भारतकोश
गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Gautama Dharmasutra Hindi

महर्षि गौतम द्वारा

स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished360 पृष्ठ

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सानुवाद-मिताक्षरावृत्तिसहितानि ८७

की इच्छा से ), हाथ की ( शिल्पकर्म शिक्षा की इच्छा से ), पैर की ( घूमने से ), वाणी की ( अधिक बोलने से ), और नेत्र की ( नृत्य आदि देखने की इच्छा से ) चपलता न करे ॥ ५० ॥

छेदनभेदनविलेखनविमर्द्दनावस्फोटनानि नाकस्मात् कुर्यात् ॥ ५१ ॥

छेदनं तृणादीनाम्। भेदनं घटादेः। विलेखनं कुड्यभूम्यादौ नखादिभिर्विलेखनम्। विमर्द्दनं लोष्टादीनां चूर्णीकरणम्। अवस्फोटनमङ्गुलीनां सशब्दं प्रसारणम्। एतदकस्मान्न कुर्यात्। कारणे त्ववस्फोटनादिषु न दोषः। छेदनादिष्वपि यथासंभवं मृग्यम् ॥ ५१ ॥

( तृण आदि का ) छेदन, ( घड़े आदि का ) फोड़ना, ( दीवाल या पृथ्वी आदि पर नख आदि से ) लिखना, ढेले आदि को फोड़ना, अंगुली चटकाना—ये सब कार्य अकारण न करे ॥ ५१ ॥

नोपरि वत्सतन्तीं गच्छेत् ॥ ५२ ॥

वत्सबन्धनो रज्जुर्वत्सतन्ती । तामुपरि न गच्छेत् । वत्सशब्दो गोजातेरुपलक्षणम् ॥ ५२ ॥

बछड़े ( गौ आदि ) के पगहे के ऊपर से न जाए ॥ ५२ ॥

न कुलंकुलः स्यात् ॥ ५३ ॥

कुलमेव कुलं यस्य स कुलंकुलः। छान्दसो मुडागमः। एवंविधो न स्यात्। अन्यत्र गमनेऽध्ययनादिलाभे सति स्वकुल एव न तिष्ठेदिति। अपर आह—कुलात्कुलान्तरगामी कुलंकुलो दत्तादिरूपेण तथाविधो न स्यात्। स्वसूत्रपरित्यागेन परसूत्रं न भजेदिति। तत्र स्मृत्यन्तरम्—

यः स्वसूत्रं परित्यज्य परसूत्रं निषेवते।
शाखारण्डः स विज्ञेयः सर्वकर्मबहिष्कृतः ॥ इति ॥ ५३ ॥

( अन्यत्र जाकर अध्ययन करना संभव हो तो ) अपने कुल में ही न पड़ा रहे अथवा दत्तक होकर एक कुल से दूसरे कुल में ही न भटकता रहे। अथवा अपने सूत्र का परित्याग करके दूसरे के सूत्र को न अपनाए ॥ ५३ ॥

न यज्ञमवृतो गच्छेत् ॥ ५४ ॥

अवृतोऽनुपामन्त्रितो यज्ञं न गच्छेत् ॥ ५४ ॥

आमन्त्रित न होने पर यज्ञ में ( भाग लेने ) न जाए ॥ ५४ ॥