न तो कहीं असन्तोष उत्पन्न हुआ, न तो उनमें कोई संघर्ष हुआ। इस व्यवस्था के अभाव ने वर्तमान समाज में कितनी बुराइयाँ उत्पन्न की हैं सर्वविदित है । जीवन के अन्त तक पद का लोभ और उस पद को बनाये रखने के लिए होनहार लोगों का दमन एवं शोषण पुराने लोगों का एक खास हथकंडा बन गया है । ऐसे लोग जितने पुराने हैं, इस चाल में उतने ही कुशल हैं और वे उतने ही दीर्घकालतक पद के साथ-चिपटे रहने में सफल होते हैं। अधिकार और पद के लोभी बुजुर्ग एक लंगड़ी और असन्तुष्ट पीढ़ी का निर्माण करेंगे, जिसे योग्यता के विकास का अवसर नहीं मिल पायगा और जो उन पुराने ठेकेदारों के हाथ में खिलौना होगी, जिस पर वे मनमानी कर सकते हैं, प्रलोभन देकर अपना अधिक से अधिक काम निकाल सकते हैं। धर्मशास्त्रों की मौलिक आश्रमव्यवस्था में इन बुराइयों के लिए जगह नहीं थी । आश्रमव्यवस्था के पीछे जो उदात्त भावना है वह सार्वभौम है । भारतीय संस्कृति की यह विशेषता अद्वितीय है और धर्मशास्त्रकारों की दूरदर्शिता, व्यावहारिकता, बोध और चिन्तन की स्पष्टता का प्रमाण है ।
इस आश्रमव्यवस्था को धर्मसूत्रकारों ने स्पष्टतः गौरव प्रदान किया है। वर्णाश्रमधर्म से हीन व्यक्ति पतित होता है और ऐसे पतित के साथ बोलना भी निषिद्ध है । वर्णाश्रमधर्म से हीन व्यक्ति का समाज में कोई स्थान नहीं है, वह किसी प्रकार का सम्मान प्राप्त करने का अधिकारी भी नहीं होता। १. ९. १७ । कर्मों के विभाजन का अनुशीलन न किया जाय तो आर्य और अनार्य में कोई भेद नहीं रह जाता । सभी वर्ण समान हो जाते हैं और सबके समान होने पर लोकव्यवस्था नहीं चल पाती, अस्तव्यस्तता उत्पन्न हो जाती है । “आर्याणार्ययोर्व्यतिषेषकर्मणः साम्यम्” । गौतमधर्मसूत्र २ १. ६९ । इस आश्रम व्यवस्था के अन्तर्गत विहित कर्म को करना कर्तव्य है और जो व्यक्ति उस आचरण का पालन नहीं करता वह राजा द्वारा दण्ड का भागी होता है। उसे किसी प्रकार की सम्पत्ति का अधिकार नहीं रह जाता और वह केवल जीवन चलाने योग्य भोजन ही राजा के यहाँ से प्राप्त करता है । “शिष्टाचारणे प्रतिषिद्धसेवायां च नित्यं चैल्पिण्डादूर्ध्वं स्वहरणम्” । २. ३. २४ ।
धर्मशास्त्रों में मनुष्यजीवन चार आश्रमों में विभक्त किया गया है—ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास। गौतमधर्मसूत्र में इन आश्रमों को इस क्रम में और इन नामों से गिनाया गया है—ब्रह्मचारी, गृहस्थ, भिक्षु, वैखानस । आश्रमों का इतिहास देखकर यह ज्ञात होता है कि आश्रम के विषय में धर्मशास्त्रकारों के विचार एक से नहीं हैं। इसे अलग-अलग नाम दिया गया है और इन आश्रमों का आपेक्षिक महत्त्व भी भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण से किया गया है। उदाहरण के लिए कुछ आचार्यों ने एक ही आश्रम-गृहस्थाश्रम को वास्तविक बताया है। बौधायन की दृष्टि में भी अन्य सब आश्रम काल्पनिक हैं २. ६. १७ । हमारे धर्मसूत्रकार गौतम ने भी गृहस्थाश्रम को ही महत्त्व दिया है और उसे ही प्रथम स्थान दिया
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है। धर्मशास्त्रों के पूर्व उपनिषदों में यह बात स्पष्ट की गई है कि मोक्ष प्राप्त करने के लिए वैराग्य या निर्वेद धारण करना चाहिये। बृहदारण्यक ५।१ और मुण्डक० १।२।१२ इस प्रकार ये आश्रम स्वाभाविक रूप में थे इसमें सन्देह नहीं। इन्हें व्यवस्थित रूप धर्मशास्त्रकारों ने दिया और प्रत्येक आश्रम के दैनिक कर्मों का विस्तार से गिनाया। सारे समाज के लिए वर्णाश्रमधर्म के नाम से संविधान तैयार किया।
सभी आश्रमों में गृहस्थाश्रम को स्वाभाविक रूप में अधिक महत्त्व प्राप्त है। यह आश्रम वास्तविक लौकिक कर्म और श्रम का जीवन है और अन्य आश्रम इसी पर आश्रित होते हैं। ब्रह्मचर्य इसी जीवन की विशेष तैयारी है जिसमें ज्ञान के साथ संयम और आचार की शिक्षा दी जाती है। ब्रह्मचर्य अनुशासन और ज्ञानार्जन का जीवन है। गृहस्थाश्रम की उपक्रमणिका है। गौतमधर्मसूत्र में १. ३. १ और १. ३. ३५ में इस आश्रम की प्रधानता को स्वीकारा गया है। किन्तु साथ ही साथ यह भी कहा गया है कि जीवन की शिक्षा पाकर ब्रह्मचारी कोई भी आश्रम ग्रहण कर सकता है। ब्रह्मचर्य जीवन से वास्तविक आचार और धर्म का जीवन प्रारम्भ होता है। उसके पूर्व के जीवन में कोई आचार का नियम नहीं है और छूट है। ब्रह्मचर्य के बाद गृहस्थजीवन स्वीकारने का कारण यह है कि यह आश्रम ही सन्तानउत्पत्ति का आश्रम है और सन्तान का महत्त्व धर्मसूत्र में सर्वोपरि है। इस कारण गृहस्थाश्रम का वरण करना धर्म की दृष्टि से आवश्यक है किन्तु ब्रह्मचारी इस आश्रम का त्याग कर नैष्ठिक ब्रह्मचारी का जीवन भी व्यतीत कर सकता और सारा जीवन ज्ञानार्जन तथा तत्त्वचिन्तन में लगा सकता है। ब्रह्मचारी को भोग-विलास की वस्तुओं की और बाह्य अलंकरणों से दूर रहने का आदेश है, यहां तक कि स्वच्छता के नियमों में भी अनेक को वर्जित किया गया है। संभवतः इस कारण कि इस जीवन का मुख्य लक्ष्य है भोगविलास और भौतिक आनन्द की कल्पना न करना, केवल विद्यार्जन में ही तल्लीन रहना। मन को अपने लक्ष्य में लगाने के लिये मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमि जीवन के प्रत्येक कार्य से बनती है। इन्हीं भोगविलास और सुखदायी उपकरणों को, वस्त्रादि के अलंकरण को गृहस्थ के लिए विहित किया गया है, क्योंकि वहां यह आवश्यक मनोवैज्ञानिक वातावरण प्रस्तुत करने में सहायक है। इस प्रकार के ब्रह्मचारी को समाज में सम्मान का स्थान मिला है और वैसे ब्रह्मचारी की राजा प्रत्येक तरह से रक्षा करता है। उसकी सहायता और भरणपोषण समाज के सभी अंग करते हैं।
