गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Gautama Dharmasutra Hindi
महर्षि गौतम द्वारा
स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 127, कुल 360 में से
संदर्भ में पढ़ें६२ | गौतमधर्मसूत्राणि
यज्ञ में दीक्षा लेने वाले समवयस्क व्यक्ति को सोमक्रय के पूर्व 'भो' या 'भवन्' से संबोधित करना चाहिए (सोमक्रय के बाद उनका सम्मान वृद्ध पुरुष के समान किया जाता है) ॥ १७ ॥
वित्तबन्धुकर्मजातिविद्यावयांसि मान्यानि परबलीयांसि ॥ १८ ॥
वित्तादीनां साक्षान्मान्यत्वासंभवात्तद्वन्तो मान्या इत्युपलक्ष्यन्ते। वित्तवानाढ्यः। बन्धुमान्विशिष्टैः सोदर्यादिभिर्युक्तः। कर्मवान्यथोक्तकर्मकारी। जातिमानभिजनयुक्तः। विद्यावानधीतवेदशास्त्रः। वयस्वान्वयसाऽधिकः। एतादृशा अतादृशैर्मान्याः। परस्परसमवाये तु परः परो बलीयान्प्रथममान्यः। मान्येऽभिवादनादिसंमानः ॥ १८ ॥
धनवान व्यक्ति, भाई बन्धु आदि जनों से युक्त, यथोक्त कर्म करने वाले, उत्तम जाति वाले, वेद और शास्त्रों के ज्ञाता तथा अपने से अधिक आयु वाले व्यक्ति मान्य होते हैं। इनमें बाद वाला क्रमशः अपने पहले वाले से अधिक सम्माननीय होता है (मान्य व्यक्तियों का अभिवादन करना चाहिए) ॥ १८ ॥
श्रुतं तु सर्वेभ्यो गरीयः ॥ १९ ॥
श्रुतं मन्त्रब्राह्मणविभागेन वेदार्थपरिज्ञानम्। तत्सर्वेभ्यो वित्तादिभ्यो गरीयो गुरुतरम्। पूर्वसूत्रे परबलीयांसीति श्रुतमपरमुपन्यस्तं तद्व्यावृत्त्यर्थं पृथक्सूत्रम् ॥ १९ ॥
वेद का ज्ञाता (उपर्युक्त धनवान आदि) सबसे श्रेष्ठ होता है ॥ १९ ॥
कुतः पुनः श्रुतं सर्वेभ्यो गरीय इत्यत आह—
तन्मूलत्वाद्धर्मस्य श्रुतेश्च ॥ २० ॥
श्रुतमूलमनुष्ठानमनुष्ठानमूलो धर्म इति श्रुतेश्चाप्यनुच्छिन्नसंप्रदायो मूलम्। तस्माच्छ्रुतस्य गरीयस्त्वम्। श्रुतस्य गरीयस्त्वं छान्दोग्ये प्रतिपादितम् ब्राह्मणं शैशवं भवति शिशुर्वै आङ्गिरसो मन्त्रकृतां मन्त्रकृदासी दिति। मनुरपि—
अध्यापयामास पितॄञ्शिशुराङ्गिरसः कविः।
पुत्रका इति होवाच ज्ञानेन परिगृह्य तान् ॥ इति ॥ २० ॥
क्योंकि धर्म और श्रुति का मूल श्रुत अर्थात् वेदज्ञान ही है ॥ २० ॥
चक्रिदशमीस्थानुग्राह्यवधूस्नातकराजभ्यः पथो दानम् ॥ २१ ॥
चक्रि चक्रवच्छकटादि। तत्स्थश्चक्रिस्थः। दशम्यां दशायां स्थितो