गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Gautama Dharmasutra Hindi
महर्षि गौतम द्वारा
स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ३८ )
जिस समाज और सभ्यता का दर्शन होता है वह धर्मशास्त्र की व्यवस्थाओं की व्यावहारिक पृष्ठभूमि है। आख्यानों में भी नियमों का पोषण हुआ दिखायी पड़ता है, जिनका उपदेश धर्मशास्त्रों ने दिया है। ब्रह्मचर्य का महत्व, उत्तराधिकार और सम्पत्ति का विभाजन, यज्ञ और अतिथिसत्कार ऐसे ही विषय हैं, जिन पर धर्मसूत्रों से पूर्ववर्ती वैदिक साहित्य में भी अनेक स्थलों पर विचार हुआ है। जैसा कि म० म० काणे ने कहा है : "कालान्तर में धर्मशास्त्रों में जो विधियाँ बतलायी गयीं, उनका मूल वैदिक साहित्य में अक्षुण्ण रूप में पाया जाता है। धर्मशास्त्रों ने वेद को जो धर्म का मूल कहा है वह उचित ही है।"—धर्मशास्त्र का इतिहास, पृ० ७, अनु० अ० काश्यप।
भारतीय धर्म का स्वरूप
भारतीय संस्कृति और विशेषतः धर्म पर भिन्न-भिन्न विचारकों ने भिन्न-भिन्न प्रकार से दृष्टिपात किया है। कुछ ने इसके मर्म को समझा है तो कुछ ने इसके वास्तविक तत्त्व को जाने बिना अपनी आलोचनात्मक प्रतिभा का दुरुपयोग मात्र किया है। वस्तुतः भारतीय धर्म या हिन्दू धर्म को किसी एक विशेष शब्द द्वारा नहीं व्यक्त किया जा सकता। जान मेकेंजी ने यह परामर्श ठीक ही दिया है कि धर्म में 'रिलीजन', 'वर्च्यू', ला, और ड्यूटी, अंग्रेजी के इन चारों पदों का अर्थ समाहित समझना चाहिए। 'हिन्दू एथिक्स' नामक पुस्तक के पृ० ३८ पर वे कहते हैं :
“In India in those days no clear distinction was drawn between moral and religious duty, usage, customary observance and law and dharma was the term which was applied to the whole complex of forms of conduct that were settled or established.”
परन्तु मेकेंजी साहब का यह कथन भ्रमपूर्ण है कि हिन्दू ने धर्म को अन्य सभी व्यवस्थित नियमों से पृथक् नहीं किया, मानो ऐसा अज्ञानवश किया गया हो। वस्तुस्थिति तो यह है कि हिन्दू धर्म में धर्म बहुत व्यापक रहा है। वह जीवन के विविध पक्षों के पार्थक्य को ज्ञानपूर्वक समाप्त करता है। समन्वय उसका मूलमन्त्र है। मानवजीवन के चार पुरुषार्थ समन्वित होकर ही उपयोगी बनते हैं अलग-अलग नहीं। हिन्दू धर्म कोरा आदर्शवादी नहीं है, अपितु वह व्यावहारिक जीवन में वास्तविक और आदर्श का समन्वय करता है। यह धर्म मनुष्य से भिन्न नहीं है, अलग नहीं है। यह उसकी मौलिक अहंता है, जिसके अभाव में मनुष्य मनुष्य नहीं रह जाता। पशु में और धर्महीन मनुष्य में कोई भेद नहीं रह जाता, अतः भारतीय धर्म मनुष्य के समूचे व्यक्तित्व से सम्बद्ध है। वह उसके छोटे-छोटे कार्यों पर भी दृष्टिपात करता है और उनका नियमन करता है। मनुष्य को प्रत्येक स्थिति और अवस्था के परिप्रेक्ष्य में देखता है—सुख में, दुःख में, समृद्धि में और विपत्ति में भी। उसके सामाजिक, पारिवारिक, वैयक्तिक और पारलौकिक जीवन