गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Gautama Dharmasutra Hindi
महर्षि गौतम द्वारा
स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 167, कुल 360 में से
संदर्भ में पढ़ें| १०२ | गौतमधर्मसूत्राणि |
|---|
इनके अतिरिक्त दान में प्राप्त धन ब्राह्मण की अधिक सम्पत्ति होता है ॥ ४० ॥
क्षत्रियस्य विजितम् ॥ ४१ ॥
विजयेन लब्धं क्षत्रियस्याधिकं स्वम् ॥ ४१ ॥
युद्ध में जीता हुआ धन क्षत्रिय का अधिक धन होता है ॥ ४१ ॥
निर्विष्टं वैश्यशूद्रयोः ॥ ४२ ॥
निर्विष्टं कर्मणोपात्तम्। कृष्यादिना वैश्यस्य शुश्रूषादिना शूद्रस्य। तदधिकमनयोः ॥ ४२ ॥
अपने कर्म से उपार्जित धन वैश्य और शूद्र की अधिक सम्पत्ति होता है ॥ ४२ ॥
अथ प्रणष्टाधिगताधिगन्तुश्चतुर्थमित्यस्यापवादमाह—
निध्यधिगमो राजधनम् ॥ ४३ ॥
निधिश्चेदधिगतस्तद्राजधनमेव भवति। अधिगन्त्रेऽनुग्रहानुरूपं किंचिद्देयमिति ॥ ४३ ॥
पायी हुई वस्तु राजा का धन होती है ॥ ४३ ॥
ब्राह्मणस्याभिरूपस्य ॥ ४४ ॥
अभिरूपः षट्कर्मनिरतः। तस्य ब्राह्मणस्य चेन्निध्यधिगमो न तद्राजधनं किं तर्ह्यधिगन्तुर्ब्राह्मणस्यैवेति ॥ ४४ ॥
अपने छः कर्मों में रत रहने वाले ब्राह्मण को मिली हुई वस्तु उसीकी (अर्थात् ब्राह्मण की ही) सम्पत्ति होती है (राजा की नहीं) ॥ ४४ ॥
अब्राह्मणोऽप्याख्याता षष्ठं लभेतेत्येके ॥ ४५ ॥
अब्राह्मणोऽपि निधिमधिगम्य यद्याचष्ट इदमित्थमासादितमिति स तस्य निधेः षष्ठं लभेतेत्येके स्मर्तारो मन्यन्ते। ब्राह्मणेऽनभिरूपे कल्प्यः ॥ ४५ ॥
कुछ आचार्यों के मतानुसार ब्राह्मण से भिन्न वर्ण का व्यक्ति भी स्वयं पाकर राजा को अर्पित की गई वस्तु के षष्ठांश का स्वामी होता है ॥ ४५ ॥
चौरहृतमपजित्य यथास्थानं गमयेत् ॥ ४६ ॥
चौरैर्हृतं द्रव्यं तानपजित्य यथास्थानं गमयेत्। स्वामिन एव दद्यात्। जेतुस्तु जयफलं किंचित् ॥ ४६ ॥