ऊपर कहा जा चुका है कि गौतमधर्मसूत्र में गृहस्थाश्रम को अन्य आश्रमों से अधिक महत्त्व दिया गया है। यह स्पष्टतः कहा गया है कि “ऐक्याश्रम्यं त्वाचार्याः। प्रत्यक्षविधानाद् गार्हस्थ्यस्यैव”। १. ३. ३५.। प्रायः सभी संस्कार इसी आश्रम में सम्पादित होते हैं और यही आश्रम मानवजाति के विकास के लिए उसकी प्रजनन की प्रवृत्ति को सन्तुलित और संयमित करने का आश्रम है। गृहस्थ का धर्म है : “देवपितृमनुष्यर्षिपूजकः” हो अर्थात् सभी उस पर आश्रित होते हैं। गृहस्थाश्रम समाज की पहली इकाई है और समाज का सही निर्माण इसी जीवन में
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होता है। इसमें आचार के नियम बहुत व्यापक हैं। दान देना और अतिथि सत्कार करना तो गृहस्थाश्रम का मुख्य धर्म है। दुःखी, रोगी, निर्धन और विद्याध्ययन में रत व्यक्ति की सहायता करना इस आश्रम का परम मानवीय कर्तव्य है। गृहस्थ अपने आश्रितों का भरणपोषण करता है। वह अतिथि, बालक, रोगी, गर्भवती स्त्री, घर में रहने वाली पुत्रियों और बहनों तथा वृद्धों और सेवकों को भोजन देकर स्वयं भोजन करता है १.५.२३ और इस प्रकार वह एक महान् परोपकारमय जीवन जीता है। धर्मसूत्र में गृहस्थ के लिए शुद्धता के अनेक नियम दिये गये हैं। उसे स्नान और सुगन्धि के लेप से स्वयं को पवित्र रखने का आदेश दिया गया है। उसे दूसरों के वस्त्र आदि का उपयोग नहीं करना चाहिए। अभावग्रस्त होने पर वह शुद्ध करके उपयोग कर सकता है। सामान्यतः उसे संयम का जीवन बिताना चाहिए और धर्म के अनुकूल अर्थ और काम का सेवन करना चाहिए। मानसिक पवित्रता रखनी चाहिए।
आश्रमव्यवस्था के अन्तर्गत व्यक्ति का एक सामान्यधर्म है अतिथि का सत्कार और गुरु आदि श्रेष्ठ जनों का आदर। अतिथि की सेवा संन्यासी को भी करनी चाहिए १.३.२८ श्रोत्रिय अतिथि को अपने समान शय्या और आसन देना चाहिए। अपने से हीन अतिथि का भी अपने समान आदर करना सामान्य धर्म है। केवल अपने लिए पकाया हुआ भोजन धर्मसूत्र की दृष्टि में अभोज्य है। एक रात्रि रुकने वाला और मध्याह्नकाल में विश्राम के लिए आनेवाला व्यक्ति अतिथि होता है। श्रेष्ठजनों को आदर देना भी सामान्यधर्म है। माता-पिता का तो किसी भी दशा में अपमान नहीं करना चाहिए "न कर्हिचिन्माता-पित्रोर्वृत्ति" ३.३.१५। गुरुजनों के निकट किसी प्रकार की चपलता नहीं करनी चाहिए १.२.२२ इसके अतिरिक्त गुरु की सेवा का भी नियम बताया गया है। अभिवादन, संभाषण और शिष्टाचार के छोटे-छोटे दैनिक नियम भी धर्मसूत्रों ने बताये हैं। वृद्ध जनों का आदर उनके आचार के आधार पर करने का आदेश है और उनके अनुकूल आचरण करने को बताया गया है। "यच्चात्मवन्तो वृद्धाः सम्यग्विीनीता दम्भ-लोभमोहवियुक्ता वेदविद् आचक्षते तत्समाचरेत्।"
आत्मसम्मान को बनाये रखना और आत्मकल्याण के लिए उद्योग करना गृहस्थाश्रम में अनिवार्य कर्तव्य है। इसी लिए गृहस्थ की हमारे धर्मसूत्र में यह सलाह दी गयी है कि वह उत्तम और उद्यमी व्यक्तियों के साथ निवास करें, जहां जीवनोपयोगी वस्तुएं उपलब्ध हों वहां निवास करे १.९.६५। आत्मसम्मान की दृष्टि से बराबर दूसरे का अन्न न ग्रहण करे "नित्यमभोज्यम्" २.८.८ और न ही तिरस्कारपूर्वक या बिना मांगे दिया हुआ अन्न ग्रहण करे "भावदुष्टम् अयाचितम् च।" २.८.१२। अपने को पीड़ित न करे और अपनी प्रतिष्ठा का निरन्तर ध्यान रखे। यह धर्मसूत्र का गृहस्थ के लिए सामान्य आदेश है।
अन्य आश्रमों के अन्तर्गत संन्यास या भिक्षु को गौतमधर्मसूत्र में महत्त्वपूर्ण माना गया है। वानप्रस्थ या वैखानस को केवल गृहस्थ और संन्यास आश्रमों के बीच की कड़ी कहा जा सकता है। जिस प्रकार गृहस्थाश्रम के लिए ब्रह्मचर्याश्रम विशेष तैयारी का समय है उसी प्रकार संन्यास के लिए तैयारी और
४ गौ० सू०
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दीक्षा का समय है वानप्रस्थ। संन्यास नितान्त आध्यात्मिक उद्देश्य का आश्रम है। जिसका लक्ष्य है भौतिक जगत् के ऐन्द्रिक सुखों से विमुख होकर इन्द्रियों और मन को वश में करके निर्वेद की प्राप्ति। जीवन में भौतिकता और इन्द्रियसुख की प्रधानता का कहीं तो विराम होना चाहिए कहीं सीमा होनी चाहिए क्योंकि ये चिरस्थायी सन्तोष नहीं देते और तब यथार्थ तथ्य का बोधकर परम शान्ति की प्राप्ति ही जीवन की सार्थकता है। अतः इस आश्रमव्यवस्था में संन्यासी जीवन का आध्यात्मिक महत्त्व है, दार्शनिक महत्त्व है।
इस सुन्दर व्यवस्था के होते हुए भी धर्मशास्त्रियों के समय में इनका सही रूप से पालन होता था, इसमें सन्देह है, क्योंकि इन आश्रमों के विषय में धर्मशास्त्रकारों में मतभेद है, जो निश्चय ही व्यावहारिक कारणों से है। किसी भी स्थिति में संन्यास आश्रम सामान्यतः सभी व्यक्ति अपनाते होंगे, ऐसा भी नहीं माना जा सकता। वह तो दार्शनिकों का आश्रम है, तपस्वियों का आश्रम है। संन्यास के नाम पर अकर्मण्यता का जीवन धर्मशास्त्र को अभीष्ट नहीं है।
वर्णव्यवस्था—
भारतीय धर्म या संस्कृति की एक अद्वितीय विशेषता है वर्णव्यवस्था, इसके विषय में बहुत कुछ कहा गया है। कुछ विद्वानों ने तो इसकी प्रशंसा की है और कुछ ने इसके दोषों के ऊपर दृष्टिपात किया है। यह सभी मानते हैं कि मूलतः यह व्यवस्था बुरी नहीं थी। उसके पीछे मनुष्य के आचार और कर्म का विवेक था। इस प्रकार की सामाजिक विभाजन की व्यवस्था किसी न किसी रूप में सभी संस्कृतियों और देशों में मिल सकती है। समाज में भिन्न वर्गों का होना आवश्यक है किन्तु सभी मनुष्य समान उत्पन्न नहीं होते, सभी समान प्रतिभा और समान आदतों के साथ पैदा नहीं होते और समान कार्य नहीं करते। डा० राधाकृष्णन् के शब्दों में मानव समाज भिन्न प्रकार की श्रेणियों से बना है और उनमें सबका अपना महत्त्व है। वे सभी एक सामान्य लक्ष्य को सिद्ध करने में लगे हुए हैं।
