गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Gautama Dharmasutra Hindi
महर्षि गौतम द्वारा
स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 25, कुल 360 में से
संदर्भ में पढ़ें( २० )
और भावना मुख्य होती है जबकि दर्शन में विचार और तर्क प्रमुख होते हैं। भारतीय धर्म का दर्शन एवं नीति से कितना अनोखा सम्बन्ध है इसे हम आचार की महत्ता पर विचार करते समय देखेंगे। धर्म के साथ अर्थ, काम, मोक्ष का समन्वय भारतीय जीवन का उद्देश्य है और इस कारण यह धर्म सन्तुलित रूप में आदर्शवादी है और यथार्थवादी भी, लौकिक है और पारलौकिक भी, आध्यात्मिक है और भौतिक भी। वह आचरण की वस्तु है। आचार उसका मूलाधार है। उसकी नींव गहरी है और उसके कुछ मौलिक तत्त्व हैं जो उसे स्थायित्व प्रदान करते हैं। एक पाश्चात्य आलोचक ने इसी बात का संकेत इन वाक्यों में किया है :—"भारत का आध्यात्मिक इतिहास उसके अत्यन्त मौलिक विचार से घनिष्ठ रूप से सम्बद्ध है और यह बात सोची भी नहीं जा सकती कि इस प्रकार की संस्कृति जो हजारों वर्षों से भारत में फूलती-फलती रही है, इतनी गहरी जड़ों पर आधारित होती और स्वयं को इतनी दृढ़ता से बनाये रखती अगर इसमें महान् एवं चिरस्थायी मूल्य वाले तत्त्व निहित न होते।”
भारतीय धर्म में मानवीय प्रतिभा के एक विकसित रूप का उपयोग दिखायी देता है, उसमें मानजीवन की अनेक समस्याओं पर भलीभाँति विचार करके व्यवस्था दी गयी है। मैक्स म्यूल्लर ने भारतीय धर्म और संस्कृति की उपलब्धियों का इन शब्दों में उल्लेख किया है :—
“If I were asked under what sky the human mind has fully developed some of its choicest gifts, has most deeply pondered on the greatest problems of life, and has found solutions of sone of them which well deserve the attention even of those who have studied Plato and Kant—I should point to India.”
—What Can India Teach Us ?—p.6
आचार इस धर्म का मूल है और धर्म के ज्ञान के साथ उसका अनुष्ठान और व्यवहार ही उसके वास्तविक प्रयोजन को सिद्ध करते हैं। गौतमधर्मसूत्र के शब्दों में—
“धर्मिणां विशेषेण स्वर्गं लोकं धर्मविदाप्नोति ज्ञानाभिनिवेशाभ्याम्”। इस धर्म का शाश्वत सन्देश है :—
“धर्मं चरत मा धर्मं सत्यं वदत मानृतम् ।
दीर्घं पश्यत मा ह्रस्वं परं पश्यत मापरम् ॥ वसिष्ठ ध० सू०
धर्म का आचरण करो, अधर्म का नहीं। सत्य बोलो, झूठ मत बोलो। दूर तक देखो, संकुचित दृष्टि मत रखो, हीन वस्तु देखकर अपना विचार हीन मत बनाओ, श्रेष्ठ वस्तु को देखो और जीवन का लक्ष्य सदा ऊँचा से ऊँचा बनाये रखो।
आचार और नैतिक भावना
भारतीय संस्कृति का मूल आधार है आचार। आचार के आधार पर ही हिन्दू समाज का निर्माण हुआ था और जब तक व्यावहारिक जीवन में इस आधार को