भारतकोश
गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Gautama Dharmasutra Hindi

महर्षि गौतम द्वारा

स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished360 पृष्ठ

पृष्ठ 101, कुल 360 में से

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३६गौतमधर्मसूत्राणि

देव, पितर, अतिथि, भूत और ऋषि की ( प्रतिदिन ) पूजा करे ( अर्थात् पञ्चमहायज्ञ करे ) ॥ २८ ॥

सर्वातिथिः प्रतिषिद्धवर्जम् ॥ २९ ॥

य एनमुपागच्छन्ति ते सर्व(र्वेऽ)स्यातिथयः। न पुनर्ब्राह्मणस्यानतिथिरब्राह्मण इत्ययं नियमोऽस्ति। तत्रापि स्तेनपतितादीन्वर्जयेत्प्रतिषिद्धवर्जम् ॥ २९ ॥

निषिद्ध (चोर, पतित आदि) को छोड़कर सभी व्यक्ति वानप्रस्थ के अतिथि होते हैं ॥ २९ ॥

वैष्कम्प्युपयुञ्जीत ॥ ३० ॥

विष्का दुष्टमृगा व्याघ्रादयस्तैर्हतं मांसं वैष्कं तदप्युपयुञ्जीत। अपि शब्दो गौणार्थः। फलमूलाद्यभावे तदपि भक्ष्यमिति। तत्रापि पञ्च पञ्चनखा भक्ष्या इत्येतद्व्यतिरिक्तं वर्जयित्वा। प्रतिषिद्धवर्जमिति पदं काकाक्षिन्यायेनोभयत्र संबध्यते ॥ ३० ॥

( फल-मूल के अभाव में ) व्याघ्र आदि हिंस्र पशुओं द्वारा मारे गये जीवों का मांस खा सकता है ( किन्तु जिन पशुओं के मांस का निषेध किया गया है उनके मांस का भक्षण न करे ) ॥ ३० ॥

न फालकृष्टमधितिष्ठेत् ॥ ३१ ॥

अरण्ये वसन्हलेन कृष्टं प्रदेशं नाधिवसेत् ॥ ३१ ॥

( वन में रहते हुए ) हल से जोते गये खेत में न जाये ॥ ३१ ॥

ग्रामं च न प्रविशेत् ॥ ३२ ॥

वने वसतोऽपि यादृच्छिकोपग्रामप्रवेशो निषिद्धः ॥ ३२ ॥

ग्राम में भी प्रवेश न करे ॥ ३२ ॥

जटिलश्चीराजिनवासाः ॥ ३३ ॥

जटिलः केशश्मश्रुलोमनखधारो। चीरं दर्भादिनिर्मितं वासः। अजिनमुत्तरीयम्। तथा च स्मृत्यन्तरे व्यवस्थादर्शनात् ॥ ३३ ॥

जटा ( केश, दाढी-मूँछ, नख ) बढ़ाये रखे, ( दर्भ आदि से निर्मित ) वस्त्र पहने और मृगचर्म ( का उत्तरीय ) धारण करे ॥ ३३ ॥

नातिसंवत्सरं भुञ्जीत ॥ ३४ ॥

संवत्सरमतिक्रान्तमतिसंवत्सरं तदारण्यमपि नाश्नीयात्। अत्र मनुः—

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