"Society is an organism of different grades, and human activities differ in kind and significance. But each of them is of value so long as it serves the common end. Every type has its own nature which should be followed. No one can be at the same time a perfect saint, a perfect artist and a perfect philosopher. Every definite type is limited by boundaries which deprives it of other possibilities." —Hindu View of Life, p. 127
किन्तु भारतीय धर्म के इतिहास में समाज के विभाजन का यह स्वाभाविक आधार शीघ्र ही लुप्त हो जाता है और यज्ञिय विधानों के विकास के साथ ही साथ एक वर्ग को जो मुख्यतः यज्ञ के सम्पादन और विद्याध्ययन में रत है बहुत अधिक प्रधानता मिल जाती है और देवों का स्थान मिल जाता है। परिणामतः
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समाज में एक असन्तुलन का जन्म होता है और यह उच्च वर्ण अपने अधिकारों तथा उच्चस्थान के प्रति लोभी हो जाता है। वर्ण का आधार जन्म हो जाता है। जिस विशाल भव्य संस्कृति के प्रासाद की नींव सुदृढ सिद्धान्तों के ऊपर पड़ी थी उसमें शीघ्र ही दरारें पड़ जाती हैं और आगे चलकर उसपर जो भवन बनता है उसमें कुल मिलाकर परस्पर विरोधी बातें सर्वत्र ही भरी पड़ी दिखाई पड़ती हैं, एकरूपता नहीं हो पाती। शायद समाज के अग्रणी बुद्धिजीवी लोगों का सबसे बड़ा अपराध यह था कि मानव के व्यक्तित्व को न पहचानकर उसके किसी एक वर्ग के व्यक्तित्व का विकास न होने देना। और अपने पद का नाजायज फायदा उठाकर किसी दूसरे के व्यक्तित्व को पंगु बनाकर अपने अधिकार को कायम रखने से बढ़कर कोई सामाजिक पाप नहीं। हिन्दू समाज की बुराइयों का कारण मानव के भाग्य के साथ मानव का यह खिलवाड़ ही है। सभी अपने अपने कर्तव्य का ही ध्यान रखते तो शायद कोई बुराई न होती परन्तु यहाँ तो अधिकारों पर ही दृष्टि जम गयी और उन अधिकारों के लिए अपनी योग्यता को बनाये रखना जरूरी नहीं रह गया। “सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः” की शुभकामना को व्यवहार में कम स्थान मिला। वर्णव्यवस्था की बुराइयाँ यहीं से आरम्भ होती हैं। यह सही है कि मनुष्य अपने वंशपरम्परा और वातावरण का गुणनफल होता है, किन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि उसे वातावरण का परिवर्तन करके अपने व्यक्तित्व का विकास करने का अधिकार ही न रहे। एक विशेष कुल में जन्म लेने के कारण उसे पशु से भी निन्दित समझा जाय। अपने कुल या वंशपरम्परा की शुद्धता के लिए अपने योग्य व्यक्तियों से संबन्ध करना अच्छी और लाभदायक बात है किन्तु व्यक्ति को एक घेरे के भीतर कैद करना, उसमें हीनता की भावना भरकर उसे आश्रित और परतन्त्र बनाकर मानवीय अधिकारों से वंचित कर देना ईश्वर की सृष्टि के प्रति अन्याय है, घोर अपराध है, सामूहिक नरसंहार जैसा पाप है। भारतीयधर्म के अन्तर्गत वर्णव्यवस्था की कुछ बुराइयाँ ऐसी हैं जिन पर पर्दा नहीं डाला जा सकता और जिनके विषय में निश्चित रूप से कतिपय सुधार और परिवर्तन वांछनीय हैं। समय के साथ-साथ ये परिवर्तन हो भी रहे हैं और सामाजिक जीवन की समानता का बोध उत्तरोत्तर बढ़ रहा है।
वैदिक काल में वर्णव्यवस्था अपनी आरम्भिक अवस्था से चलकर पूर्णावस्था पर पहुँच जाती है। यजुर्वेद के काल तक यह पूरा रूप पा लेती है और धर्मसूत्रों में इसी व्यवस्था का अन्तिम रूप दिखाई पड़ता है। कुलों की पवित्रता के ध्यान से धर्मशास्त्रीय ग्रंथों में इस वर्णव्यवस्था के कठोर पालन करने का आदेश दिया गया है और प्रत्येक वर्ण के कर्म निश्चित कर दिये गये हैं जिनसे भ्रष्ट होना सामाजिक पतन का कारण होता है और ऐसा व्यक्ति सम्पत्ति आदि के अधिकार से वंचित हो जाता है। पिछले पृष्ठों में हम देख चुके हैं कि इस वर्णव्यवस्था का कितना व्यापक प्रभाव है। छोटे-छोटे कर्मों में भी वर्णव्यवस्था के आधार पर पार्थक्य स्थापित किया गया है, जिसका कोई औचित्य नहीं दिखायी पड़ता है।
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उदाहरण के लिए यज्ञोपवीत के समय ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य को आयु, दण्ड, आदि के अलावा भिक्षाचरण के लिए संबोधन का भी अलग-अलग नियम बताया गया है। और प्रायश्चित्त, अपराध और दण्ड, मृत्यु या जन्मविषयक अशौच भी वर्णानुसार निर्धारित किया गया है। वर्ण का विचार नैतिक भावना के ऊपर भी हावी होता दिखाई पड़ता है। भोजन और संभाषण के शिष्टाचार आदि में भी वर्ण के विचार को प्राथमिकता दी गयी है। वर्णव्यवस्था की इस कठोरता के बावजूद प्राणरक्षा और जीविका निर्वाह के लिए इसके उल्लङ्घन की भी अनुमति दी गयी है, किन्तु इस बात की चेतावनी दी गयी है कि दूसरे वर्ण के कर्म करते हुए भी उस वर्ण के निन्दित आचरण न अपनाये जायँ। साथ ही वर्ण के उत्कर्ष का भी सिद्धान्त बना दिया गया है जिसके अनुसार असवर्ण यौनसम्बन्धों या विवाहों से उत्पन्न वर्णसंकर सन्तानें निरन्तर कई पीढ़ियों तक उत्कृष्ट वर्ण के कर्म करते हुए उस उत्कृष्ट वर्ण की हो जाती हैं। यह तथ्य जीवविज्ञान और प्राणिशास्त्र के सिद्धान्तों से सिद्ध किया जा चुका है कि किस प्रकार कुछ पीढ़ियों में, विशेषतः सात पीढ़ियों में रक्त में परिवर्तन आ जाता है और मनुष्यजाति नयी हो जाती है, जिसमें अपने विशिष्ट लक्षण भी होते हैं। वर्ण के उत्कर्ष के पीछे कुछ इसी प्रकार का सिद्धान्त कितना वैज्ञानिक प्रतीत होता है। इस प्रकार यह भी देखने को मिलता है कि वर्णव्यवस्था का मूल आधार अब भी विचार में रखा जाता था और कर्म या आचार के अनुसार वर्ण के उत्कर्ष या अपकर्ष का नियम भी प्रचलित था, परन्तु इसे उतना महत्त्व नहीं था, जितना वर्णविषयक रूढियों का।
