भारतकोश
गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Gautama Dharmasutra Hindi

महर्षि गौतम द्वारा

स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished360 पृष्ठ

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पृष्ठ 202

सानुवाद-मिताक्षरावृत्तिसहितानि १३७

मैथुन (व्यभिचार) विषयक असत्यभाषण में भी वैसा ही (भूमिविषयक असत्यभाषण के समान ही) दोष साक्षी को लगता है ॥ १९ ॥

पशुवन्मधुसर्पिषोः ॥ २० ॥

मधुसर्पिर्विषयेऽनृते क्षुद्रपशुवद्दोषः ॥ २० ॥
मधु और घृत के विषय में असत्य बोलने पर क्षुद्र पशुविषयक असत्यभाषण के समान दोष लगता है ॥ २० ॥

गोवद्वस्त्रहिरण्यधान्यब्रह्मसु ॥ २१ ॥

ब्रह्म वेदः। वस्त्रादिविषयेऽनृते गोवद्दोषः। अधीत्य नास्मान्म- थाऽधोतमित्यादि ब्रह्मानृतम् ॥ २१ ॥
वस्त्र, स्वर्ण, धान्य और वेद विद्या के विषय में असत्य बोलने पर गो- विषयक असत्यभाषण के समान दोष साक्षी को लगता है ॥ २१ ॥

यानेष्वश्ववत् ॥ २२ ॥

हस्तिशकटशिबिकादीनि यानानि। तद्विषयेऽनृतेऽश्ववद्दोषः। अन्ये तु क्षुद्रपश्वनृत इत्यारभ्य साक्षिश्रावणे योजयन्ति। क्षुद्रपश्वनृते साक्षिणो दशपशुहननदोषः। तस्मात्त्वया सत्यमेव वक्तव्यमिति साक्षी श्रावयि- तव्य इति। एवं सर्वत्रोपरिष्टादपि ॥ २२ ॥
किसी यान (गाड़ी, रथ, पालकी आदि) के विषय में झूठा साक्ष्य देने पर अश्वविषयक असत्यभाषण के समान दोष होता है ॥ २२ ॥

एवमदृष्टविषये दोषमुक्त्वा दृष्टविषये साक्षिणो दण्डमाह—

मिथ्यावचने याप्यो दण्ड्यश्च साक्षी ॥ २३ ॥

मिथ्यावचने दृष्टे साक्षी याप्यो गर्ह्यः सर्वैरयमसंव्यवहार्य इति, दण्ड्यश्च राज्ञा।

अत्र मनुः—

लोभात्सहस्रं दण्ड्यस्तु मोहात्पूर्वं तु साहसम्।
भयाद् द्वौ मध्यमौ दण्ड्यौ मैत्र्यात्पूर्वं चतुर्गुणम् ॥
कामाद्दशगुणं पूर्वं क्रोधात्तद्विगुणं परम्।
अज्ञानाद् द्वे शते पूर्णे बालिश्याच्छतमेव तु ॥
कूटसाक्ष्यं तु कुर्वाणांस्त्रीन्वर्णान्धार्मिको नृपः।
प्रवासयेद्दण्डयित्वा ब्राह्मणं तु विवासयेत् ॥ इति

विष्णुः— कूटसाक्षिणां सर्वस्वापहार उक्तश्चोपजोविनां च ॥ इति॥ २३॥