भारतकोश
गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Gautama Dharmasutra Hindi

महर्षि गौतम द्वारा

स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished360 पृष्ठ

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पृष्ठ 165

१०० गौतमधर्मसूत्राणि

च शिल्पिषूक्तप्रकारेण व्याख्याता मासि मास्येकैकं कर्म कुर्युुरिति। नर्त- कादिष्वप्येषैव गतिः॥ ३२ ॥

शारीरिक श्रम करके जीविका निर्वाह करने वालों (लकड़हारा आदि) के लिए भी इसी प्रकार का नियम है॥ ३२ ॥

नौचक्रीवन्तश्च ॥ ३३ ॥

नौश्च चक्रं च नौचक्रे। चक्रशब्देन तद्वच्छकटं लक्ष्यते। तद्वन्तो नौचक्रीवन्तः। आसन्दीवदष्ठीवदित्यादिना कथंचिद्रूपसिद्धिः। नौवन्तो नौजीविनः। चक्र(क्री)वन्तः शकटजीविनः। तेऽपि राज्ञ एकमहस्त- त्कर्म कुर्युः॥ ३३॥

नौका एवं गाड़ी चलाकर जीविकानिर्वाह करने वाले भी (प्रतिमास एक दिन राजा के लिए कर्म करें)॥ ३३ ॥

भक्तं तेभ्यो दद्यात् ॥ ३४ ॥

शिल्पिनो मासि मासीत्यारभ्य येऽनुक्रान्तास्तेभ्यः कर्म कुर्वद्भ्यो भक्तमन्नं दिवा भोजनं दद्याद्राजा ॥ ३४ ॥

इनको राजा (जिस दिन वे उसके यहाँ श्रमदान करें उस दिन) भोजन दे॥ ३४ ॥

पण्यं वणिग्भिरर्थापचयेन देयम् ॥ ३५ ॥

मासि मास्येकैकमित्यनुवर्तते। विंशतिभागः शुल्कः पण्य इत्युक्तम्। ततः शुल्कादधिकमिदं मासि मास्येकं पण्यमर्थापचयेन प्राप्तस्य मूल्यस्य किंचिन्न्यूनतां कल्पयित्वा वणिजो राज्ञे दद्युः। तत्र बृहस्पतिः—

शुल्कं दद्युस्ततो मासमेकैकं पण्यमेव च।
अर्घावरं च मूल्येन वणिजस्ते पृथक् पृथक्॥ इति ॥ ३५ ॥

कर देने वाले व्यापारी (कर के अतिरिक्त) प्रतिमास अपनी विक्रय की एक वस्तु कम मूल्य पर राजा को अर्पित करें॥ ३५ ॥

प्रनष्टमस्वामिकमधिगम्य राज्ञे प्रब्रूयुः ॥ ३६ ॥

प्रनष्टं स्वामिसकाशात्प्रभ्रष्टम्। अस्वामिकमज्ञायमानस्वामिकम्। अधिगम्य भूमौ पतितमुपलभ्य जनपदपालने नियुक्ता एते राज्ञे प्रब्रूयुः। अन्ये वा केचिद् दृष्टवन्तस्तेऽपि ब्रूयुः॥ ३६॥

किसी की खोई हुई वस्तु या ऐसी वस्तु को पाकर जिसके स्वामी का पता न हो उस वस्तु के विषय में राजा को बतलाना चाहिए॥ ३६ ॥