इसी प्रकार वर्णविषयक सहिष्णुता जीवनोपयोगी वस्तुओं के आदान के संबन्ध में भी है। आत्मपोषण के लिए आवश्यक वस्तुएँ किसी भी वर्ण से भी ग्रहण की जा सकती थीं। संन्यासी सभी वर्णों के यहाँ से भिक्षा ग्रहण कर सकता था। इसी प्रकार ब्रह्मचारी भी भिक्षा सभी वर्ण के गृहस्थों से ले सकता था। किन्तु इससे यह भी लगता है कि ऐसे उल्लेखों में शूद्र वर्ण धर्मशास्त्रों में अभिप्रेत नहीं है। दूध, दही, फल, मधु, मृगमांस, शाक, भुना हुआ अन्न, आदि किसी भी वर्ण के व्यक्ति से लिया जा सकता है, शूद्र से भी ये वस्तुएं ली जा सकती हैं,। गौ० ध० सू० २. ८. ३ यदि किसी अन्य प्रकार से वृत्ति न चले तो शूद्र से जीवननिर्वाह की वस्तु ली जा सकती है: "वृत्तिश्चेन्नान्तरेण शूद्रम्"। में भी कुछ दैनिक जीवन में संबन्धित रहने वाले शूद्र के घर भोजन किया जा सकता है: जैसे नाई, चरवाहा, कुलपरम्परा के मित्र, हलवाहा, परिचारक, आदि: "पशुपालक्षेत्रकर्षककुलसंगतकारयितृपरिचारका भोज्यान्नाः।” २. ८. ६। यज्ञ के समय अब्राह्मण को भी अतिथि के समान सत्कार का अधिकारी माना गया है। इन उल्लेखों से धर्मसूत्र के समय में भी थोड़ी वर्ण विषयक सहिष्णुता के दर्शन होते हैं।
शूद्र की स्थिति—
धर्मशास्त्रों का अवलोकन करते समय वर्णव्यवस्था के संबन्ध में जो बात सबसे अधिक खटकने वाली है वह है शूद्र के प्रति उनका अन्याय और भर्त्सना
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से भरा हुआ दृष्टिकोण। वैदिक काल में धर्मसूत्रों से पूर्व ही शूद्र इच्छानुसार पीटा और मारा जाने वाला तथा केवल सेवावृत्ति में नियुक्त किया जाने वाला (यथाकामवध्यः, कामोत्थाप्यः, अन्यस्य प्रेष्यः) बताया गया है। उसके जीवन की यह नगण्य स्थिति धर्मशास्त्रों में और भी अधिक तुच्छ बन जाती है और वह अपने समूचे अधिकारों से वंचित होकर दास मात्र बन कर रह जाता है। पिछले पृष्ठों में इस बात पर प्रकाश डाला चुका है कि पाप और प्रायश्चित्त, दण्ड और अपराध, अशौच तथा यौनविषयक नैतिकता के संबन्ध में शूद्र के प्रति कितना अन्याय बरता जाता था। गौतमधर्मसूत्र २. १. ६४ में शूद्र का यही धर्म बताया गया है कि वह उच्चवर्णों के लोगों की सेवा करे, द्विजातियों का जूठा भोजन करे और उन्हीं के लिए धन का संचय करे। "तदर्थोऽस्य निचयः स्यात्।" वह कभी भी उच्चवर्ण के समकक्ष होने का साहस न करे। उनके समान मार्ग पर न चले और उनसे बात भी न करे। उनके समान आसन पर बैठने के लिए उसे कठोर दण्ड मिलने का विधान है। इसी प्रकार वह यदि ब्राह्मण का अपमान करता है तो उसकी जीभ, या प्रहार करता है तो शरीर का अंग ही काट देने का दण्ड है। जब कि इन्हीं अपराधों के लिए ब्राह्मण को कोई दण्ड नहीं। शूद्र की पत्नी के साथ उच्चवर्ण के लोग व्यभिचार करें तो उससे केवल कुछ प्रायश्चित्त करना था किन्तु शूद्र को ऐसा व्यभिचार उच्चवर्ण की स्त्री के साथ करने पर जीवन से हाथ धोना पड़ता था। इसी प्रकार वेद का अध्ययन तो दूर रहा, उसका श्रवण भी निषिद्ध था और सुन लेने पर उसका कान सीसे और जस्ते से भर दिया जाता था। शूद्र के वध के प्रायश्चित्त पर दृष्टि डाली जाय तो ज्ञात होगा कि धर्मसूत्र की दृष्टि में शूद्र का महत्व पशु से भी कम है। उच्चवर्ण के व्यक्तियों के साथ किसी भी प्रकार समानता प्राप्त करने की इच्छा करने पर वह दण्ड का ही भागी होता था : "आसनशयनवाक्पथिषु समप्रेप्सुर्दण्ड्यः।"
अस्पृश्यता का बहुत कुछ विकास धर्मग्रन्थों में मिल जाता है, यद्यपि उसका अपवाद भी यत्रतत्र मिलता है। गौतमधर्मसूत्र के अनुसार शूद्र का लाया हुआ जल दूषित हो जाता है और आचमन आदि के योग्य नहीं रह जाता। १. ९. १२। किन्तु ऊपर के कुछ उदाहरणों से वर्णविषयक सहिष्णुता का निर्देश भी किया जा चुका है। अन्य कतिपय आचार्यों ने सामान्यतः शूद्र का भोजन ग्रहण करने को बुरा नहीं माना है मनु ४।२११। प्रायः अस्पृश्यता का कारण पतित होना या महापातक कर्म करना होता था। चाण्डाल जाति के अस्पृश्य होने का उल्लेख है। इसी प्रकार शूद्रा से उत्पन्न पुत्र अस्पृश्य माना गया है। उनका दर्शन, स्पर्श और प्रतिग्रह वर्जित है। १. ४. २२-२३ इसी प्रकार प्रतिलोम विवाह से उत्पन्न निम्नवर्ण के पुरुष और उच्चवर्ण की स्त्री से उत्पन्न पुत्र धर्महीन और पतित एवं अस्पृश्य कहे गये हैं : "प्रतिलोमास्तु धर्महीनाः।"
प्रायः शूद्र के लिए धार्मिक संस्कार विहित नहीं है, और केवल एक आश्रम गृहस्थाश्रम ही विहित है। अतः कुछ आचार्यों ने उसके लिए पञ्चमहायज्ञ का विधान किया है। "पाकयज्ञैः स्वयं यजेत्" गौ० ध० सू० २. १. ६७। किन्तु शूद्र
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के लिए भी आचार का विधान है। वह भी आश्रित जनों का भरण-पोषण करे। सत्यभाषण करे और क्रोध न करे पवित्रता के नियम का पालन करे। “तस्यापि सत्यमक्रोधः शौचम्”। २. १. ५२। इसी प्रकार शूद्र श्राद्धकर्म भी करे। “श्राद्धकर्म” २. १. ५४। अपनी ही पत्नियों में अनुरक्त हो और एक पत्नीव्रत का पालन करे। “स्वदारवृत्तिः” २. १. ५६। शूद्र, की स्थिति में दासप्रथा का पूरा संकेत मिलता है। शूद्र परतन्त्र है, उसे स्वामी की हर हालत में सेवा करनी है। उसके छोटे वस्त्र आदि का ही उपयोग करना है। वैश्वदेव आदि पूजाकर्म में देवता का नाम लेकर नमोनमः कहना ही मन्त्र है। उसे अनार्य कहा गया है, जब कि उससे उच्चवर्ण को आर्य नाम से अभिहित किया गया है, इनके कार्यों में किसी प्रकार की उलटफेर नहीं होनी चाहिए। २. १. ६९।
ब्राह्मण के विशेषाधिकार—
