भारतकोश
गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Gautama Dharmasutra Hindi

महर्षि गौतम द्वारा

स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished360 पृष्ठ

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१८४ | गौतमधर्मसूत्राणि

या रथकार माहिष्य द्वारा करणी स्त्री से उत्पन्न ), लोभी, कारागार के प्रहरी, चिकित्सक, बिना धनुष के शिकार करने वाले, जुड़ा भोजन करनेवाले, अनेक लोगों के गण का तथा शत्रु का अन्न अभोज्य होता है ॥ १७ ॥

अपङ्क्त्यानां प्राग्दुर्वालात् ॥ १८ ॥

ये चापङ्क्त्याः प्रागुपदिष्टास्त्यक्तात्मपर्यन्तास्तेषामप्यन्नम-भोज्यम् ॥ १८ ॥

श्राद्ध भोजन में (पूर्वोक्त) पंक्ति में न बैठाये जाने योग्य व्यक्तियों में दुर्वाल (गंजे सिरे वाले) के पहले जिनका उल्लेख किया गया है उन (त्यक्तात्म तक के २.६.१८) के व्यक्तियों का अन्न अभोज्य होता है ॥ १८ ॥

वृथान्नाचमनोत्थानव्यपेतानि ॥ १९ ॥

यदात्मार्थं पच्यते नातिथ्याद्यर्थं तद् वृथान्नम्। श्रूयते हि—‘मोघमन्नं विन्दते अप्रचेताः' इत्यादि । भोजनमध्ये यत्र कोपादिना पुनराचम्यत उत्थीयते वा। अपेतादन्यद् व्यपेतं संहितमिति । एते आचमनोत्थान-व्यपेते अन्ने । एतानि वृथान्नादीन्यभोज्यानि। अश्रोशना-अगुरूभिरा-चमनोत्थानं चेति । एकस्यां पङ्क्तौ बहुषु भुञ्जानेष्वेकेनापि गुरुव्यति-रिक्तेनाऽऽचमन उत्थाने वा कृत इतरेषामप्यभोज्यमिति । गुरुभिः कृते न दोषः ॥ १९ ॥

जो अन्न अतिथि के लिये (या श्रद्धा से) न पकाया गया हो अर्थात् अपने लिये पकाया गया हो तथा जहाँ एक साथ भोजन करने वालों में कोई कोप आदि से आचमन करके उठ जाय वहाँ अन्न अभोज्य होता है ॥ १९ ॥

समासमाभ्यां विषमसमै पूजातः ॥ २० ॥

कुलशीलादिभिस्तुल्यः समः। विपरीतोऽसमः। विषमसमशब्दौ भावपरौ। विषमसम इति समाहारद्वन्द्वः । पूजातः पूजायामासनपरिचर-णादिकायां समेन सह पूजायां विषमेऽसमेन च साम्ये क्रियमाणे तदन्न-मभोज्यम् ॥ २० ॥

जहाँ (कुल-शील आदि में) अपने तुल्य व्यक्ति का अधिक सम्मान हो अथवा अपने से निम्नकोटि के व्यक्ति का अपने समान सम्मान हो वहाँ अन्न नहीं खाना चाहिए ॥ २० ॥

अनर्चितं च ॥ २१ ॥

यच्चानर्चितं दीयते 'वैधवेय भक्षय' इति तदप्यभोज्यम् । प्रतिग्रहेऽपि तुल्यमेतत् । यथाऽऽह मनुः—