गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Gautama Dharmasutra Hindi
महर्षि गौतम द्वारा
स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)
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पर विचार करता है। भारतीय धर्म मनुष्य से संबद्ध सभी बातों पर इस प्रकार दृष्टिपात करता है और उन्हें इस प्रकार व्याप्त करता है कि सम्पूर्ण जीवन धर्ममय प्रतीत होता है। संस्कारों की शृङ्खला रेलगाड़ी की पटरी की तरह बनायी गयी है, जिससे जीवन की गाड़ी उतरने पर अनर्थ ही होता है। मानवजीवन की अवधि में भिन्न-भिन्न अवस्था में उस अवस्था के उपयुक्त आश्रमों का विधान संस्कारों की व्यवस्था को और भी पुष्टि प्रदान करता है।
धर्म का जीवन के साथ तादात्म्य इतना स्पष्ट है कि पाश्चात्य विद्वान् भी भारतीय धर्म के इस अनूठे स्वरूप से प्रभावित होते हैं। प्रो० माक्स म्यूलर ने इस रूप को सही ढंग से समझा है और अपना विचार व्यक्त करते हुए लिखा है : "प्राचीन भारतवासियों के लिए सबसे पहले धर्म अनेक विषयों के बीच एक रुचि का विषय नहीं था, यह सबका आत्मार्पण करने वाली रुचि थी। इसके अन्तर्गत न केवल पूजा और प्रार्थना आती थी, परन्तु वह सब भी आता था जिसे हम दर्शन, नैतिकता, कानून और शासन कहते हैं—सभी धर्म से व्याप्त थे। उनका सम्पूर्ण जीवन उनके लिए एक धर्म था और दूसरी चीजें मानो इस जीवन की भौतिक आवश्यकताओं के लिए निर्मित सुविधा मात्र थीं।" —व्हाट कैन इण्डिया टीच अस, पृ० १०७।
"धर्मो रक्षति रक्षितः" धर्म की रक्षा करने पर धर्म मनुष्य की रक्षा करता है। धर्महीन उच्छृङ्खल जीवन विनाश और विक्रिया की ओर ही ले जाता है। जीवन को एक उद्देश्य प्रदान करता है, उसे एक सुनिश्चित मार्ग प्रदान करता है, जिस पर चलकर आदमी अपना विकास कर सकता है, जीवन के कर्त्तव्यों का पालन कर सकता है। साथ ही इस जीवन से परे दूसरे जीवन की स्पृहा से प्रेरित होता है। परलोक की यह स्पृहा कल्पना की तरंग में बहते हुए कवि की कृति नहीं, वास्तविक जीवन की अनुभूति की अभिव्यक्ति है। इसी पारलौकिक स्पृहा को कवि वर्डस्वर्थ ने इन शब्दों में व्यक्त किया है—
"those obstinate questionings
Of sense and outward things,
Falling form us, vanishings,
Blank misgivings of a creature
Moving about in worlds not realised."
माक्स म्यूलर ने भारतीय चरित्र की विशेषता यह बतायी है कि वह पारलौकिक होता है : "यदि मुझसे एक शब्द में भारतीय चरित्र की विशेषता बताने को कहा जाय तो मैं यही कहूँगा कि वह पारलौकिक था।"—"भारतीय चरित्र में इस पारलौकिक मनोवृत्ति ने अन्य किसी देश की अपेक्षा अधिक प्राधान्य प्राप्त किया।"—व्हाट कैन इण्डिया टीच अस, पृ० १०४, १०५।
भारतीय धर्म और दर्शन एक दूसरे से पृथक् नहीं हैं अपितु एक ही वस्तु के दो पहलू हैं। यद्यपि इन दोनों में इतना अन्तर अवश्य होता है कि धर्म में विश्वास