राजा और विद्वान् ब्राह्मण ही व्रतों के कर्म को धारण करने वाले हैं। लोककल्याण और अनुचित कर्म का दण्ड देने के लिए सबको इनके अधीन कर दिया गया है। ब्राह्मण का स्थान राजा से भी बढ़कर है और वह सभी द्वारा पूज्य है। अन्य व्यक्तियों के समान उसे दण्ड नहीं मिलते। वही शारीरिक दण्ड से मुक्त है। राजा उसे छः प्रकार के दण्डों से मुक्त रखता है। वह पीटा नहीं जा सकता, वह हथकड़ी-बेड़ी से बाँधा नहीं जा सकता, उसे धन-दण्ड नहीं मिलना चाहिए, ग्राम या देश से निकाला नहीं जाना चाहिए, उसकी भर्त्सना नहीं होनी चाहिए और उसका त्याग नहीं किया जाना चाहिए “अवध्यश्चाबन्ध्यश्चादण्ड्यश्चाबहिष्कार्यश्चापरिवाद्यश्चापरिहार्यश्चेति।” गौतमधर्मसूत्र १. ८. १३। किंतु यह सब छूट या विशेषाधिकार क्यों ? इसे प्राप्त करने के लिए उस ब्राह्मण की योग्यतायें विचारणीय हैं। ये सारी सुविधायें और विशेषाधिकार नियमतः उस ब्राह्मण को मिलनी चाहिए जो अपने कर्म में रत हो और सभी संस्कारों से संस्कृत, हो उत्तम एवं आदर्श आचरण वाला हो, केवल धर्म का ज्ञान ही न रखता हो, उसका आचरण करता हो “तदपेक्षस्तद्वृत्तिः” १. ८. ७। जिस ब्राह्मण को राजा अपने से श्रेष्ठ आसन पर बैठाता है वह वस्तुतः अपने आचरण और विद्या आदि से उसके योग्य होना चाहिए। अपने मन्त्री या पुरोहित के रूप में वह कैसे ब्राह्मण का चयन करता है : “विद्याभिजनवाग्रूपवयः शीलसंपन्नं न्यायकृतं तपस्विनम्। विद्या में निष्णात, धर्म के ज्ञाता, शीलवान्, न्यायप्रिय और तपस्वी। यदि ऐसे ब्राह्मण को विशेषाधिकार मिलते हैं तो किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। समाज की व्यवस्था करने वाले और सबको सही मार्ग पर प्रेरित करने वाले चिन्तक और विचारक को सबसे बढ़कर सम्मान मिलना ही चाहिए, मिलता ही है। ऐसे ब्राह्मण को किसी के अधीन रखना लोककल्याण की दृष्टि से बुरा होगा और वह उसका पूरा उपयोग नहीं हो पायगा, क्यों कि उसे धर्मकार्य करने कराने की सुविधा नहीं होगी। इसी लिए ब्राह्मण, उपर्युक्त प्रकार का ब्राह्मण राजा के अधीन नहीं होता और करों
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आदि से मुक्त होता है, क्यों कि वह जो भी पुण्यकर्म करता है उसका लाभ राजा को भी मिलता है।
वास्तविक ब्राह्मण की योग्यता पर श्राद्धकालीन भोजन के प्रसंग में भी विचार किया गया है। उन योग्यताओं और अयोग्यताओं की विस्तृत सूची देखने से यह स्पष्ट हो जायगा कि ब्राह्मण वही है जो उत्तम आचरण करता है। आचरण से च्युत होने पर वह ब्राह्मण भोजन का अधिकारी भी नहीं है। सम्मानपूर्ण जीवन व्यतीत करने वाला और सदाचार का पालन करने वाला ही ब्राह्मण समझा जाना चहिए। यदि हम धर्मशास्त्रों की या भारतीय संस्कृति की ब्राह्मण की इस परिभाषा और अर्हता पर विचार करें तो ब्राह्मण से, विद्वान् और सदाचारी, संयमी और गुणवान् से कोई शिकायत नहीं होनी चाहिए। श्रोत्रिय ब्राह्मण को तो सबसे उच्च स्थान दिया गया है जो स्पष्टतः उसकी योग्यता और सामाजिक जीवन में महत्ता के कारण है।
किन्तु मौलिक रूप से ब्राह्मण को जिन कारणों से सर्वोच्च स्थान और अनेक विशेषाधिकार दिये गये थे, वे कालान्तर में वर्णव्यवस्था के रूढ़ और कठोर होने के साथ ही कम विचारणीय होते गये और ब्राह्मण केवल ब्राह्मण कुल में जन्म के आधार पर सम्मान और विशेषाधिकार के लोभी हो गये जिससे समाज में अन्याय और विषमता को स्थान मिला। बड़े से बड़े अपराध के लिए केवल देशनिष्कासन और प्रायश्चित ही उसके लिए दण्ड था, जब कि उसके विद्वान् होने के कारण अधिक दण्ड मिलना ही उचित ठहराया गया है। महापातक कर्मों के लिए केवल शरीर पर चिह्न लगाकर उसे बहिष्कृत किया जाता था। समान ही अपराध के लिए उससे निम्न वर्ण वालों को उससे अधिक दण्ड मिलता था। उसके वध का पाप सबसे बड़ा पाप था। उसे मिला हुआ धन उसकी सन्तान का हो जाता था। उसके बिना उत्तराधिकारी के मरने पर उसका धन श्रोत्रिय ब्राह्मणों को मिलता था ३, १०, ३९ और उसे कोई अब्राह्मण साक्षी के रूप में नहीं बुला सकता था। इनके अतिरिक्त भी ब्राह्मण को नैतिकता के नियमों की अवहेलना करके भी अनेक विशेषाधिकार केवल ब्राह्मण होने के नाम पर मिलने का संकेत भी धर्मसूत्र में दिखाई पड़ते हैं।
राजा और लोकव्यवस्था—
धर्मसूत्र के अनुसार राजा का कार्य है न्यायपूर्वक दण्ड देना ३. १. ८ और दण्ड देकर पथ से विचलित लोगों को पुनः पथ पर लाना। वह विपरीत आचरण वाले को संभालता है। और गुरु भी धर्म के विपरीत कार्य करे तो वह उसे मार्ग पर चलने का आदेश दे सकता है। किन्तु राजा ब्राह्मण के ऊपर शासन नहीं करता वह उसकी सहायता से शासन करता है और उससे परामर्श लेकर धर्म का विधान जानकर न्याय करता है। राजा ब्राह्मण के अतिरिक्त सबका स्वामी होता है "राजा सर्वस्येष्टे ब्राह्मणवर्जम्।" २. २. १। ब्राह्मण की प्रेरणा से कार्य करने वाला राजा समृद्धिशाली होता है।
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“ब्रह्मप्रसूतं हि क्षत्रमृध्यते न व्यथत इति च विज्ञायते ।” २. २. १४। राजा सबका रक्षक होता है और सबकी रक्षा के लिए वह युद्ध करता है। ब्राह्मण यदि धर्म का विधान करने वाला है तो राजा उसका पालन कराने वाला है। इन दोनों के समन्वय से ही लोक की रक्षा होती है और सभी अपने उचित मार्ग पर चलते हैं। यदि राजा अपने कर्म में अयोग्य है और धर्म का पालन नहीं करता तो वह पाप का भागी होता है। दण्ड न देने पर राजा ही पापी होता है। इसी प्रकार यदि व्यवहार में राजा अन्याय करता है तो धर्म की हानि होने से सभी को पाप लगता है—साक्षियों को, न्यायकर्ता को, सभासदों को और राजा को भी। साक्षिसभ्यराजकर्तृषु दोषो धर्मतन्त्रपीडायाम् । २. ४. ११। राजा को समाज में बहुत सम्मान प्राप्त है और वह मधुपर्क द्वारा पूज्य होता है। ब्राह्मण भी उसे उचित सम्मान प्रदान करता है।
