गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Gautama Dharmasutra Hindi
महर्षि गौतम द्वारा
स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( २१ )
प्राधान्य मिला तबतक समुन्नति तथा समृद्धि का समय बना रहा । धर्म का व्यावहारिक पहलू है आचार और इसी कारण इसे परम धर्म भी कहा गया है, धर्म की आधारशिला कहा गया है :
“आचारः परमो धर्मः सर्वेषामिति निश्चयः ।
हीनाचारपरीतात्मा प्रेत्य चेह च नश्यति ॥”—वसिष्ठधर्मसूत्र ६।१
आचार से हीन व्यक्ति के लिए लोक में कोई सुख नहीं है और उसे दूसरे लोक में भी सुख की प्राप्ति नहीं होती । कोई व्यक्ति वेद और शास्त्रों के ज्ञान में भले ही पारंगत हो यदि आचार से भ्रष्ट है तो सम्पूर्ण धर्मज्ञान उसे कोई लाभ नहीं पहुँचाते और न आनन्द ही देते हैं जैसे अन्धे के हृदय में उसकी सुन्दर प्रियतमा भी कोई सौन्दर्यानुभूति का सुख उत्पन्न नहीं करती ।
आचारहीनस्य तु ब्राह्मणस्य वेदाः षडङ्गास्त्वखिलाः सयज्ञाः ।
कां प्रीतिमुत्पादयितुं समर्था अन्धस्य दारा इव दर्शनीयाः ॥ वही, ६।४
इस प्रकार धर्मशास्त्रकारों का आग्रह आचार के प्रति बराबर रहा है और वे आचार को सम्मान, दीर्घ जीवन और सुख का कारण मानते हैं ।
आचारो भूतिजनन आचारः कीर्तिवर्धनः ।
आचाराद् वर्धते ह्यायुराचारो हन्त्यलक्षणम् ॥
और आचार की इसी महिमा के कारण ही सदाचार को धर्म का साधन माना गया है, जैसे वेद और स्मृति को । “वेदः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः ।” सम्पूर्ण ज्ञान का उपयोग है उस ज्ञान को आचार में परिणत करना । इसी कारण भारत का दार्शनिक कोरे चिन्तन में समय नहीं गंवाता । वह अपने जीवन को अपने दर्शन के अनुरूप ढालता है और आदर्श प्रस्तुत करता है । दर्शन और आचारशास्त्र या नीतिशास्त्र का परस्पर अन्योन्याश्रय संबन्ध रहा है और यह संबन्ध वैसा ही रहा है जैसा कि “विज्ञान और प्रयोग का, ज्ञान और योग का ।” एक ओर धर्म का मूल आधार है नीति और दूसरी ओर नीति दर्शन का व्यावहारिक पक्ष है, इस प्रकार धर्म, दर्शन और नीति एक दूसरे से अपृथक् हैं, वे एक दूसरे पर निर्भर हैं और एक दूसरे के पूरक भी हैं । इसी बात का उल्लेख जान केअर्ड ने ‘एन इण्ट्रोडक्शन टू द फिलासाफी आफ रिलीजन’ पुस्तक में किया है :—
“Indian philosophers and thinkers have even declared that the philosophy and ethics both are inter-dependent. There can be no intellectual growth without a morally elevated life. To be a good philosopher a man should be religious, moral and of good conduct.”
भारतीय धर्म या दर्शन में केवल नैतिक भावनाओं का प्रतिपादन ही नहीं किया गया है, अपितु वास्तविक जीवन में उनकी अभिव्यक्ति प्रस्तुत की गयी है और इस अभिव्यक्ति का मनोवैज्ञानिक आधार भी प्रतिस्थापित किया गया है।