गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Gautama Dharmasutra Hindi
महर्षि गौतम द्वारा
स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 186, कुल 360 में से
संदर्भ में पढ़ेंसानुवाद-मिताक्षरावृत्तिसहितानि १२१
पञ्चानां कृष्णलानां समाहारः पञ्चकृष्णलम्। अल्प तच्चेत्फलादि अल्पमुदरपूरणमात्रम्। अधिके त्वष्टापाद्यमेव ॥ १५॥
अल्प फल, हरे धान्य और शाक की चोरी करने पर पांच कृष्णल दण्ड होता है ॥ १५ ॥
पशुपीडिते स्वामिदोषः ॥ १६ ॥
पशुभिरुपहते सस्यादौ पशुमतो दोषः। दण्डपरिमाणं वक्ष्यति ॥१६॥
किसी पशु के फसल आदि नष्ट करने पर पशु के स्वामी का दोष होता है ॥ १६ ॥
पालसंयुक्ते तु तस्मिन् ॥ १७ ॥
स चेत्पशुः पालाय स्वामिना समर्पितस्तदा तस्मिन्पाले दोषः। पालयतीति पालो गोपालः। इदं प्रमादकृते, बुद्धिपूर्वे तु द्विगुणो दण्डः। तथा स्मृत्यन्तरे दर्शनात् ॥ १७ ॥
पशु के साथ चरवाहा लगा हो तो (पशु द्वारा फसल आदि की हानि होने पर) चरवाहे का दोष होता है ॥ १७ ॥
पथि क्षेत्रेऽनावृते पालक्षेत्रिकयोः ॥ १८ ॥
क्षेत्रिकः क्षेत्रवान् यस्य क्षेत्रं पन्थ्यनावृतं भवति तत्र पशुपीडिते पालक्षेत्रिकयोरुभयोर्दण्डोऽर्धमर्धम्। पालस्यानवधानात्क्षेत्रिकस्य वृत्त्यकरणाच्च।
वृत्तिं च तत्र कुर्वीत यामुष्ट्रो नावलोकयेत्। इति मानवे दर्शनात् ॥ १८ ॥
मार्ग से सटे हुए खेत के घिरा न होने पर (यदि पशु हानि करे तो) खेत के स्वामी और पशु के स्वामी दोनों का दोष होता है ॥ १८ ॥
दण्डपरिमाणमाह—
पञ्च माषा गवि ॥ १९ ॥
उशनसा माषो दर्शितः—
माषो विंशतिभागस्तु ज्ञेयः कार्षापणस्य हि।
काकिणी तु चतुर्थांशो माषस्यैष प्रकीर्तितः ॥ इति ॥
माषाः पञ्च गोपीड़िते सस्यादौ दण्डः ॥ १९ ॥
गाय के द्वारा (खेत को क्षति पहुँचाने पर) पांच माष दण्ड होता है ॥१९॥
षडुष्ट्रखरे ॥ २० ॥
द्वंद्वैकवद्भावः। उष्ट्रखरे तूपहन्तरि प्रत्येकं षण्माषा दण्डः ॥ २० ॥