धर्मशास्त्रों की लोकव्यवस्था जनतांत्रिक प्रतीत होती है। राजा निरंकुश नहीं है, अपितु वह धर्म के लिए ब्राह्मण पर या योग्य विधिवेत्ताओं पर निर्भर है। न्याय व्यवहार की व्यवस्था और प्रक्रिया तो बहुत ही जनतांत्रिक है और दण्ड देने के पूर्व अपराध के प्रत्येक पहलू पर विचार किया जाता है। न्याय हो, अन्याय न हो यही दण्डव्यवहार का मुख्य लक्ष्य बारबार दुहराया गया लगता है। साक्षी के सत्य भाषण पर बहुत महत्व दिया गया है और उसके असत्यभाषण का पाप और बहुत अधिक बताया गया है। इसी प्रकार परिषद् के निर्णय मान्य ठहराये गये हैं जो एक की प्रकार पंचायत थी। अपने-अपने कर्म में उस कार्य के करने वाले सदाचारी व्यक्तियों के निर्णय को मान्य ठहराया गया है :
“कर्षकवणिक्पशुपालकुसीदिकारवः स्वे स्वे वर्गे ।” २. २. २१। इसी प्रकार राजा को परामर्श दिया गया है कि पेचीदे मामलों में वह अनुभवी और जानकार लोगों की राय लेकर निर्णय करे : “विप्रतिपत्तौ त्रैविद्यवृद्धेभ्यः प्रत्यवहृत्य निष्ठां गमयेत्” २. २. २५।
इस प्रकार कुल मिलाकर धर्मसूत्र की लोकव्यवस्था बहुत ही समन्वयपूर्ण है। समाज के विभिन्न वर्गों में जिस सहयोग का विधान किया गया है वह एक उत्तम उद्देश्य की सिद्धि में सहायक है। ब्राह्मण के अतिरिक्त अन्य वर्ण के लोग क्षत्रिय और वैश्य अपने-अपने कर्म में लगकर धर्म, अर्थ, काम की साधना करें यही सबके लिए धर्मशास्त्र को अभीष्ट है। सभी अपने कर्म में रत हों और सभी अपने योग्य कार्य करें। समाज में सामंजस्य हो और सब मिलकर एक पूर्ण समाज का निर्माण, विकास करें और यही धर्म के अन्तर्गत की गयी वर्णव्यवस्था का मूल उद्देश्य है। परस्पर सहिष्णुता, समन्वय और सहयोग की तथा मानवता की भावनायें ही समाज का उद्धार कर सकती हैं। भारतीय धर्म के इन कल्याणकारी सन्देशों को ग्रहण करके बुराइयों को दूर करके उन्हें भूल जाना ही धर्म का वर्त्तमान लक्ष्य होना चाहिए।
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गौतमधर्मसूत्र में नारी
“अस्वतन्त्रा धर्मे स्त्री”। २.९.१ अर्थात् पति का अनुसरण करना ही स्त्री का धर्म है, वह धर्म में स्वतन्त्र नहीं होतीं। धर्मसूत्र में नारी के धर्म का मूलमन्त्र यह सूत्र ही है। स्त्री पति पर आश्रित रहे और उसका अनुसरण करे इस कथन में धर्मसूत्र कोई नवीनता नहीं प्रस्तुत करते। बार-बार और विशेष बल उसके पुरुषसम्बन्ध-विषयक आचरण पर दिया गया है। गृह्यकर्म में और धार्मिक क्रियाओं में गृहिणी की हैसियत से, सहधर्मिणी की हैसियत से, वह गौरवपूर्ण पद पर प्रतिष्ठित है, किन्तु उसके इस रूप के विषय में कोई उल्लेखनीय विशेषता नहीं है। जहाँ तक पारिवारिक या सामाजिक जीवन में नारी के स्थान का प्रश्न है उसके जीवन का लक्ष्य है पुत्र या सन्तान की उत्पत्ति। पुत्र और सुयोग्य पुत्र की कामना और उसकी अनिवार्यता धर्मशास्त्र की दृष्टि में केवल लौकिक या व्यावहारिक दृष्टि से ही नहीं व्यक्त की गयी है अपितु एक पारमार्थिक या पारलौकिक दृष्टि से भी पुत्रप्राप्ति गृहस्थाश्रम का लक्ष्य बतायी गयी है, क्योंकि सुयोग्यपुत्र वंश की कई पढ़ियों के पाप धो डालता है और अपने पूर्वजों को भी स्वर्ग की प्राप्ति कराता है। “पुनन्ति साधवः पुत्राः” आदि गौ० ध० सू० १. ४. २४-२७ । यह धर्मसूत्र की अपनी कथनशैली है। वस्तुतः इसे यही कहना है कि कुल की पवित्रता और मर्यादा सर्वोपरि है।
धर्मसूत्र की दृष्टि में स्त्री का महत्त्व इसलिए है कि वह मां है, सन्तान की जननी है और तभी तो धर्मसूत्र इस का स्पष्ट संकेत करता है कि सभी श्रेष्ठ जनों में माता सबसे बढ़कर है। “आचार्यश्रेष्ठो गुरूणां मातेत्येके” १. २. ५६ ।
पवित्र सन्तान के लिए स्त्री की पवित्रता अनिवार्य है और इस पवित्रता का संबन्ध कुल की शुद्धता, वैवाहिक संबन्ध की धर्मसम्मतता, और आचरण की श्रेष्ठता से है। सन्तान के जीवन विकास में माता का प्रभाव और योगदान सबसे अधिक होता है और इसी कारण धर्मसूत्र नारी की पवित्रता पर बहुतः गौरव देते हैं। गृहस्थ के लिए, धर्म की रक्षा के लिए तथा जीवन एवं समाज के सन्तुलन के लिए विवाह एक अनिवार्य और श्रेष्ठ व्यवस्था है, अतः धर्मसूत्र विवाह के प्रकार, योग्यता, और वैधता पर विस्तार से विचार करता है। गौतमधर्मसूत्र में भी पत्नी की योग्यता, उसके भिन्न प्रवर के होने, मातृ एवं पितृपक्ष से रक्तसंबंध से दूर होने का विचार करके विवाह के भिन्न भेदों पर दृष्टिपात किया गया है और ब्राह्म, प्राजापत्य, आर्ष और दैव विवाहों को धर्मसंमत्त ठहराया गया है। 'चत्वारो धर्म्याः प्रथमाः । १. ४. १२ ।' अर्थात् वेद के विद्वान्, उत्तम आचरण वाले और एकपत्नीव्रत का पालन करने वाले, अभिभावक द्वारा चुने गये या ऋत्विज वर के साथ कन्या का विवाह श्रेष्ठ है। किन्तु अन्य प्रकार के भी विवाह प्रचलित थे और उनमें या तो युवक और युवती के पारस्परिक प्रेम संबन्ध को या वर एवं कन्या पक्षों के बीच धन का आदान-प्रदान को अथवा पुरुष द्वारा कन्या प्राप्ति के लिए बलप्रयोग को निमित्त बताया गया है। धर्मसूत्र विवाह में इस प्रकार की
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स्वच्छन्दता की अनुमति नहीं देते। हां, कुछ धर्मशास्त्रों में प्रेम या धनदान के निमित्त द्वारा कन्या प्राप्त करके किये गये विवाह को उचित ठहराया गया है इसका संकेत गौतमधर्मसूत्र में किया गया है १. ४. १३।
