गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Gautama Dharmasutra Hindi
महर्षि गौतम द्वारा
स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)
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ऽयुतपुरुषहननदोषः । भूम्यनृते यस्य सा भूमिस्तज्जातीयानां लक्षहन- नदोष इति ।
पञ्च पश्वनृते हन्ति दश हन्ति गवानृते ।
शतमश्वानृते हन्ति सहस्रं पुरुषानृते ॥
इत्येतत्त्वत्यन्तक्षुद्रपश्वादिविषयम् ॥ १५ ॥
गाय, अश्व, मनुष्य और भूमि के विषय में असत्य भाषण करने पर साक्षी क्रमशः उत्तरोत्तर दशगुने तत्तत् प्राणियों के वध के पाप का भागी होता है (अर्थात् गाय के विषय में असत्य बोलने पर सौ गायों के वध का दोषी होता है, अश्व के विषय में एक हजार अश्व के वध का, मनुष्य के विषय में झूठा साक्ष्य देने पर दस सहस्र मनुष्यों के वध का तथा भूमि के विषय में असत्य बोलने पर उस भूमि का स्वामी जिस जाति का हो उस जाति के एक लाख पुरुषों के वध के पाप का भागी होता है) ॥ १५ ॥
सर्वं वा भूमौ ॥ १६ ॥
यदि वा भूमिविषयेऽनृते सर्वमेव मनुष्यजातं हन्ति । ग्रामदेशादि-महाभूमिविषयो विकल्पः ॥ ॥ १६ ॥
भूमि के विषय में असत्य बोलने पर साक्षी सम्पूर्ण मनुष्य जाति की हत्या का दोषी होता है ॥ १६ ॥
हरणे नरकः ॥ १७ ॥
प्रासङ्गिकमिदम् । भूमेरिति विपरिणामेन संबन्धः । भूमेर्हरणे नरको भवति । कालान्तरावधिः शास्त्रान्तरावसेयः ॥ १७ ॥
भूमि का अपहरण करने पर नरक मिलता है ॥ १७ ॥
प्रकृतमाह—
भूमिवदप्सु ॥ १८ ॥
अद्विषयेऽनृते भूमिवल्लक्षहननदोषो हरणे नरक इति च समानम् । अप्शब्देन कूपतडागादिरुपलक्षितः ॥ १८ ॥
जल के विषय में असत्य बोलने पर साक्षी को भूमिविषयक असत्य भाषण के समान ही दोष होता है ॥ १८ ॥
मैथुनसंयोगे च ॥ १९ ॥
मैथुनसंयुक्ते चानृते परदारानसौ गच्छतीत्यादौ भूमिवदिति चकाराद्गम्यते ॥ १९ ॥