विवाह की अनिवार्यता पर धर्मसूत्रकार ने इतना बल दिया है कि वह अपनी सभी वर्णविषयक कठोरता को भी भूल जाता है, वह व्यवहार और सिद्धान्त के बीच उलझा सा दिखाई पड़ता है और विवाह के लिए काफी स्वतन्त्रता दे देता है। सवर्णविवाह को श्रेष्ठ बताने के साथ ही वह अनुलोम विवाहों अर्थात् वर से निम्न वर्ण की कन्या के विवाहों को धर्मसंमत करता है, जिससे स्पष्ट है कि वैवाहिक संबन्ध में वर्ण अभी उतना अवरोध नहीं बना था। ब्राह्मण का शूद्र वर्ण की कन्या को पत्नी के रूप में ग्रहण करना धर्मसूत्र को स्वीकार है। १. ४. १४। प्रतिलोम विवाह भी समाज में चलते दिखाई पड़ते हैं, धर्मसूत्र को केवल इस प्रकार के विवाहों से उत्पन्न पुत्रों के ही प्रति सहानुभूति नहीं है। वह उन्हें कोई धार्मिक स्थान समाज में नहीं देता, किन्तु इस बात का मार्ग खुला रखता है कि धर्माचरण से वे अपनी उन्नति करें, उनके वर्ण का उत्कर्ष भी हो सकता है। गौतमधर्मसूत्र प्रतिलोम विवाह पर आघात करने के विचार से ही इस प्रकार से उत्पन्न पुत्र के विषय में कहता है : “प्रतिलोमास्तु धर्महीनाः” और यह भी कहता है कि शूद्रा स्त्री से उत्पन्न पुत्र धर्महीन होता है और शूद्र से उत्पन्न पुत्र पतित होते हैं। उनका दर्शन, स्पर्श और प्रतिग्रह वर्जित है। १.४.२२-२३। किन्तु सम्पत्ति में ऐसे पुत्र को भी अंश मिलता था ३. १० ३७। तथा ब्राह्मण के चारों वर्णों की पत्नियों से उत्पन्न पुत्रों में वर्णानुसार सम्पत्ति का विभाजन होता था। ये बातें इस तथ्य की ओर स्पष्ट संकेत करती हैं कि विवाह के लिए वर्ण के अवरोध की कठोरता में भी नरमी आ सकती थी।
इस विवाह की अनिवार्यता के कारण ही हमारा धर्मसूत्र विवाह योग्य लड़की को यह सुझाव देता है कि यदि उसके माता-पिता उसका विवाह यथासमय नहीं कर देते तो वह स्वयं पिता से प्राप्त अलंकारों का परित्याग करके अपने अनुकूल युवक से विवाह कर ले।
“त्रीन्कुमार्यतूनतीत्य स्वयं युज्येतानिन्दितेनोत्सृज्य पित्र्यानलंकारान्” २. ९. २० विवाह कर्म के लिए समाज के निम्नतम वर्ण से भी, शूद्र वर्ण से व्यक्ति के भी और अपने वर्ण के अनुरूप कार्य न करने वाले से भी धन लिया जा सकता है : “द्रव्यादानं विवाहसिद्धयर्थं धर्मतन्त्रसंयोगे च शूद्रात्” २. ९. २४।
गौतमधर्मसूत्र की दृष्टि में स्त्री के लिए विवाह इतना अनिवार्य है कि सूत्रकार का तो यह मत है कि लड़की जब लज्जा का अनुभव करके वस्त्र पहनने की ओर ध्यान देने लगे तभी उसका विवाह कर देना चाहिए।
विवाह के प्रमुख लक्ष्य सन्तानप्राप्ति के लिए जिस स्त्री को धर्मसूत्र यह आदेश देता है कि वह अपने पति के अतिरिक्त किसी दूसरे के विषय में सोचे भी नहीं। “नातिचरेद्भर्त्तारम्” गौ० धर्म० सू० २. ९. २। और वाणी, नेत्र और कर्म का संयम
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रखे, उसे पति की मृत्यु पर, उसके सन्तानोत्पत्ति के लिए अयोग्य होने पर दूसरे पुरुष से यौवनसंबन्ध से पुत्र उत्पन्न करने का विधान करता है। अपतिरपत्य-लिप्सुर्देवरात्। २. ९. ४। सन्तानोत्पत्ति एक पुण्य कर्म है, धर्म है और धर्मसूत्र की दृष्टि में नैतिकता की भावना इस धर्म के अधीन है। धर्मसूत्र की दृष्टि में स्त्री और पुरुष के संबन्धों का मुख्य प्रेरक धर्म होना चाहिए काम नहीं। इस धर्म की छाया में नारी को धर्मसूत्र ने यथोचित गौरव दिया है, परिवार और समाज में महत्त्वपूर्ण स्थान दिया है। आचार्य की पत्नी आचार्य के समान पूज्य है और उसका नाम न लेने का आदेश दिया गया है :
“आचार्यतत्पुत्रदीक्षितनामानि” १. २. २५। एवं उसका चरणस्पर्श शिष्य के लिए विहित है। विप्रोष्योपसंग्रहणं गुरुभार्याणाम्” १. २. ३९।
किन्तु हमारे धर्मसूत्र में नारी का एक और भी रूप आता है, जब वह किसी भी प्रकार के सम्मान की अधिकारिणी न होकर केवल मनुष्य की एक सम्पत्ति बना दी गयी है। विवाह के पवित्र बन्धन के अलावा उसका एक और भी रूप है, जिस रूप में वह सामान्य मानवोचित न्याय भी पाने की अधिकारिणी नहीं रह गयी है। उदाहरण के लिए सेवावृत्ति करने वाली निम्नवर्ण की दासी एक चल सम्पत्ति दिखाई देती है, उसे खरीदा और बेचा जा सकता है, बन्धक रखा जा सकता है और उत्तराधिकार में प्राप्त किया जा सकता है। इन बातों का संकेत गौतमधर्मसूत्र १. ७. १४ 'पुरुषवशाकुमारीवेहतश्च नित्यम्' तथा १. ७. १६ 'नियमस्तु' में मिलता है। दासी के विषय में विवाद का प्रश्न शीघ्र हल होना चाहिए २. ४. २९ इससे ऐसा पता चलता है कि दासी को लेकर उस समय झगड़े खड़े हो जाते थे और उसका न्यायालय द्वारा निर्णय होता था। बन्धक रखी हुई दासी के विषय में तो बड़ी रोचक बात यह है कि वह जिसके पास बन्धक रखी गयी हो उसके द्वारा भोगी जा सकती है—'पशुभूमिस्त्रीणामनतिभोगः' पृ० २. ३. ३६। इस सूत्र की टीका में हरदत्त ने इसका औचित्य यह कह कर ठहराया है कि अपने घर में रखी हुई काम आने योग्य वस्तु रोज-रोज दिखाई पड़े तो कोई कब तक परहेज और संयम करेगा :
“कथमभन्तरगृहे दृश्यमानां गां स्वयं तक्रादि क्षीवोपयुञ्जान उपेक्षेत,
कथं वा बहुफलमारामं, कथं वा दासीं यौवनस्थामन्वहं परिचारिकाम् ।”
दूसरा उदाहरण है वेश्या और व्यभिचारिणी स्त्री का, जिनका उल्लेख भी धर्मसूत्र में मिलता है। धर्मसूत्रकार की दृष्टि में ऐसी स्त्री के जीवन का कोई मूल्य नहीं। उसका वध कर देने पर भी कोई प्रायश्चित्त करने की जरूरत नहीं पड़ती, अधिक से अधिक एक नीलवृष का दान दे दिया और उसके वध के पाप से छुट्टी मिल गयी। ब्रह्मबन्ध्वां चलनायां नीलः। वैशिके न किंचित्। ३. ४. २६, २७।
धर्मसूत्र की दृष्टि में नारी को जो कुछ संमान प्राप्त है उसके दो आधार हैं—वर्ण और आचरण। निम्नवर्ण की स्त्री के साथ संबन्ध की मनमानी बरती जा सकती है किन्तु उच्चवर्ण की स्त्री के साथ संबन्ध रखने पर उसके भीषण और
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रोमांचकारी परिणाम बताये गये हैं। और कठोर प्रायश्चित्त का विधान किया गया है। जिस बात पर धर्मसूत्र बार-बार जोर देता है वह है स्त्री का आचरण और आचरणहीन स्त्री की प्रत्येक अवसर पर निन्दा की गयी है। ऐसी स्त्री का अन्न अभक्ष्य होता है २. ८. १७ पृ० १८३। पति के अतिरिक्त अन्य पुरुष से संबन्ध रखने वाली स्त्री को एक वर्ष तक कठोर व्रत का जीवन बिताने का नियम है, जिस समय में उसे निन्दित और बहिष्कृत सी होकर अपने पाप का प्रायश्चित करना होता है। जानबूझकर गर्भपात करना भी एक ऐसा कर्म है जो स्त्री को पतित बना देता है और ऐसी स्त्री की दृष्टि यदि भोजन पर पड़े तो भोजन खाने योग्य नहीं रह जाता २. ८. ११। और भ्रूणहत्या करने वाली एवं अपने वर्ण से निम्नवर्ण के पुरुष के साथ संबन्ध वाली स्त्री घोर पातकी होती है : “भ्रूणहनि हीनवर्णसेवायां च स्त्री पतति” ३. ३. ९।
किन्तु धर्मसूत्रकरों की अभंगपूर्ण कठोर दृष्टि के बावजूद भी समाज में स्त्री पुरुष संबन्ध की स्वच्छन्दता चलती रहती है, इसे भी स्वीकारा गया है और नाजायज संबन्ध से उत्पन्न पुत्रों का उल्लेख अनेक स्थलों पर किया गया है। सम्पत्ति के उत्तराधिकार के सन्दर्भ में गूढोत्पन्न पुत्र, जो स्पष्टतः चोरी-छिपे अनुचित संबन्ध से उत्पन्न होता था तथा अविवाहिता स्त्री के पुत्र कानीन को भी सम्पत्ति में अधिकारी बताया गया है। इसी प्रकार विवाह व्यवस्था की कठोरता और पवित्रता के नियमों के बावजूद भी विवाह में स्वच्छन्दता थी, एक पति का परित्याग कर स्त्री दूसरा विवाह कर सकती थी ३. १० ३१। पृ० २८५। पर दो बार और गर्भवती के भी दूसरे पुरुष से विवाह करने का उल्लेख है। कुल मिलाकर यह स्पष्टतः प्रतीत होता है कि धर्मसूत्र एक पुरुष का एक स्त्री के साथ ही और एक स्त्री का एक ही पुरुष के साथ संबन्ध को सीमित करने पर महत्त्व देता है, हलां कि समाज में उसके मान्य विचारों के विपरीत स्थिति भी व्याप्त है।
नारी पर सर्वाधिक दृष्टिपात यौनविषयक नैतिकता के सन्दर्भ में किया गया है। स्त्री-पुरुष के यौनसम्बन्धों के विषय में नैतिक-अनैतिक का विचार तो इतना किया गया है कि कहीं-कहीं धर्म का एक यही नारा सुनाई पड़ता है “स्त्री से बचो”। धर्मसूत्रकार की मनोवैज्ञानिक दृष्टि कभी-कभी तो फ्रायड जैसी लगती है और वह पुरुष के असामान्य यौनाचारों पर भी नियम बनाने की आवश्यकता अनुभव करता है। ३. ४. ३६ पृ० २३४। यह ठीक है कि धर्माचरण के लिए कामभावना को संयमित करना आवश्यक है, परन्तु प्रत्येक अवसर पर कामुकता का भय उस प्रवृत्ति की ओर संकेत करता है जिससे समाज में दूसरी ओर धर्म की अपेक्षा काम को ही प्रश्रय मिलता है और कामसूत्र जैसे ग्रंथों की रचना की पृष्ठभूमि बनती है। धर्मसूत्र ब्रह्मचर्य को बड़ा तप मानता है पृ० २०४। और ब्रह्मचर्यं धर्माचरण का आवश्यक अंग है। विद्यार्थी जीवन में इस व्रत का बड़ी कठोरता से पालन करने का आदेश बार-बार दिया गया है। हमारे धर्मसूत्र में कहा गया है कि ब्रह्मचारी को किसी स्त्री पर दृष्टिपात नहीं करना चाहिए, इससे कामभाव ना के उत्तेजन की आशंका रहती है—
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“स्त्रीप्रेक्षणोलम्भने मैथुनशंकायाम्” १. २. २२ यहां तक कि यदि गुरुपत्नी भी युवती हो तो उसका चरण नहीं छूना चाहिए “नैके युवतीनां व्यवहारप्राप्तेन” १. २. ४० । ब्रह्मचर्य में स्त्रीसम्बन्ध के त्याग पर इतना बल दिया गया है कि ब्रह्मचर्य मैथुनत्याग का पर्यायवाची हो जाता है और उसके अन्य आचरण गौण हो जाते हैं। सामान्यतः कुमारी लड़की पर दृष्टिपात करना निषिद्ध बताया गया है और उनके आलिंगन का स्पष्ट निषेध किया गया है।
स्त्री के साथ अनुचित संबन्ध के लिए प्रायश्चित्त एवं दण्ड का विधान भी उस स्त्री के उच्च वर्ण के होने के आधार पर किया गया है। शूद्र की स्त्री के साथ कोई अनुचित यौनसंबन्ध रखे तो वह कोई बड़ा पाप नहीं है, किन्तु साथ ही साथ सामान्य रूप में परस्त्रीगमन के लिए दो वर्ष के प्रायश्चित्त का विधान है तथा श्रोत्रिय ब्राह्मण की पत्नी के साथ व्यभिचार के लिए तीन वर्ष का ब्रह्मचर्य बताया गया है। ३. २. २९, ३० । समाज में सबसे ऊंचा स्थान गुरु का है और गुरुपत्नीगमन सबसे बड़ा पातक है। उसके लिए घोर प्रायश्चित्त करने का नियम बताया गया है। और ऐसे पातकी के पाप तभी दूर होते हैं जब वह लोहे की अग्नि में तपने से लाल बनी हुई स्त्रीप्रतिमा का आलिंगन करके या अपनी जननेन्द्रिय आदि का उच्छेद कर नैऋर्त्य दिशा में चलते-चलते मृत्यु प्राप्त करते हैं। निकटसम्बन्धवाली स्त्री के साथ व्यभिचार के लिए भी इसी प्रकार का प्रायश्चित्त बताया गया है। किन्तु दूसरी ओर कुछ आचार्यों के इस मत का उल्लेख भी किया गया है कि गुरुपत्नी के अतिरिक्त अन्य स्त्रियों के साथ अनुचित संबन्ध होने पर महापातक नहीं होता। न स्त्रीष्वगुरुतल्पं पततीत्येके। वर्ण के अतिरिक्त रक्तसंबन्ध स्त्री के प्रति यौनाचार के पाप का निर्णायक आधार है। ब्रह्मचर्य भंग करने वाले अवकीर्णी के लिए भी कठोर प्रायश्चित्त बताया गया है। इन सब उल्लेखों से यह स्पष्ट होता है कि स्त्री की पवित्रता, धर्मसूत्र के समाज में सर्वोपरि थी, किन्तु साथ ही साथ अनैतिकता स्वाभाविक रूप में थी। नारी मां के रूप में पूज्य भी थी, किन्तु किसी वस्तु के समान केवल भोग की सामग्री भी थी। समाज और परिवार के भीतर उसे कुछ महत्व तो प्राप्त अवश्य था, किन्तु उसके व्यक्तित्व को कोई विकास की स्वतन्त्रता नहीं थी। स्त्रीसम्बन्ध विषयक नैतिकता के विचाराधिक्य ने अवश्य ही नारी की प्रतिष्ठा को धक्का पहुंचाया और कुल मिलाकर उसका वह स्थान नहीं था, जो उसे वेदों और उपनिषदों की परम्परा में प्राप्त था। सूत्र के समय में नारी की इस हीन दशा का मुख्य कारण था उन्हें निन्दित, अपवित्र, मानने की प्रवृत्ति तथा ब्रह्मचर्य की रक्षा में उन्हें शत्रु समझने की धारणा। साथ ही साथ पुत्रप्राप्ति मात्र को मुख्य आध्यात्मिक लक्ष्य मानकर विवाह एवं पति पर आश्रित होने को ही नारी का अन्तिम प्रयोजन ठहराने से धर्मसूत्रकाल की नारी मानवीय अधिकारों से वंचित और पददलित भी दिखाई देती है, परन्तु सारा दोष धर्मसूत्रों का नहीं है। धर्मसूत्र की मौलिक व्यवस्था में अच्छाइयां भी हैं किन्तु उसकी दृष्टि न तो भविष्य पर है और न अतीत पर, एक के विषय में उसकी दृष्टि संकुचित है और दूसरे को वह बहुत-कुछ भूला सा लगता है। यौन विषयक नैतिकता के सन्दर्भ में धर्मसूत्र-